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प्यार के तट पर काई बहुत है

प्यार के तट पर काई बहुत है 
इसमें आगे गहराई बहुत है  
महफ़िल में रहने वालों को 
इक पल की तनहाई बहुत है 
नकली सिक्कों के बाज़ार में 
असली इक- इक पाई बहुत है 
4
कैसे रचे मेहँदी हांथों में 
किस्मत में अंगडाई बहुत है 
5
दिल का ज़रुरत क्या पत्थर की 
इसके लिए इक राई बहुत  है 
6
" अजय "न…
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Added by ajay sharma on July 9, 2013 at 12:00am — 4 Comments

स्नेह सुधा बरसाओ मेघा//नवगीत//

स्नेह सुधा बरसाओ मेघा,

व्याकुल हुआ तरसता मन।

 

रिश्तों की जो बेलें सूखीं,

कर दो फिर से हरी भरी।

मन आँगन में पड़ी दरारें,

घन बरसो, हो जाय तरी।

सिंचित हो जीवन की धरती।

ले आओ ऐसा सावन।

 

दूर दिलों से बसी बस्तियाँ,

भाव शून्यता गहराई।

सरस सुमन निष्प्राण हो गए

नागफनी ऐसी…

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Added by कल्पना रामानी on July 8, 2013 at 11:00pm — 14 Comments

गज़ल

२   २  १  २     २  २  १  २       २  २  १  २

नायक या खलनायक उसे किस खाते लिखूं  

या भटकी लाली के संग उस को जाते लिखूं

 

जिस  को  खुदा  माना  कभी हम ने दोस्त

दीया कोई  उस की चोखट पर जलाते लिखूं

गा  कोई तुम नगमा सुरीला सा मेरे  दिल

तुझ  को  करीब  पाऊं  लोरी सुनाते लिखूं

वो छोड़ गया जो मुझ को इस भंवर में अब

अब तुम बता मुझको अपना किस नाते लिखूं

 

उस का करें किस बात पै हम यकीं मोहन ,

करते …

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Added by मोहन बेगोवाल on July 8, 2013 at 11:00pm — 5 Comments

नवगीत/ फूटी गागर

मन भौंरे सा आकुल है

तुम चंपा का फूल हुई

मैं चकोर सा तकता हूँ

तुम चंदा सी दूर हूई

 

जब पतझड़ में मेघ दिखा

तब यह पत्ता अकुलाया

ज्यों टूटा वो डाली से

हवा उसे ले दूर उड़ी

 

तपती बंजर धरती सा

बूँद बूँद को मन तरसा

जितना चलकर आता हूँ

यह मरीचिका खूब छली

 

सपन सरीखा है छलता

भान क्षितिज का यह मेरा

पनघट पर जल भरने जो

लाई गागर, थी फूटी

              - बृजेश…

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Added by बृजेश नीरज on July 8, 2013 at 10:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल : ख़ुदा को मस्जिद में पा गया जो वो दौड़ मयखाने जा रहा है

बहर : १२१२२ १२१२२ १२१२२ १२१२२

-----------------

नहीं मिला जो जहाँ में जिसको वही उसे खींचता रहा है

ख़ुदा को मस्जिद में पा गया जो वो दौड़ मयखाने जा रहा है

 

वो जिसने माँगी थी सीट मुझसे ये कहके ईश्वर भला करेगा

जरा सा आराम पा गया तो मुझी को अब वो भगा रहा है

 

दवा से जो ठीक हो रहा था उसे पिलाया पवित्र पानी

जो दिन में अच्छा भला था कल तक वो रात भर चीखता रहा है  

 

ख़ुदा का घर सब जिसे समझते वहीं हजारों हुये लापता

बने…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 8, 2013 at 10:07pm — 3 Comments

तन्हा- तन्हा, चुपके चुपके

 तन्हा- तन्हा, चुपके चुपके 

.

आँखों से आंसू बहते है 
धीरे- धीरे, चुपके से 
सब आंसू दुपट्टा पी लेता है 
कही कोई देख न ले ......
.
कितनी बाते हैं करने को
फिर भी लब सील के बैठी है
दर्द के साये में पलती धड़कन
चुपचाप सी चलती धड़कन
कहीं कोई सुन न ले ........
.
मांगी जब भी सूरज से…
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Added by Sonam Saini on July 8, 2013 at 9:30pm — 11 Comments

किरदार

किसी भूली कहानी का, कोई किरदार दिखता है,

मेरा क़स्बा मुझे , अब सिर्फ इक बाज़ार दिखता है।



कि जैसे सर के बदले, आईनें हों सबके कन्धों पर,

मुझे हर शख्स मुझसा ही, यहाँ लाचार दिखता है।



यही इक मर्ज़ है उसका ,दवा भी बस यही उसकी,

शहर, चाहत में पैसे की, बहुत बीमार दिखता है।



बचेगी किस तरह मुझमें, किसी मंजिल की अब हसरत,

समंदर के सफ़र में, बस मुझे मंझधार दिखता है।



न कोई रब्त है, ना गम, न कुछ बाकी तमन्नाएँ,

ये शायर शय से सारी, इन दिनों…

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Added by Arvind Kumar on July 8, 2013 at 4:30pm — 11 Comments

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी



भाषण में झूठे वादों से

अपने नापाक इरादों से

तुम ख्वाब दिखाके उड़ने के

खुद बैठे हो सैयादों से



बस नोट, सियासी इल्ली बन, तुम बोते हो सत्ताधारी   

भारत की अस्मत लुटने तक क्यूँ सोते हो सत्ताधारी



हर ओर मुफलिसी फांके हों  

यूँ रोज ही भले धमाके हों

कागज़ पे सुरक्षा अच्छी है

इस पर भी खूब ठहाके हों



पहले तो खेल सजाते हो फिर  रोते हो सत्ताधारी

भारत की अस्मत लुटने तक…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 8, 2013 at 3:30pm — 7 Comments

हाइकू

                         

                                                    (1)

                                   

                                               सजन मेरे 

                                            छनके है पायल

                                               नाम से तेरे 

   

                                                    (2)

                                                छनछनाती 

             …
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Added by Drshorya Malik on July 8, 2013 at 10:30am — 6 Comments

जगह जगह मधुशाला देखी

जगह जगह मधुशाला देखी , नल का पानी बंद मिला 

अंधी नगरी चौपट राजा , किससे शिकायत किससे गिला



दिया दाखिला सब बच्चों को , 

मिली पढ़ाई मात्र नाम की , 

कंप्यूटर मिल रहे खास को , 

बिजली पानी नही आम की , 

आँखो पर पट्टी है या फिर सबको दी है भंग पिला

गूंगे गाये गीत मान के

बहरे सुन सुन कर इतराएँ

अंधों भी उत्सुक हैं ऐसे

महज इशारों मे बौराएँ

बंदर सारे खेल कर रहे ""अजय" मदारी रहा खिला

मौलिक और…

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Added by ajay sharma on July 7, 2013 at 11:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल ५

 

221 2121 1221 212

बेख़ौफ़ सारी उम्र निकल जाये इस तरह

गिरने की बात हो न, संभल जाए इस तरह

 

तूफ़ान भी चले तो चरागा जला करे

दोनों ही अपनी राह बदल जाए इस तरह

 

हर सिम्त जिंदगी रहे, पुरजोश  बारहां

जो मौत का भी होश,बदल जाए इस तरह

 

फैले कहीं जो बाहें तो बच्चों सा दौड़कर

मिलने को हर इक शख्स मचल जाए इस तरह

 

आंसू किसी की आँखों का, हर आँख  से बहे 

इस शहर की फ़ज़ा भी बदल जाये इस तरह…

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Added by Dr Lalit Kumar Singh on July 7, 2013 at 10:40pm — 12 Comments

तलाश

अंतर मन में

अनंत  इच्छाएँ

बिल्कुल समन्दर

की लहरों की तरह

ठीक कुछ समय बाद

समाप्त हो जाती है

ऐसा लगता है कि

कितनी अपेक्षा से

प्रकृति ने जिन भावों

को जगाया था मन में

उन भावों को सपनो में

सजोकर बंदकर

अलसाई उनीदी आखे

फिर सोजाती है

तलाश है उस नीद की

जो  संतुष्टि के बाद

खुले आसमान के नीचे

बैभव से दूर बसुधा की माटी में

माँ के आँचल की तरह सुलाती है

सहलाती…
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Added by दिलीप कुमार तिवारी on July 7, 2013 at 8:00pm — 4 Comments

धूल और शिखर

कुछ शहनशाहों के तख़्त

कुछ ऊँचे पर्वतों के शिखर

कुछ ऊँचें अटार

कुछ ऊँचें लोग अपने कद से भी बहुत ऊँचे

आम आदमी पहुँच नहीं पाता उन तक

और सिर झुकाए निराश है

पर देखो

लाख किरकिराती है

किसी को फूटी आँख नहीं सुहाती है  

फिर भी धूल बही जाती है बेफिक्री में

बिना दुःख और मलाल के

और होता भी है यह है कि

आदी कैसी भी हो

अंत उसके सुपुर्द होता है  .... ~nutan~

मौलिक अप्रकाशित 

Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on July 7, 2013 at 5:30pm — 2 Comments

पल

तू तो वह पल है
जिसे मैंने पाला है
जिसको मैंने जिया है
जिसने मुझे रुलाया
और
हँसाया भी है
मुझे, तुमसे मिलाया भी है
और मुझको, मुझसे भी मिलाया है
पद दिया
मान दिया
सम्मान दिया
कभी अर्श पे
कभी फर्श पे
बैठाया ....
मगर पल का क्या
पल की आदत है
बीत जाना
तो वो पल था
जो छोड़ गया
ये पल है
कल ये भी न होगा
पल का क्या
पल की तो आदत है
बीत जाना ....

"मालिक व अप्रकाशित "

Added by Amod Kumar Srivastava on July 7, 2013 at 5:00pm — 5 Comments

पागल

हाथ में पत्थर उठाये वह पगली अचानक गाड़ी के सामने आ गयी तो डर के मारे मेरी चीख निकल गयी. बिखरे बाल, फटे कपडे, आँखों में एक अजीब सी क्रूरता पत्थर लिए हाथ ऊपर ही रह गया.लेकिन जाने क्यों वह ठिठक गयी पत्थर फेंका नहीं उसने .गाड़ी जब उसके बगल से गुजरी खिड़की के बहुत पास से उसके चेहरे को देखा.अब वहां एक अजीब सा सूनापन था.
कार के दूसरी ओर से एक ट्रक निकल गया. वह कार के पीछे की ओर भागी और ट्रक पर पत्थर फेंक दिया.आसपास दुकानों पर खड़े लड़के हंस रहे थे.वह पगली थी घोषित…
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Added by Kavita Verma on July 7, 2013 at 2:24pm — 7 Comments

स्वर्ग है फिर आपका क्या काम?

स्वर्ग है फिर आपका क्या काम? 

अमरनाथ गुफा हो, बद्रीनाथ, केदारनाथ, मान सरोवर, आदि प्राकृतिक स्थल की यात्रा हो...हर व्यक्ति लौटकर एक ही जवाब देता है......क्या स्वर्ग है. क्या देव भूमि है ...समझ में नहीं आता जब वो देव भूमि है, स्वर्ग है...तो आप वहां क्यों जा रहे हैं? देवों की पवित्र भूमि पर आप धरतीवासी कदम रखकर उनकी भूमि को अपवित्र क्यों कर रहे हो? क्या वहां जाने वाले सभी शुद्ध मन, विचार के होते हैं? क्या जिंदगी में दो नंबर का धन कमाने वाले भ्रष्ट आचरण के लोग वहां जाने से परहेज करते हैं?…

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Added by dinesh solanki on July 7, 2013 at 9:22am — 6 Comments

ग़ज़ल

२१२२    २१२२     २१२       १२

हाथ मिला के जो हमे  तन्हा जता गया

 साथ मन में चल रहा था वो बता गया

उस  को  केसे में दयालु मेरे दिल लिखूँ

जेसे वो भगवान बन दुनिया सता गया

फिर  चलेंगे  तो  हमारी  होगी कहानी

फिर क्या वो राह हम से कर खता गया

राह कब उस शहर की तरफ मुझे  ले गई 

राहबर  जिस का जाते हुए दे पता गया

दरख्त  बूढ़े  पै बैठा  तन्हा पक्षी मगर

जिंदगी  का  सच्च  राही को बता…

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Added by मोहन बेगोवाल on July 7, 2013 at 8:00am — 1 Comment

ग़ज़ल - हम और कोई निकले शिनाख्त में।

              ग़ज़ल 

 

आईनों से मिले थे बड़ी हसरत में,

हम और कोई निकले शिनाख्त में।

क्या आज फिर शह्र में लहू बरसा है?

अख़बार की सुर्खियाँ हैं दहशत में।

मुफ़लिसी क्या इतनी बुरी चीज़ है?            मुफ़लिसी - निर्धनता

आये हैं  दोस्त भी मुख़ालफ़त में।              मुख़ालफ़त - विरोध 

जल्द ही इमारती शह्र उग आएगा,

बो तो दिये गये हैं पत्थर दश्त में।             दश्त - जंगल 

उसे लगा आस्मां मुझे…

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Added by सानी करतारपुरी on July 7, 2013 at 3:30am — 1 Comment

*** कुण्डलिया छन्द ***

*** कुण्डलिया छन्द ***

==================

सच्चाई कॊ प्रॆम सॆ, कर लॊ तुम स्वीकार !

सदा दम्भ कॆ शीश पर, करतॆ रहॊ प्रहार !!

करतॆ रहॊ प्रहार, पनपनॆ कभी न पायॆ !

सुन्दर सहज विचार, सभी वॆदॊं नॆं गायॆ !!

कहॆं "राज"कविराज,करॊ जग मॆं अच्छाई !

नाम अमर हॊ जाय, निभायॆ जॊ सच्चाई !!१!!



ताना मारॆ तान कर, निन्दक मिलॆ पुनीत !

जीत गयॆ तॊ जीत है, हार गयॆ भी जीत !!

हार गयॆ भी जीत, भला अपना ही हॊता !

बिन साबुन औ नीर, चरित्र यही है धॊता !!

कहॆं… Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on July 6, 2013 at 6:19pm — 14 Comments

यूं ही बचपन गया शरारत में

यूं  ही बचपन गया शरारत  में

औ' जवानी गयी  मुहब्बत  में

और जो वक़्त जिंदगी के बचे

वो भी गुज़रे फ़क़त तिजारत में  



बादे मुश्किल मिले जो पल वो भी

हो गए रायगाँ शिकायत में

मुफ्लिसों को भला  बुरा  कहना

है शुमार आज सबकी आदत में



फूल बेलपत्र के अलावा शिव

जान  मांगे है अब ज़ियारत में



फ़ासला तू औ' मैं का जब न मिटे

तो मज़ा ख़ाक है मुहब्बत में



गाँव से वो कपास की कतरन

जाके चुनता है शह्रे सूरत…

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Added by Sushil Thakur on July 6, 2013 at 5:00pm — 5 Comments

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