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गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं

सार छंद / ललित छंद [प्रथम प्रयास]

छन्न पकैया छन्न पकैया के स्थान पर 

गुरु  का आओ सम्मान करें 

....................................................

गुरु का आओ सम्मान करें , 'गुरु' मतलब समझाएं

'गु' से होता अज्ञान तिमिर का, 'रु' से उसको हटाएँ

गुरु का आओ सम्मान करें ,गुरु पूर्णिमा आई

अज्ञान तिमिर का जो हर रहे ,सबके मन का भाई

गुरु का आओ सम्मान करें, अँधेरा दूर हटाएँ

गुरु दक्षिणा आज उसे देवें, ज्ञान प्रकाश…

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Added by Sarita Bhatia on July 22, 2013 at 8:00pm — 7 Comments

मेरे पिता

याद आ गया फिर

मुझे मेरा बचपन ,

पिता  की उंगली थामे,

नन्हें कदमों से नापना,

दूरियाँ, चलते चलते ,

वो थक कर बैठ जाना ,

झुक कर फिर पिता का ,

मुझको गोदी उठाना ,

चलते चलते मेहनत का,

पाठ वो धीरे से समझाना ।

 

बच्चों पढ़ना है सुखदाई,

मिले इसी मे सभी भलाई,

पहले कुछ दिन कष्ट उठाना,

फिर सब दिन आनंद मनाना,

फिर आ गया याद, 

 उनका ये  गुनगुनाना ,

सिर पर वो उनका हाथ,

भर देता है मुझमे…

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Added by annapurna bajpai on July 22, 2013 at 6:30pm — 13 Comments

क्यूँ तुम खामोश रहे .. माहिया

1

क्यूँ तुम खामोश रहे
पहले कौन कहे
दोनों ही तड़प सहे .


आसान नहीं राहे
पग पग में धोखा
थामी तेरी बाहें .


यह जीवन सतरंगी
राही चलता जा
है मन तो मनरंगी .


साचे ही करम करो
छल तो काला है
जीवन में रंग भरो .


- शशि पुरवार

मौलिक और अप्रकाशित

Added by shashi purwar on July 22, 2013 at 1:00pm — 9 Comments

मेरी पाती

मेरी पाती

मेरे नन्हे नन्हे पाँव,

पगडंडियों पर लम्बी दौड़,

पलकों में तिरती सुनहरी तितली,

फूलझड़ी से सपने -

सखी ! आज मैं उन सपनों को

मैके के झरोखों में टाँक आयी हूँ.

नभ का विस्तार,

धरती अम्बर का मिलन,

झिलमिल तारे पुँज,

सब मुझे लुभाते -

सखी ! मैं सितारों की चुनरी ओढ़

बाबुल का आकाश छोड़ आयी हूँ.

समुद्र की उत्ताल तरंगें,

रेत पर खींची लकीरें,

मेरे चुने हुए रंगीन सीपों का झुरमुट -…

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Added by coontee mukerji on July 22, 2013 at 2:14am — 17 Comments

है ज़मी पर शोर कितना [ग़ज़ल]

है ज़मी पर शोर कितना , आसमाँ खामोश है ।

मन में लाखों हलचलें हैं , आत्मा खामोश है ।

ना कभी करता सवाल , ना कभी देता जवाब ,

हमको देकर ज़िन्दगी , परमात्मा खामोश है ।

आदमीयत सड़ रही , लुट रहा बागे जहाँ ,

पर कहीं चुप चाप बैठा , बागबाँ खामोश है ।

चाहतें दुनिया की ज्यादा , देर तक चलती नहीं,

ताज़ की बरबादियों पर , शाहजहाँ खामोश है ।

जो हकीकत थे कभी, बनकर फ़साने रह गए ,

वक्त के हाथों लुटा , हर कारवाँ खामोश है…

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Added by Neeraj Nishchal on July 20, 2013 at 6:00pm — 18 Comments

गज़ल

शैक्षिक व्यस्तताओं तथा गाँव यात्रा के कारण काफी समय तक ओबीओ से दूर रहना पड़ा ! इतने दिनों में काफी याद आया अपना ये ओबीओ परिवार ! लगभग पाँच महीने बाद आज पुनः ओबीओ पर लौटा हूँ ! सर्वप्रथम सभी आदरणीय मित्रों को नमस्कार, तत्पश्चात ये एक छोटी-सी गज़ल नज़र कर रहा हू ! इसके गुणों-दोषों पर प्रकाश डालकर, मुझ अकिंचन को कृतार्थ करें ! सादर आभार !

अरकान : २१२२/२१२२

जिन्दगी की क्या कहानी !

गर नही आँखों में पानी !

भ्रष्टता…

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Added by पीयूष द्विवेदी भारत on July 20, 2013 at 4:30pm — 24 Comments

मेरी तुम

बहुत देर से 

धूप ही धूप  थी 

दूर तक

कोई दरख्त नहीं 

जिसकी छाँव तले मै 

आ जाऊं !

बहुत दिनों से

कंठ  सूखा था

दिनों तक कोई

लहर नहीं

जिसे जी भर मै

पी जाऊं !

कई जेठों  से

स्वेद की कितनी बूंदें

माथे छलछलाती थीं

कब शीतल पुरवाई में

समा जाऊं !

आ जाओ

बस आ ही जाओ

मेरी जिन्दगी 

छाँव, तृप्ति और श्वास

मेरी तुम !

-जीतेन्द्र…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 20, 2013 at 4:00pm — 29 Comments

भीगे घर-तन हाय! सहेली

!!! चौपाई !!!

//प्रत्येक चरण में 16 मात्राएं, अन्त में दो गुरू या एक गुरू दो लघु होता है। जगण-121 तथा तगण-221 निषेध है//

मेघ तुम्हारा तन है काला।

मन है निर्मल गंगा वाला।!

चाल तुम्हारी गड़बड़ झाला।

बोल कड़क बिजली भय वाला।।

बरसे झम-झम हवा झकोरे।

रिसता तरल अमी वन भोरे।।

खेत खलिहान हुए विभोरे।

कृषक चले तन हल धर जोरे।।

हरषे रिम-झिम सावन जैसे।

छपरा झर-झर झरता…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 20, 2013 at 10:12am — 12 Comments

अमरबेल

कभी कभी

खामोश हो जाते हैं शब्द।

 

जीवन में

कब अपना चाहा होता है

सब।

 

बहुत कुछ अनचाहा

चलता है संग।

इस दीवार से

झरती पपड़ियाँ;

दरारों में उगते

सदाबहार और पीपल;

गमले में सूखता

आम्रपाली।

 

दिये की रोशनी सहेजने में

जल जाती हैं उंगलियाँ।

 

गाँठ खोलने की कोशिश में

ढूंढे नहीं मिलता

अमरबेल का सिरा।

 

तुम

किसी स्वप्न सी खड़ी

बस…

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Added by बृजेश नीरज on July 20, 2013 at 10:00am — 25 Comments

मुक्तक - (रवि प्रकाश)

वज़न-।ऽऽऽ ।ऽऽऽ ।ऽऽऽ ।ऽऽऽ



1. नहीं शिकवा नज़ारों से अगर नज़रें फिसल जाएँ,

भले ख़ामोश आहों में सुहाने पल निकल जाएँ।

तेरी मग़रूर चौखट पे नहीं मंज़ूर झुक जाना,

हमेशा का अकेलापन भले मुझ को निगल जाए॥

.

2. तुम्हारे रूप की गागर न जाने कब ढुलक जाए,

चटख रंगीनियों में भी पुरानापन झलक जाए।

मगर मेरी मुहब्बत तो सदानीरा घटाएँ है,

वहीं अंकुर निकलते हैं जहाँ पानी छलक जाए॥

.

3. किसी जुम्बिश में धड़कन के अभी अहसास बाक़ी है,

अपरिचित आहटों में भी तेरा…

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Added by Ravi Prakash on July 20, 2013 at 7:00am — 15 Comments

औरत

 

    औरत

 

मैंने  

औरत बन जन्म लिया

हाँ मैं हूँ

एक औरत 

और औरत ही

बनी रहना चाहती हूँ

क्यूंकि

मैं इक बेटी हूँ

मैं इक बहन हूँ

मैं इक पत्नी हूँ

सर्वोपरि इक माँ हूँ

मैं इक पूरी कौम हूँ

 

एवं

इनसे जुडे हर रिश्ते

की बिन्दू हूँ मैं

वो सभी घूमते रहते हैं

मेरे चारों ओर

एक वृत्त की तरह

 

और मैं

चाहे…

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Added by vijayashree on July 19, 2013 at 10:32pm — 15 Comments

लघुकथा : एकलव्य

द्रोणाचार्य आश्चर्यचकित थे। कुत्ते को बिना कोई नुकसान पहुँचाये उसका मुँह सात बाणों से भरकर बंद कर दिया था एकलव्य ने। ये विद्या तो द्रोणाचार्य ने कभी किसी को नहीं सिखाई। एकलव्य ने उनकी मूर्ति को गुरु बनाकर स्वाध्याय से ही धनुर्विद्या के वो रहस्य भी जान लिये थे जिनको द्रोणाचार्य अपने शिष्यों से छुपाकर रखते थे।

 

द्रोणाचार्य को रात भर नींद नहीं आई। उन्हें यही डर सताता रहा कि एकलव्य ने अगर स्वाध्याय से सीखी गई धनुर्विद्या का ज्ञान दूसरों को भी देना शुरू कर दिया तो द्रोणाचार्य के…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 19, 2013 at 9:00pm — 12 Comments

पानी की बूँदें...

बरसे बदरा नीर बहाये

ज्यों गोरी घूँघट शरमाये

चाल चले ऐसी मस्तानी

ज्यूँ बह चली पुरवा रानी

बादल गरजे प्रेमी तड़पे

झलक तेरी को गोरी तरसे

आजा अंगना दरस दिखा जा

नयन मेरे तू शीतल कर दे

ज्यूँ घटा का रूप लेके

यूँ लटें चेहरे पर छाई

मोती सी पानी की बूंदें

छलक रही चेहरे पर ऐसे

स्पर्श तेरा स्वर्णिम पाने को

पानी की बूँदें भी तरसे.

"मौलिक व…

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Added by Aarti Sharma on July 18, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

llमुहब्बत लिख देंगेll

मात्रा बह्र 

2 2 /  22 / 22 / 22 / 22 / 2

सोचा हमने तुमको इक ख़त लिख देंगे।

और तुम्हारी एक शिकायत लिख देंगे।।



ये जंग न हो दुनियाँ में मेरे मौला ।

दुनिया भर के नाम इबारत लिख देंगे।।



कर सकते हो हर एक खता दुनिया में। 

हम ये तेरे नाम इजाजत लिख देंगे।।



मिलते मिलते बिछड़ा है वो भी मुझसे।

करता मेरा यार सियासत लिख देंगे।।



इक दिन मिट जायेगा पूरा ये ज़माना।

होगी जो मातम की सूरत लिख देंगे।।



दिल…

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Added by Ketan Parmar on July 18, 2013 at 9:00pm — 17 Comments

जिद अपनी छोड़े ना

देहरी लांघ चली

आशाएं

मुंह बाएं प्रीत

भगोना

अँखुवाती भर देह

विवशता

जिद अपनी छोड़े ना

आदिम सब

चट्टान…

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Added by राजेश 'मृदु' on July 18, 2013 at 4:30pm — 5 Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-५०

मणिपुर में बिताए दिन सपनों जैसे थे. एक रूमानी फ़साने की तरह जिसमें एक राजकुमार, एक राजकुमारी और पंख लगा कर उड़ने और उड़ाने को ढेर सारे ख्व़ाब थे. हक़ीकत जहां इक पहाड़ की तरह सीना तान कर खड़ी थी वहीं रूमानियत की रुपहली फंतासी नस-नस में नशा घोल रही थी. ज़िंदगी में हर चीज़ का इक मुअय्यन (तय) वक़्त होता है- मुहब्बत के दौर में अल्हड़ और अंजान बने बेफ़िक्र जीते रहे और फ़र्ज़ के दौर में दिल लगा के कई अपनों का दिल तोड़ दिया.

 

घुमावदार…

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Added by राज़ नवादवी on July 18, 2013 at 4:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-४७

ज़िंदगी भी क्या मज़ाक़ है? माज़ी को अपने शानों (कांधों) से पीछे मुड़कर देखो, सब एक मज़ाक़ ही तो है. जवानी का जोशोखरोश, कमसिनी (कमउम्री) की नाज़ुकी, वफ़ा की दोशीज़गी (तरुणावस्था), लबेचश्म (आँखों के किनारे) हैरान मुहब्बत की मजबूरियां, पएविसाल (मिलन के लिए) माशूक का जज़्बाएइंतेशार (उलझन का भाव), किसी तनहा शाम के धुंधलके में लौटते कदमों की चीखती सी आहटें.....उससे मिलके घर लौटते सफ़र की कचोटती तनहाइयाँ, घर के गोशे गोशे में (कोने कोने में) दुबकी वीरानियाँ, दीवार पे लटकती तस्वीरों की तरह अपना लटका…

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Added by राज़ नवादवी on July 18, 2013 at 4:00pm — No Comments

खोज

मैं लिखा करता हूँ

भाव की ध्वनियों को;

उतारता हूँ

नए शब्दों में

नए रूपों में।

 

रस, छंद, अलंकार

तुक, अतुक

सब समाहित हो जाते हैं

अनायास।

ये ध्वनि के गुण हैं;

शब्द के श्रंगार।

इन्हें खोजने नहीं जाता।

 

मुझे तो खोज है

उस सत्य की

जिसके कारण

मैं सब कुछ होते हुए भी

कुछ नहीं

और कुछ न होते हुए भी

सब कुछ हो जाता हूँ।

 

शायद किसी दिन

किसी…

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Added by बृजेश नीरज on July 18, 2013 at 3:00pm — 20 Comments

एक बेबस आत्मा

शून्य की गहरा अन्धकार में

भटक रही एक बेबस आत्मा ..

न कोई अपना उसका

न कोई सपना ....

रोंदू एक मोम सी गुडिया

रो रही थी उन सीढियों पर

छोड़ गई थी कोई बेबस माँ

उस भगवान की द्वार ...

रोंदू सी वह गुडिया रोए जा रही थी ...

रोती हुई गुडिया को देख

वह आत्मा कुछ ऐसे बिल्ल्ख गई

बहक गई ...

ममता जो उसकी जगगई ...

बेबस वह बच्ची को गोद में लेने

तड़प रही ...

न था उसका हाथ,

न था उसका पैर

एक हवा बन कर सहलाती रही ..

न थी वह…
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Added by Lata tejeswar on July 18, 2013 at 1:30pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने-४८ (टाटा साल्ट की तरह फ्री फ्लोइंग)

वो बिलकुल साफ़ ओ सफ्फाफ़ थी, टाटा साल्ट की तरह फ्री फ्लोइंग, एक एक दाने की तरह उसकी शख्सियत के रेज़े (कण) धुले धुले और चमकते से. मगर साथ साथ हालात-ओ-सिफात (स्थितियां और स्वभाव) की बंदिशें (बंधन) भी आयद (लागू) थीं और कुदरत (प्रकृति) ने हमारी निस्बतों की हदें (मिलने जुलने की सीमाएं) और मुबाहमात की मिकदार (संबंधों की मात्रा) तय कर दी थी. हम मिल तो सकते थे, मगर घुल मिल नहीं सकते थे...एक दूसरे को चाह और समझ तो सकते थे मगर एक दूसरे में शामिल नहीं हो सकते थे...वरना तमाम रिश्तों के ज़ायके बिगड़…

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Added by राज़ नवादवी on July 18, 2013 at 1:00pm — 2 Comments

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