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दोहा -५ प्रेम पीयूष

सुन्दर प्रिय मुख देखकर, खुले लाज के फंद।

नयनों से पीने लगा, भ्रमर भाँति मकरन्द !!१

प्रेम जलधि में डूबता ,खोजे मिले न राह !

विकल हुआ बेसुध हृदय, अंतस कहता आह!!२

प्रेम भरे दो बोल मधु,स्वर कितने अनमोल !

कानों में सबके सदा ,मिश्री देते घोल !!३

रवि के जाते ही यहाँ ,हुई मनोहर रात !

चाँद निखरकर आ गया,मुझसे करने बात !!४

अधर पंखुड़ी से लगें ,गाल कमल के फूल !!

ऐसी प्रिय छवि देखकर, गया स्वयं को…

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Added by ram shiromani pathak on September 30, 2013 at 6:30pm — 32 Comments

चारा पाती गाय, हुई रौनक गौशाले

गौशाले में गाय खुश, बछिया दिखे प्रसन्न |
बछिया के ताऊ खफा, छोड़ बैठते अन्न |


छोड़ बैठते अन्न, सदा चारा ही खाया |
पर निर्णय आसन्न, जेल उनको पहुँचाया |


करते गधे विलाप, फायदा लेने वाले |
चारा पाती गाय, हुई रौनक गौशाले ||

मौलिक / अप्रकाशित

Added by रविकर on September 30, 2013 at 5:20pm — 11 Comments

किसी सफ़र से कम नहीं है मेरी जिंदगी ----------------

किसी सफ़र से कम नहीं है मेरी जिंदगी !

कुछ पल ठहरी , और फिर चल दी!

ना राहो का पता , ना मंजिल की खबर !

भटक रहा हूँ कभी इस डगर, कभी उस डगर !

कभी सर्दी की ठिठुरन , कभी गर्म लू के थपेड़े !

कभी खुशियों की आहट , कभी गम के घेरे !

कभी बारिश का मौसम , कभी दिन के उजाले !

कभी विष के घूंट , कभी मय के प्याले !

ना कोई हमराह , ना कोई संगी साथी !

मगर बढ़ते कदम ये है की रुकते नहीं है !

मीलों चल चुके है मगर थकते नहीं है !

ना है कोई…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 30, 2013 at 4:38pm — 7 Comments

समन्दर की लहरों सी है जिन्दगानी

1  2 2 1   2 2 1 2   2 1 2 2

समन्दर की लहरों सी है जिन्दगानी
कभी बर्फ गोला कभी बहता पानी

उदासी के बूटे जड़े हैं सभी में
हो तेरी कहानी या मेरी कहानी

बुढ़ापे में होने लगी ताज़पोशी
किसी काम की अब नहीं है जवानी

ये मौजें भी अब मुतमइन सी हैं लगती
नहीं है वो जज्बा नहीं वो रवानी

नये ये नज़ारे बहुत दिलनशीं हैं
मगर मुझको भाती हैं चीज़ें पुरानी

अमित दुबे अंश  मौलिक व अप्रकाशित

Added by अमित वागर्थ on September 30, 2013 at 2:00pm — 14 Comments

रहने दो - (रवि प्रकाश)

रहने दो

मुक्ता-माला

जटाजूट

चाहे दे दो।

बहने दो

यौवन-हाला

गरल-घूँट

चाहे दे दो॥

तुम रखना

मधुशालाएँ

कालकूट

मुझको देना।

तुम रचना

जयमालाएँ

भस्म-भूत

मुझको देना॥



पा लेना

आधार तुम्हीं

निराधार

चाहे दे दो।

गा लेना

गौरव-गाथा

व्यथा-भार

चाहे दे दो॥

चूर करो

मंज़िल मेरी

चकफेरी

फिर मुझको दो।

दूर करो

बंसी-वीणा

रणभेरी

फिर मुझको दो॥



थोड़े… Continue

Added by Ravi Prakash on September 30, 2013 at 1:12pm — 18 Comments

जवाँ दिल है,धड़कने दो

**जवाँ दिल है,धड़कने दो |**

जवाँ दिल है, धडकनें भी,

ये धड़केंगी,

धड़कने दो |

नसों में लावा बहता है,

लहू बन के,

फड़कने दो ||



वतन के काम आएगा,

हर एक कतरा,

एक-एक बूँद ,

बंधी बेड़ी-जंज़ीरों को,

हौंसलों से,

तड़कने दो ||



उठो जागो कमर बाँधो,

विजय पथ पे,

अग्रसर हो | 

खटकते हो गर दुश्मन की,

आँखों में,

खटकने दो…

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Added by Jitender Kumar Jeet on September 30, 2013 at 1:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल- बातें करें !

बह्रे रमल मुसम्मन महज़ूफ़

================

2122/ 2122/ 2122/ 212



हैं परे सिद्धांत से, आचार की बातें करें;

भोथरे जिनके सिरे हैं, धार की बातें करें;।।1।।



मछलियाँ तालाब की हैं, क्या पता सागर कहाँ?

पाठ जिनका है अधूरा, सार की बातें करें;।।2।।



उँगलियाँ थकने लगीं हैं, गिनतियाँ बढ़ने लगीं,

जब जहाँ मिल जाएँ, बस दो-चार की बातें करें;।।3।।



इन पे यूँ अपनी तिजारत का जुनूं तारी हुआ,

लाश के…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on September 30, 2013 at 12:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल -ऐसा प्यार अमर होता है - पूनम शुक्ला

2222 2222

हाँ ऊँचा अंबर होता है
पर धरती पर घर होता है

तुम हो आगे हम हैं पीछे
ऐसा तो अक्सर होता है

इक लय में गाते जब दोनों
ऐसा प्यार अमर होता है

प्रेम नहीं बस तू तू मैं मैं
वो भी कोई घर होता है

बन जाता जो रेत सजीला
वो भी तो पत्थर होता है

रुक जाते हैं पाँव जहाँ पर
देखा तेरा दर होता है

तू ही जाने किस गरदन पर
जाने किसका सर होता है

पूनम शुक्ला
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Poonam Shukla on September 30, 2013 at 11:01am — No Comments

कुण्डलियाँ

देना युवकों को सभी ,देश की अब कमान
ये हैं भविष्य देश का, इनसे ही है शान
इनसे ही है शान, जानलो इनको प्रहरी
करते नव निर्माण बात यह समझो गहरी
उज्जवल हो भविष्य, सभी से सम्मति लेना
करके मार्ग प्रशस्त ,साथ है इनका देना //

............मौलिक व अप्रकाशित............

Added by Sarita Bhatia on September 30, 2013 at 9:00am — 7 Comments

हमारे ज़माने में माएं

मैं कैसे बताऊँ बिटिया

हमारे ज़माने में माँ कैसी होती थी

तब अब्बू किसी तानाशाह के ओहदे पर बैठते थे

तब अब्बू के नाम से कांपते थे बच्चे

और माएं बारहा अब्बू की मार-डांट से हमें बचाती थीं

हमारी छोटी-मोटी गलतियां अब्बू से छिपा लेती थीं

हमारे बचपन की सबसे सुरक्षित दोस्त हुआ करती थीं माँ

हमारी राजदार हुआ करती थीं वो

इधर-उधर से बचाकर रखती थीं पैसे

और गुपचुप देती थी पैसे सिनेमा, सर्कस के लिए

अब्बू से हम सीधे कोई…

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Added by anwar suhail on September 29, 2013 at 9:30pm — 5 Comments

भोर लो आ गयी

थाल किरणों का सजाकर

भोर देखो आ गयी

रात भी थक-हारकर

फिर जा क्षितिज पर सो गयी

 

चाँद का झूमर सजा

रात की अंगनाई में

और तारे झूमते थे

नभ की अमराई में

चाँदनी के नृत्य से

मदहोशियाँ सी छा गयी

तब हवा की थपकियों से

नींद सबको आ गयी

 

सूर्य के फिर आगमन की

जब मिली आहट ज़रा

जगमगाया आकाश सारा

खिल उठी ये धरा

छू लिया जो सूर्य ने

कुछ यूँ दिशा शरमा गयी

सुर्ख उसके गाल…

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Added by बृजेश नीरज on September 29, 2013 at 6:30pm — 30 Comments

ग़ज़ल : तुम्हारा प्रेम ही - अरुन शर्मा 'अनन्त'

(बह्र: हज़ज़ मुसम्मन सालिम )

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन

तुम्हारा प्रेम ही अक्सर मुझे मगरूर करता है

तुम्हारा प्रेम ही अक्सर मुझे मजबूर करता है



तुम्हारा प्रेम ही खुशियों का इक साधन मेरी खातिर

तुम्हारा प्रेम ही खुशियों से कोसो दूर करता है,



तुम्हारा प्रेम ही हिम्मत मुझे मुश्किल घड़ी में दे,

तुम्हारा प्रेम ही तो हौंसला भी चूर करता है



तुम्हारा प्रेम ही मरहम बने जख्मों…

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Added by अरुन 'अनन्त' on September 29, 2013 at 3:18pm — 28 Comments

मेरी एक आरजू !-------------कविता

आरजू है माँ कि फिर लौट आऊँ तेरे आँचल की छाँव में !

उन बचपन की गलियों में , उस बचपन के गाँव में !

वो तेरी ममता के साए , वो रातो की लौरी !

वो गय्यियो का माखन , वो दूध की कटोरी !

वो बचपन के संगी साथी , वो गाँव के गलियारे !

लगते थे मुझको स्वर्ग से भी प्यारे !

वो राजा रानी के किस्से , परियो की कहानी !

याद है मुझको आज भी जबानी !

अमृत सा रस लिए वो तेरे हाथो का निवाला !

वो गर्मी का मौसम , वो सर्दी का पाला !

अपने सीने से…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on September 29, 2013 at 3:00pm — 5 Comments

गजल

जाते-जाते वो मुझे लाकर की चाबी दे गया।

माल तो सब ले गया लाकर वो खाली दे गया।



मैं कभी तहजीब से बाहर निकल पाया नही ,

एक अदना आदमी फिर मुझको गाली दे गया।

उसने मेरी सादगी का यूँ उठाया फायदा ,

छीनकर दिन का उजाला रात काली दे गया।

जब भुनाने मैं गया उस रोज सेंट्रल बैंक में ,

तब पता मुझको चला कि चेक वो जाली दे गया।

रोटियाँ जो बांटने आया था भूखों को वही ,

खा गया खुद रोटियाँ आधी औ आधी दे गया।

अच्छे -अच्छे पारखी…

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Added by Ram Awadh VIshwakarma on September 29, 2013 at 10:00am — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
इन्द्रजाल ......(दोहावली)// डॉ० प्राची

आँख मिचौली खेलता, मुझसे मेरा मीत 

अंतरमन के तार पर, गाए मद्धम गीत 

जैसे सूरज में किरण, चन्दन बसे सुगंध 

प्रियतम से है प्रीत का, मधुरिम वह सम्बन्ध  

क्यों अदृश्य में खोजता, मनस सत्य के पाँव 

सहज दृश्य में व्याप्त जब, उसकी निश्छल छाँव 

संवेदन हर गुह्यतम, सहज चित्त को ज्ञप्त

आप्त प्रज्ञ सम्बुद्ध वो, ज्ञानांजन संतृप्त 

प्रीत प्रखरता जाँचती, नित्य नियति की चाल 

मोहन लोभन…

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Added by Dr.Prachi Singh on September 29, 2013 at 1:30am — 28 Comments

ज़िन्दगी...

उठती टीस हृदयतल से

क्यूँ ये बेरंगी लगती है

घाव अनंत देती कभी तो

उमंगों से जीवन भरती है....

कभी लगती रति कामदेव की 

तो लगती कभी मधुशाला है 

तिनका तिनका करके बनती 

सुखद घरोंदा कभी लगती है.... 



लगती कभी  नववधू जैसी 

आलिंगन प्रेम का करती है 

कभी नाचती गोपियों जैसी

मुरली मधुर जब सुनती है .....

फिर भी ये ज़िन्दगी है

जीने का दम भरती है

शुन्य से शुरू होती…

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Added by Aarti Sharma on September 28, 2013 at 9:30pm — 12 Comments

अधूरी लड़ाइयों का दौर

एक धमाका 

फिर कई धमाके 

भय और भगदड़....



इंसानी जिस्मों के बिखरे चीथड़े 

टीवी चैनलों के ओबी वैन 

संवाददाता, कैमरे, लाइव अपडेट्स 

मंत्रियों के बयान 

कायराना हरकत की निंदा 

मृतकों और घायलों के लिए अनुदान की घोषणाएं 



इस बीच किसी आतंकवादी संगठन द्वारा 

धमाके में लिप्त होने की स्वीकारोक्ति 

पाक के नापाक साजिशों का ब्यौरा 

सीसीटीवी कैमरे की जांच 

मीडिया में हल्ला, हंगामा, बहसें 

गृहमंत्री, प्रधानमन्त्री से स्तीफे…

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Added by anwar suhail on September 28, 2013 at 8:00pm — 6 Comments

दो कुंडलियाँ - रविकर

(1)

हे अबलाबल भगवती, त्रसित नारि-संसार।

सृजन संग संहार बल, देकर कर उपकार।

 

देकर कर उपकार, निरंकुश दुष्ट हो रहे ।

करते अत्याचार, नोच लें श्वान बौरहे।

 

समझ भोग की वस्तु, लूट लें घर चौराहे ।

प्रभु दे मारक शक्ति, नारि क्यूँ सदा कराहे ॥

-----------------------------------------------

(2)

प्रणव नाद सा मुखर जी, पाता है सम्मान |

मौन मृत्यु सा बेवजह, ले पल्ले अपमान |

ले पल्ले अपमान , व्यर्थ मुट्ठियाँ भींचता…

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Added by रविकर on September 28, 2013 at 6:30pm — 10 Comments

जीवन के रेगिस्तान में

जाने कितने बसंत

शीत,पतझड़, सावन

आये गये

तपती,भीगती,ठिठुरती

मुरझाती पर फिर भी

चलती रही अनवरत

हाँफती,दौड़ती,पसीजती

डोर अपनी साँसों की पकड़े

कोलाहल अंतर का समेटे

मूक, निःशब्द बस्

अपने काफिले के साथ

बढ़ती ही गई

जीवन के पथ पर !!



अपनी साँसें संयत करने को

रुकी इक पल को

पीछे मुड़ कर देखा जो

छोड़ गये थे सभी मुझको

मेरे पीछे था अब सुनसान

आगे वियावान

नीचे तपती रेत

ऊपर सुलगता आसमान…

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Added by Meena Pathak on September 28, 2013 at 4:08pm — 14 Comments

उलटी इनकी चाल - आज की राजनीतिक घटना के सन्दर्भ में

चाल चला जब हंस की, बगुला बहुत सयान

बगुला खाया मात तब, खोया अपना मान

खोया अपना मान, इस्तीफे की है मांग

बात बड़ेन की मान, है टूटी छोटी  टांग

कह सागर कविराय, नेता इनका है बाल

इन्हीं को अब पड़ी, है उलटी इनकी चाल

आशीष ( सागर सुमन ) 

मौलिम एवं अप्रकाशित

Added by Ashish Srivastava on September 27, 2013 at 11:00pm — 10 Comments

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