जाग रे मन !
कब तक यूं ही सोएगा
जग मे मन को खोएगा
अब तो जाग रे मन !!
1)
सत्कर्मों की माला काहे न बनाई
पाप गठरिया है सीस धराई
जाग रे !!!!
2)
माया औ पद्मा कबहु काम न आवे
नात नेवतिया साथ कबहु न निभावे
जाग रे !!!!
3)
दिवस निशि सब विरथा ही गंवाई
प्रीति की रीति अबहूँ न निभाई
जाग रे !!!!!
4)
सारा जीवन यही जुगत लगाई
मान अभिमान सुत दारा पाई
जाग रे…
ContinueAdded by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 5:30pm — 10 Comments
गज़ब हैं रंग जीबन के गजब किस्से लगा करते
जबानी जब कदम चूमे बचपन छूट जाता है
बंगला ,कार, ओहदे को पाने के ही चक्कर में
सीधा सच्चा बच्चों का आचरण छूट जाता है
जबानी के नशें में लोग क्या क्या ना किया करते
ढलते ही जबानी के बुढ़ापा टूट जाता है
समय के साथ बहना ही असल तो यार जीबन है
समय को गर नहीं समझे समय फिर रूठ जाता है
जियो ऐसे कि औरों को भी जीने का मजा आये
मदन ,जीबन क्या ,बुलबुला है, आखिर फुट जाता है
मदन मोहन सक्सेना
मौलिक व…
ContinueAdded by Madan Mohan saxena on January 16, 2014 at 1:53pm — 6 Comments
तुम पथिक, आए कहाँ से,
कौनसी मंज़िल पहुँचना?
इस शहर के रास्तों पर,
कुछ सँभलकर पाँव धरना।
बात कल की है, यहाँ पर,
कत्ल जीवित वन हुआ था।
जड़ मशीनें जी उठी थीं,
और जड़ जीवन हुआ था।
देख थी हैरान कुदरत,
सूर्य का बेवक्त ढलना।
जो युगों से थे खड़े
वे पेड़ धरती पर पड़े थे।
उस कुटिल तूफान से, तुम
पूछना कैसे लड़े थे।
याद होगा हर दिशा को,
डालियों का वो…
ContinueAdded by कल्पना रामानी on January 16, 2014 at 10:30am — 26 Comments
तू बहादुर बेटी है पंजाब की
तू शान आन और बान है हमारे घर की
तू झाँसी की रानी है
तुझे क्या डर अकेले
दुनिया के किसी भी कोने में जा सकती हो
हाँ
ऐसे ही तो कहते थे ना हमेशा
जब कहती थी
मेरे साथ कहीं चलने को
आज समझा रहे थे मुझे
पगली क्यों रोती है ?
तेरे अंग संग हूँ हमेशा
तेरे साथ अपनी दोनों भुजाएं
अपने दो बेटे छोड़ आया हूँ
तुम्हे जरुरत नहीं
किसी का मुँह ताकने की
दोस्त जो नहीं पूछते मत कर चिंता
जो साथ हैं उनका कर…
Added by Sarita Bhatia on January 16, 2014 at 10:01am — 10 Comments
संस्कृति का क्रम अटूट
पांच हज़ार वर्षों से
अनवरत घूमता
सभ्यता का
क्रूर पहिया.
दामन में छद्म ऐतिहासिक
सौन्दर्य बोध के बहाने
छुपाये दमन का खूनी दाग,
आत्माभिमान से अंधी
पांडित्य पूर्ण सांस्कृतिक गौरव का
दंभ भरती
सभ्यता.
मोहनजोदड़ो की कत्लगाह से भागे लोगों से
छिनती रही
अनवरत,
उनके अधिकार,
किया जाता रहा वंचित,
जीने के मूलभूत अधिकार से,
कुचल कर सम्मान
मिटा दी…
ContinueAdded by Neeraj Neer on January 16, 2014 at 9:58am — 11 Comments
दिल पर रख कर हाथ तुम, कर लो कुछ विचार ।
देश धर्म के रक्षण पर, करते निज उपकार ।।
समय अभाव सभी कहे, समय साथ ना कोय ।
साथ समय का जो चले, निर्धनता ना होय ।।
समय बहुमूल्य रत्न है, मिले सदा बेमोल ।
पर्स रखे जो वक्त को, मगन रहे दिल खोल ।।
हल्ला भ्रष्टाचार का, करते हैं सब कोय ।
जो बदलें निज आचरण, हल्ला कैसे होय ।।
घुसखोरी के तेज से, तड़प रहे सब लोग ।
रक्तबीज के रक्त ये, मिटे कहां मन लोभ ।।
मिट रहा अपनापन अब, नही बचा चितचोर…
Added by रमेश कुमार चौहान on January 16, 2014 at 9:04am — 13 Comments
1222 1222 1222 1222
बहुत गुमसुम सी लगती है
ज़बाँ खामोश रहती है, निगाहें कुछ नही कहतीं
अगर जज़्बा न हो दिल में, तो बाहें कुछ नही कहतीं
यहाँ के हादसों का सच,…
ContinueAdded by गिरिराज भंडारी on January 16, 2014 at 8:30am — 32 Comments
तुम क्या जानो जी तुमको हम
कितना 'मिस' करते हैं...
तुम्हे भुलाना खुद को भूल जाना है
सुन तो लो, ये नही एक बहाना है
ख़ट-पद करके पास तुम्हारे आना है
इसके सिवा कहाँ कोई ठिकाना है...
इक छोटी सी 'लेकिन' है जो बिना बताये
घुस-बैठी, गुपचुप से, जबरन बीच हमारे
बहुत सताया इस 'लेकिन' ने तुम क्या जानो
लगता नही कि इस डायन से पीछा…
Added by anwar suhail on January 15, 2014 at 9:01pm — 5 Comments
आँखों में जो स्वप्न बसाये तूने,
अब उन्हें मुझे पूरा करना है।
माना बहुत दूर है किनारा मेरा,
पर उस तक मुझे पहुँचना है।
कुछ भूल रहा था मेरा हृदय,
कुछ ध्यान भटक गया था।
थी घोर निराशा मुझे घेरे हुए,
जिसमें जीवन अटक गया था।
तुमने मुझे आगे बढ़ाकर कहा,
नहीं,अभी तुम्हें ऐसे रूकना है।
आँखों में जो स्वप्न बसाये तूने,
अब उन्हें मुझे पूरा करना है।
मेरे टूटे हुए विश्वास को जगाया,
तुमने आशा से प्रकाशित किया।
दूर कर मेरे हृदय की निराशा…
Added by Savitri Rathore on January 15, 2014 at 8:47pm — 21 Comments
Added by atul kushwah on January 15, 2014 at 8:30pm — 9 Comments
वंदना
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
विद्द्या का मुझको भी वरदान दे माँ
करूँ मै भी सेवा तेरी उम्र भर
मुझमे भी ऐसा कोई ‘भाव’ दे माँ
हे शारदे माँ , .......
चलूँ मै भी हरदम सत्यपथ पर
कभी भी न मुझसे कोई चूक हो माँ
हे शारदे माँ ,...........
दिखें जो दुखी-दीन आगे मेरे
कुछ सेवा उनकी भी मै कर सकूं माँ
हे शारदे माँ ,...............
जिह्वा जो खोलूँ तू वाँणी मे हो
चले जो कलम तो तू शब्द दे माँ
हे शारदे…
Added by Meena Pathak on January 15, 2014 at 5:00pm — 13 Comments
नित्यानंदम स्तयं निरूपम !
श्यामल गंभीर रात्रि
सुनता हूँ संवेदनमय स्वर
"विचारों में गुँथे, वेदना से बिंधे
अस्वीकृत एकाकी मन
तू उदास न हो"
टूटे संबंधों के
वीरान प्रवहमान प्रसारों में
कल की पुरानी किसी की
प्यार भरी हँसी, स्नेहमयी आँखों में
देखो, शायद सुख-शांति मिल जाए
देखो उन आँखों में, इतना न देखो
कि तुम्हें अनजाने
अज्ञात दर्द कोई और मिल जाए
मानवीय…
ContinueAdded by vijay nikore on January 15, 2014 at 2:30pm — 20 Comments
Added by अजय कुमार सिंह on January 15, 2014 at 2:04pm — 12 Comments
मुश्किल में हूँ कान्हा
कैसे तोहे नैनों में बसाऊँ
मेरे श्याम सांवरे
कैसे तोहे मीठे बैन सुनाऊं
कभी तेरे कुंडल मोहें मोहे
कभी माथे की बिंदिया
कभी तेरी बंसी छेड़े मोहे
कभी अँखियाँ छीने निंदिया
मुश्किल में हूँ कान्हा
कैसे तोहे नैनों में बसाऊँ
लाल-पीली पगड़ी पे कान्हा
मोती बन माथे पे लटक जाऊं
कभी होठों की लाली मोहे मोहे
कभी भाल का चन्दन
कभी तेरी बतियां सोहे मोहे
कभी राधिका…
Added by Poonam Matia on January 15, 2014 at 1:30am — 12 Comments
"स्वार्थ और प्यार "
मानव बिकाऊ है जमी पर , मानवता की आड़ में।
ईमान बिकता है यहाँ पर , धर्म जाए भाड़ में ।।
भ्रष्टाचार का खू लगा है ,हर मानव की दाड़ में।
ऐसा बिगाड़ा इंसा जैसे ,बच्चा बिगड़ता लाड़ में।।
स्वार्थ की खातिर बेचा देश , दुनियाँ के बाजार में।
वतन किया नीलाम देखो ,मानव के सरदार ने।।
प्यार कभी न बजता यारों ,खुदगर्जी के साज में।
और कभी न स्वार्थ टिकता ,दिलबर के दरबार में।।
इन दोनों का साथ तो जैसे ,जल पावक के साथ…
Added by chouthmal jain on January 14, 2014 at 10:30pm — 14 Comments
2 2 1 2 1 2 1 1 2 2 1 2 1 2
अब राजनीति सबकी रगों में समा गई
विश्वास खो गया,तो कंही आस्था गई ।।
मैं देखता हूँ मेरे नगर में ये क्या हुआ,
लडकी खुशी-खुशी से ही इज्जत लुटा गई।
हर मोड पर जो शहर के आवारगी खडी,
मैं क्या करूँ बजुर्गों की चिन्ता बढा गई।
बादल न जाने किसके हवन पर गया कंही,
रूठी हुई सी तन्हा अकेली हवा गई।
महफिल में ही किसी ने मेरी बात छेड दी,
सुनते ही इतना रूप की गागर लजा…
ContinueAdded by सूबे सिंह सुजान on January 14, 2014 at 10:30pm — 25 Comments
कितनी दूर से बुलाये गये
नाचने वाले सितारे
कितनी दूर से मंगाए गए
एक से एक गाने वाले
और तुम अलापने लगे राग-गरीबी
और तुम दिखलाते रहे भुखमरी
राज-धर्म के इतिहास लेखन में
का नही कराना हमे उल्लेख
कला-संस्कृति के बारे में...
का कहा, हम नाच-गाना न सुनते
तो इत्ते लोग नही मरते...
अरे बुडबक...
सर्दी से नही मरते लोग तो
रोड एक्सीडेंट से मर जाते
बाढ़ से मर जाते
सूखे से मर जाते
मलेरिया-डेंगू से मर जाते …
Added by anwar suhail on January 14, 2014 at 9:30pm — 8 Comments
१-मूक भाषा
उनसे बात करने के लिए
शब्दों कि आवश्यकता नहीं
पता है क्यूँ ?मेरा
सन्देश वाहक "मौन" है//
२-कोशिश
आज फिर से वो पकड़ा गया
कुछ नया करने कि चोर कोशिश में //
३-चैन कि नींद
शायद इस दुनियां से ऊब गया था
तभी तो
बड़ा सा पत्थर ओढ़कर सो गया है //
४-ऐसा भी
बड़े अज़ीब लोग है
पीट रहे हैं उसे
और उसी से ज़ुर्म भी पूछ रहे है //
५-नाकाम…
ContinueAdded by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:00pm — 16 Comments
रिश्तों का अलंकार बनूँगी माँ
इंद्र्धनुष के समाये हें मुझमें सातों रंग
हर कली में ममता का श्रंगार करूंगी माँ।
बंद कली खिल जाने दे, नई सृष्टि रच जाने दे,
इस जग में आकर प्रकृति का उपहार बनूँगी…
ContinueAdded by DR. HIRDESH CHAUDHARY on January 14, 2014 at 7:30pm — 8 Comments
विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत महिलाएं जिस तरह बड़े-बड़े पैकेज (हज़ारों ,लाखों में ) ले रही हैं उसे देख अधिकतर महिलाएं खुद को बहुत नीचा या कमतर समझती है जब उनसे पूछा जाता है कि वे क्या करती हैं ........और शर्म महसूस करती हैं.यह बताने में कि वे केवल हाउसवाइफ हैं .
यह इसलिए कि हाउसवाइफ का मतलब अक्सर यह समझा जाता है कि या तो वह घर में चूल्हा-चौका करती है या फिर सिर्फ किट्टी पार्टियों में अपना समय व्यतीत करती हैं ....... जबकि वास्तविक स्थिति इसके बिलकुल विपरीत होती है ...अधिकांश महिलाएं…
Added by Poonam Matia on January 14, 2014 at 5:30pm — 22 Comments
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