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हर खुशी मिल गई मेरे दिल की...

बढ़ गई तिश्नगी मेरे दिल की,
आग सी जल गई मेरे दिल की।

वस्ल में कशमकश जगा बैठी,
धड़कनें खौलती मेरे दिल की।

फासले थे तो पुरसुकूँ दिल था,
साँस मिल के रुकी मेरे दिल की।

उसकी पलकें हया से हैं झिलमिल,
जूँ ही क़ुरबत मिली मेरे दिल की।

कँपकपाते लबों पे नाम आया,
फाख्ता है गली मेरे दिल की।

अब हमें रोकना है नामुमकिन,
धड़कनें कह रही मेरे दिल की।

फासले कुरबतों में यूं बदले,
मिल गई हर खुशी मेरे दिल की।

Added by इमरान खान on December 19, 2011 at 8:00am — 3 Comments

वृद्ध और वृक्ष



यह कविता अब से १० वर्ष पूर्व मैंने इस प्रेरणा के साथ लिखी है कि मानव अपने थोड़े से सुकृत्य का बखान कर अपनी तमाम बुराइयों को उसके अंदर ढँक लेना चाहता है परन्तु कोई हस्तक्षेप उसको आइना दिखाकर एकदम से धरातल दिखा देता है| इसी परिपेक्ष्य में इस कविता को देखना चाहिए और जिस भाव से ये पंक्तियाँ लिखी गई हैं उसी भाव से यदि पाठक तक पहुँच जाएँ तो इन पंक्तियों का लेखन सार्थक होगा|…


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Added by Mukesh Kumar Saxena on December 17, 2011 at 7:27pm — 3 Comments

वो प्यार भरे पल

वो पल सबसे अच्छे थे

जो गुज़रे थे तेरी बाहों में ।

खयालों में उन पलों को जी लेती हूँ

उन सांसों की सरगम से

मन को भिगो लेती हूँ

वो पल वापस नहीं लोटेंगे, मुझे पता है

उन स्मृतियों से आँखों को

नम…

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Added by mohinichordia on December 17, 2011 at 3:30pm — 3 Comments

तीन दोहे

जाने वो किस जनम का,भुगत रहा है पाप.

चन्दन का है पेड़ मगर ,लिपटाये है सांप!
.
जारी है हर हाल में,जीवन की ये जंग.
डोरी रहे तनाव में,उड़ती रहे पतंग.
.
बेटी को भेजा नहीं,पढने को श्रीमान!
बेटा आवारा हुआ,काट रहा है कान!!!!
.
अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on December 16, 2011 at 8:30pm — 2 Comments

ब्लोगिंग वार ( तीसरा महायुद्ध )

  आइन्सटाइन ने कहा था की तीसरे युद्ध का तो पता नहीं मगर चौथा पत्थरों से लड़ा जायेगा.लेकिन आजकल तीसरे युद्ध की सुगबुगाहट  शुरू हो गई है.इस युद्ध में किसी अस्त्र शस्त्र की जरुरत नहीं और ना ही किसी परमाणु या ड्रोन की , ये तो चुपके चुपके लड़ा जा रहा है.

 

आमतौर पर हर युद्ध…
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Added by AK Rajput on December 16, 2011 at 1:30pm — No Comments

एक मुट्ठी धूप

तुम्हे शिकायत है

इस गहरे अँधेरे से ,

पर क्या तुमने कोशिश की

एक दिया जलाने की ?

या मेरे हाथों से हाथ मिलाकर

बनाया कोई सुरक्षा घेरा

कुछ जलते दीयों को

हवा से बचाने के लिए ?

 

नही न ?

 

कोई बात नहीं !

अभी सूखा नही है

समय का फूल !

 

चलो ढूँढे !

समंदर में डूबे सूरज को ,

इकठ्ठा करें

एक मुट्ठी धूप ,

उछाल दें पर्वतों पर ,

घाटियों में भी !

खिला…

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Added by Arun Sri on December 16, 2011 at 12:30pm — 26 Comments

निभा पाओगे

निभा पाओगे 

लाख चाहकर भी मुझे न तुम बुझाओगे

तुम अंधेरों में रहोगे जो न जलाओगे
मेरी तकदीर में लिखा था जलो सबके लिए
दर्द के किस्से…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 16, 2011 at 12:30pm — 12 Comments

दहेज़ में,,,,,,,,

हंसना मना है,,,,,,,,



सामान एक से एक, आला दहेज़ में मिला !

बहरी बीबी गूंगा, साला मिला है दहेज़ मॆं !!१!!



एक आंख नकली है,एक टांग सॆ भी लंगड़ा,

है रंग चॊखा भुजंग काला, मिला है दहॆज़ मॆं !!२!!



नागिन कॊ मात दॆती हैं मॆरी तीनॊं सालियां,

ससुरा भी नशॆड़ी मतवाला,मिला है दहॆज़ मॆं !!३!!



मॆज़बानी मॆं पहलॆ दिन, दारू ठर्रा मिली थी,

बिदाई मॆं एक पटियाला, मिला है दहॆज…
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Added by कवि - राज बुन्दॆली on December 16, 2011 at 11:00am — 2 Comments

माहो-अख्तर के बिना आसमां हूँ मैं ,

माहो-अख्तर के बिना आसमां  हूँ मैं ,

.यादों की बिखरी हुई कहकशां हूँ मैं |



अपने खूं से लिखी हुई दास्ताँ हूँ मैं |

पढने वालों के लिए  इम्तहाँ हूँ मैं |

.

चाहे जिसको लूटना ये ज़हाँ सारा…

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Added by Nazeel on December 15, 2011 at 12:00pm — 4 Comments

कितने ख्वाब सजाएगी

झील हर इक कतरे को झूठ बताएगी

मछली निज आँसू किसको दिखलाएगी

 

लब पर कुछ झूठी मुस्काने चिपकाकर

कब तक वो अपने दिल को बहलाएगी

 

उसकी किस्मत में जीवन भर रातें है

वो भी आखिर कितने ख्वाब सजाएगी

 

हम दोनों को ही कोशिश करनी होगी

किस्मत हमको कभी नही मिलवाएगी

 

 

 

................................,... अरुन श्री !

Added by Arun Sri on December 14, 2011 at 11:30am — 4 Comments

कविता : - मांद से बाहर

कविता : -  मांद से बाहर !
 
चुप  मत रह तू खौफ से  
कुछ बोल 
बजा वह ढोल 
जिसे सुन खौल उठें सब  …
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Added by Abhinav Arun on December 14, 2011 at 10:30am — 18 Comments

सर्दी का आगाज़

एक सुबह ना जाने क्या हुआ

ऐसा लगा की सुबह तो रोज़ होती है ,

पर आज अलग कुछ बात है

इन हवाओं में घुली है शरारत,

जैसे इन्होने छोड़ी है शराफ़त

ज़रूर कोई छुपा हुआ राज़ है

निकला जो घर से , तो देखा फूलों को मुस्कुराते हुए…

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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on December 13, 2011 at 9:30pm — 3 Comments

अल्पजीवी

नियम ये कैसा 

आज के युग का
जिधर भी देखो 
लोग अल्पजीवी बने पड़े हैं
न ख्याल में है उम्र बाकी 
न उनकी कोशिश हो उम्र लम्बी
अभी जो मैंने घुमाई नज़रें
मृत्यु शैया पे दोस्ती तड़प रही थी
मर के कुछ लोग हैं अब भी ज़िंदा
कुछ लोग जीते जी मर चुके हैं
मेरे यार…
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Added by Vikram Pratap on December 13, 2011 at 11:00am — 2 Comments

बिहार (यश - गान )

 
जय - जय बिहार की भूमि, तुम्हें शत नमन हमारा.
तेरी महिमा अतुलनीय , यश तेरा निर्मल - न्यारा.
तुम्हें शत नमन हमारा - तुम्हें शत नमन हमारा.
फली - फुली सभ्यता - मानवता , तेरी ही गोदी में.
बिखरी है चहुँओर सम्पदा , इस पावन माटी में.
जली यहीं से ज्योति ज्ञान की, चमका विश्व ये सारा.
तुम्हें शत नमन हमारा - तुम्हें शत नमन हमारा.
राजनीति या धर्मनीति हो, शास्त्रनीति या शस्त्रनीति हो.
उद्गम - स्थल यहीं…
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Added by satish mapatpuri on December 11, 2011 at 11:05pm — 1 Comment

काशी नामचा - एक - अथ श्री व्यास महोत्सव कथा !

काशी नामचा - एक - अथ श्री व्यास महोत्सव कथा !
र्षांत चल रहा है | कुछ छुट्टियां अवशेष  हैं | सो पिछले हफ्ते  छुट्टी पर था | पिछली  छः से दस दिसंबर २०११  तक  उत्तर प्रदेश शासन की ओर…
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Added by Abhinav Arun on December 11, 2011 at 2:59pm — 6 Comments

तीन त्रिपदियाँ

ना कहीं उजला नज़ारा.

ना कहीं अंधेर है......!
सब समय का फेर है!! (1)
---------
साथ सोचो क्या चलेगा?
सब यहीं रह जायेगा!
मुफ्त में बँट जायेगा!!! (2)
--------
आस का पंछी गगन में.
दूर कितना जायेगा!
लौट ही तो आएगा!! (3)
----------
AVINASH BAGDEY.

Added by AVINASH S BAGDE on December 11, 2011 at 1:00pm — 2 Comments

आँखों में बसे हो तुम...

आँखों में बसे हो तुम...

प्रीतम…

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Added by shambhu nath on December 10, 2011 at 3:16pm — 1 Comment

आस के पास

आस ही सांस है

और सांस ही जीवन है

और जीवन ही संसार है 

यानि सांस ही आस है

सांस ही आस है

या आस ही सांस है?

या फिर आस ही सांस है

या फिर सांस ही आस है

गर सांस  ही आस है

तो आस ही जीवन है

और आस ही संसार है

Added by sitaram singh on December 10, 2011 at 3:12pm — No Comments

ओ मेरे पिता



देखा है मेने अपने पिता को, अपने कंधो पर मेरी स्कुल बैग टांगे,

जीवन के बोझ को बड़ी मुस्कराहट के साथ निभाते, ।

हमेशा जिसने अपने दर्द से दुनिया के दर्द को बड़ा माना

लड़ता रहा वो मजबूरो और असाहायों के लिए

सारे ग्रहों की परिभाषाओ को निष्फल होते देखा है

मेने  अपने पिता के आगे,

आज मुझ को घमंड है की  तुम हो मेरे पिता

हां जिसने मुझको दिया है अपने खून का एक कण

जो आज एक वजूद बनकर खड़ा है इसी दुनिया के लिए कुछ करने को

हां मुझको गर्व है की तुम मेरे पिता…

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Added by LOON KARAN CHHAJER on December 9, 2011 at 5:30pm — No Comments

हिंदी रंगमंच

हिंदी रंगमंच की समस्या बहुत है इस पर शोध की ज़रूरत है .मोटे तौर पर देखा जाये तो यह भी कहा जा सकता है की रंगमंच के  लिए   जो  माहोल बनाना चाहिए था वो बना नहीं जो स्तिथि है वोह भी भयकर है .एक तो लोगो की दिलचस्पी फिल्मो से होते हुए टीवी से चिपक गई है . जो लोग इस विधा से जुड़े है उन्हें कोई मदद नहीं …

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Added by sitaram singh on December 8, 2011 at 1:12pm — No Comments

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