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कुछ भी हो सकता है

कुछ भी हो सकता है

जंगल राज है कुछ न कहो

ख़ामोशी अपनाओ

बापू के तीन बंदरों जैसे

ज्ञानी बन जाओ

अच्छा देखो न बुरा ही देखो

न ही सुनो न कहो

सुखी जो रहना चाहते हो

मूक दर्शक बन जाओ

वर्ना कुछ भी हो सकता है

सब कुछ लुट सकता है

मौत से डर नहीं लगता तो

हरगिज़ न घबराओ

फैसला आपके हाथ में है

कैसे जीना चाहते हो

इज्जत अगर है प्यारी

मेरे साथ आओ

मेरे साथ आ....…

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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 9, 2012 at 1:17pm — 6 Comments

"ग़ज़ल"(बहरे- हजज)

===========ग़ज़ल===========

बहरे- हजज

वजन- १ २ २ २- १ २ २ २- १ २ २ २- १ २ २ २



सुबह भी स्याह जिसकी वो सुहानी शाम क्या देखे

वो मारा फुर्कतों का रात का अंजाम क्या देखे



लगा कर हौसलों के पर परिंदा इश्क का…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 9, 2012 at 12:30pm — 14 Comments

गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड

बिनम्र भाव से बोले रावण

क्या मुझे जलाने आए हो

ज्ञानी पंडित भी साथ न लाए हो

मेरी मुक्ति कैसे होगी ?

मेरी मुक्ति नहीं होती

तभी तो बच जाता हूँ

सबसे अधिक बार जलने का

गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड बनाता हूँ

 

दीपक…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on October 9, 2012 at 11:00am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

ऐ मेरे प्रांगण के राजा

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े 

झंझावत जो सह जाते थे 

जीवन के वो बड़े बड़े 

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

बरसों से जो दो परिंदे 

इस कोतर में रहते थे 

दर्द अगर उनको  होता 

तेरे ही  अश्रु बहते थे 

उड़ गए वो तुझे छोड़ कर 

अपनी धुन पर अड़े अड़े

क्यूँ तुम ऐसे मौन खड़े ?

इस जीवन की रीत यही है 

सुर बिना संगीत यही है  

उनको इक दिन जाना था 

जीवन  धर्म निभाना था 

राजा जनक भी खड़े…

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Added by rajesh kumari on October 9, 2012 at 9:16am — 21 Comments

ग़ालिब भूखे पेट है तुलसी नंगी पीठ..

ना गर्मी में ताप है, ना सर्दी में शीत,

जाने कैसा दौर है, कोई नियम ना रीत |



गूंगे बहरे पा रहे अंधों से सम्मान,

ग़ालिब भूखे पेट है तुलसी नंगी पीठ |



जब पैसा साहित्य का बन जाता है धर्म, 

ग़ज़लें बर्तन मांजती पानी भरते गीत |



आंसू पीकर सो गए बच्चे सब लाचार,

हार गए फिर वायदे, गयी…
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Added by ajay sharma on October 8, 2012 at 10:00pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४० (आह हस्रत तिरी कि ज़ीस्त जावेदाँ न हुई)

आह हस्रत तिरी कि ज़ीस्त जावेदाँ न हुई

यूँकि ये मरके भी आज़ादीका उन्वाँ न हुई

 

तू जो इक रात मेरे पास मेहमाँ न हुई

ज़िंदगी आग थी पे शोलाबदामाँ न हुई  

 

ज़िंदगी तेरे उजालों से दरख्शां न हुई   

ये ज़मीं चाँद-सितारोंकी कहकशाँ न हुई

 

बात ये है कि मिरी चाह कामराँ न हुई

एक आंधी थी सरेराह जो तूफाँ न हुई

 

दौरेमौजूदा में आज़ादियाँ आईं लेकिन

लैला-मजनूँकी तरह और दास्ताँ न हुई

 

याद तुझको न करूँ…

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Added by राज़ नवादवी on October 8, 2012 at 9:00pm — 2 Comments

छः दोहे

(चार चरण : विषम चरण १३

मात्रा व जगण निषेध / सम चरण ११ मात्रा)

 

आदिशक्ति है नारि ही, झुक जाते भगवान.  

नारी सबकी मातु है, सब जन पुत्र समान..

 

शक्तिरूप में ही वही, नहीं अल्प अभिमान. 

परमेश्वर के रूप में, पिय को देती मान..

 

ताने सहकर नित्य ही, बनी रहे अनजान. 

सदा समर्पित भाव से, सबका रखती ध्यान..

 

जान बूझ बंधन बँधे, बचपन बाँधे पित्र.

यौवन में पिय बाँधते, जरा अवस्था पुत्र.. 

 

ईश्वर ही नर…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 8, 2012 at 1:13am — 13 Comments

पाँच बरवै

(चार चरण : विषम चरण

१२ मात्रा व सम चरण ७ मात्रा सम चरणों का अंत गुरु लघु से )

 

प्रात जागती नारी, नहिं आराम.

साथ नौकरी करती, है सब काम..

 

प्यार शक्ति दे तभी, उठाती भार.

नारी बिन यह दुनिया, है लाचार..

 

प्रेम स्नेह की करती, जग में वृष्टि.

पूजित नारी जग में, जिससे सृष्टि..

 

त्याग  तपस्या  सेवा, तेरे  नाम.

शक्ति स्वरूपा नारी, तुझे प्रणाम..

 

सत्ता मद में गर्वित, नर है आज.

अखिल विश्व…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 8, 2012 at 1:00am — 21 Comments

हमने शेरों को

हमने शेरों को ठिकाने दिये हैं
आज गीदड़ हमें डराने लगे हैं

जिनके हाथों में रहनुमाई दी थी
बस्तियाँ हमारी वो जलाने लगे हैं

जिन्हे धर्म का मतलब नहीं पता
लोग क़ाज़ी उन्हें बनाने लगे हैं

लूट-खसोट, धोखा जिनका ईमान
वो तहज़ीब हमको सिखाने लगे हैं 

जो आए तो थे ख़बर हमारी लेने
हौंसला देख ख़ुद लड़खड़ाने लगे हैं

Added by नादिर ख़ान on October 7, 2012 at 11:30pm — 10 Comments

प्यार कब मिला

चाहा था दिल ने जिसको वो दिलदार कब मिला
सब कुछ मिला जहाँ में मगर प्यार कब मिला

तनहा ही ते किये हैं ये पुरखार रास्ते
इस जीस्त के सफ़र में कोई यार कब मिला

बाज़ार से भी गुज़रे हैं हाथों में दिल लिए
लेकिन हमारे दिल को खरीदार कब मिला

उल्फत में जां भी हंस के लुटा देते हम मगर
हम को वफ़ा का कोई तलबगार कब मिला

तनहा ही लड़ रहा हूँ हालाते जीस्त से
हसरत को जिंदगी में मददगार कब मिला

Added by SHARIF AHMED QADRI "HASRAT" on October 6, 2012 at 10:54pm — 8 Comments

शब्द-तर्पण: माँ-पापा संजीव 'सलिल'

शब्द-तर्पण:

माँ-पापा

संजीव 'सलिल'

*

माँ थीं आँचल, लोरी, गोदी, कंधा-उँगली थे पापाजी.

माँ थीं मंजन, दूध-कलेवा, स्नान-ध्यान, पूजन पापाजी..

*

माँ अक्षर, पापा थे पुस्तक, माँ रामायण, पापा गीता.

धूप सूर्य, चाँदनी चाँद,  चौपाई माँ, दोहा पापाजी..

*

बाती-दीपक, भजन-आरती, तुलसी-चौरा, परछी आँगन.

कथ्य-बिम्ब, रस-भाव, छंद-लय, सुर-सरगम थे माँ-पापाजी..

*

माँ ममता, पापा अनुशासन, श्वास-आस, सुख-हर्ष अनूठे.

नाद-थाप से, दिल-दिमाग से, माँ छाया तरु थे…

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Added by sanjiv verma 'salil' on October 6, 2012 at 3:01pm — 9 Comments

======ग़ज़ल========



======ग़ज़ल========

बह्रे मुतकारिब मुसम्मन् सालिम

वजन- १२२ १२२ १२२ १२२




छुड़ा हाथ अपना वो जाने लगे हैं

मनाने में जिनको जमाने लगे हैं



लिया था ये वादा गिराना न आँसू

वो यादों में आ कर रुलाने लगे हैं…



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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 6, 2012 at 2:00pm — 6 Comments

लगेंगी सदियाँ पाने में ......

लगेंगी सदियाँ पाने में ......

न खोना प्यार अपनों का लगेंगी सदियाँ पाने में ,
न खोना तू यकीं इनका लगेंगी सदियाँ पाने में .
 
नहीं समझेगा तू कीमत अभी बेहाल है मन में ,
अहमियत जब तू समझेगा लगेंगी सदियाँ पाने में…
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Added by shalini kaushik on October 5, 2012 at 11:56pm — 4 Comments

ग़ज़ल-यहाँ से दूर कोई आसमानों में टहलता है

यहाँ से दूर कोई आसमानों में टहलता है

अगर उसको बुलायें हम तो पल में आके मिलता है।।



वो कैसा है कहां है किस जगह दुनियां में मिलता है,

तेरे अन्दर,मेरे अन्दर वही आकर मचलता है।



अगर पूछे कोई जीवन क्या है,तो ये कहेंगे हम,

तरलता है,सरलता है,विफलता है,सफलता है।



हज़ारों ख़्वाहिशों के जंगलों में ले गयीं जैसे,

तुम्हारी आँखों में देखें तो सिमसिम कोई खुलता है।



ज़मीं ने जिसको अपनी बाँहों में भरकर मुहब्बत की,

किनारे काटने को फिर वही…

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Added by सूबे सिंह सुजान on October 5, 2012 at 8:00pm — 12 Comments

वलवले

शोर कैसा भी हो, मेरे दिल को, अब भाता नहीं |

चहचहाना भी परिंदों का, सुना जाता नहीं ||

दावा करते थे, मेरा होने का,पहले जो कभी | 

नाम मेंरा उनके लब पर, आज-कल आता नहीं ||

हूँ चमन में,आज भी, पर दिल में, जंगल आ बसा |

अब तो आफत क्या, क्यामत से भी, घबराता नहीं ||

आँख करके बंद, चलने में हूँ, माहिर हो गया |

स्याह रातों में भी, दीवारों से, टकराता नहीं ||

क्यूँ 'शशि तू ज़िन्दगी…
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Added by Shashi Mehra on October 5, 2012 at 7:22pm — 1 Comment

आंखें करे शिकायत किनसे

आंखें करे शिकायत किनसे

वही व्‍यथा क्‍यों ढोते हैं

बीज वपन तो करता मन है

वे नाहक क्‍यों रोते हैं

 

पलकों की बंदिश में हरदम

क्‍यों वे रोके जाते हैं

और तड़पते देह यज्ञ…

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Added by राजेश 'मृदु' on October 5, 2012 at 3:55pm — 7 Comments

ग़ज़ल

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है दोस्तों आप सभी के जानिब

बहर है--> मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ महजूफ

वजन है--> २२१-२१२१-१२२१-२१२



हिंदी का रंग आज यूँ रंगीन हो गया

भारत बदल के जैसे अभी चीन हो गया



मुझसे बड़ा गुनाह ये संगीन हो गया

दिल टूटने…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 5, 2012 at 2:00pm — 12 Comments

सुनयना [लघु कथा ]

अपने नाम को सार्थक करती हुई कजरारे नयनों वाली सुनयना अपनी प्यारी बहन आरती से बहुत प्यार करती थी |किसी हादसे में आरती के नयनों की ज्योति चली गई थी लेकिन सुनयना ने जिंदगी में उसको कभी भी आँखों की कमी महसूस नही होने दी | हर वक्त वह साये की तरह उसके साथ रहती,उसकी हर जरूरत को वह अपनी समझ कर पूरा करने की कोशिश में लगी रहती |एक दिन सुनयना को बुखार आ गया जो उतरने का नाम ही नही ले रहा था ,उसके खून की जांच करवाने पर पता चला कि उसे कैंसर है ,उसके मम्मी पापा के पैरों तले तो जमीन ही खिसक गई ,लेकिन सुनयना…

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Added by Rekha Joshi on October 5, 2012 at 1:13pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३९ (हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं )

कैद कब तक रहोगे अपनी ही तन्हाइयों में

ढूंढें मिलते नहीं ज़िंदा बशर परछाइयों में

 

हक़का रिश्ता ज़मींसे है, ये खंडहर कहते हैं

सब्ज़े होते नहीं अफ्लाक की बालाइयों में  

 

खुशबूएं जम गईं गुलनार के पैकर में ढलके

कल की बादे सबा क्यूँ खोजते पुरवाइयों में

 

हम हैं जंगल के फूल तख़लिएमें खिलते हैं

ज़र्द पड़ जाते हैं गुलदस्ते की रानाइयों में

 

फूल वा होते हैं, निकहत बिखर ही जाती है

फर्क कुछ भी नहीं है प्यार और…

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Added by राज़ नवादवी on October 5, 2012 at 11:46am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
स्वप्नों के महल

डाली हरसिंगार की झूम उठी

मनमोहक फूलों के बोझ से

बल खाती हुई छेड़ जो रही थी

उसे ईर्ष्यालु सुगन्धित पवन

झर रहे थे पुहुप आलौकिक

दिल ही दिल में मगन

हर कोई चुन रहा था

सुखद स्वप्न बुन रहा था

अलसाई उनींदी पलकों

के मंच पर

ये द्रश्य चल रहा था

मेरा भी मन ललचाया

एक पुष्प उठाया

अंजुरी में सजाया

तिलस्मी पुष्प आह !

ताजमहल रूप उभर आया

अद्वित्य ,अद्दभुत

मेरे स्वयं ने मुझे समझाया

ये तेरा नहीं हो सकता

तुमने गलत…

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Added by rajesh kumari on October 5, 2012 at 11:30am — 11 Comments

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