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नरकवासी

हमने चुना

अपने लिए

एक नर्क

या धकेल दिया था तुमने

हमें नर्क में...

कोई फर्क नहीं पड़ता...

 

नर्क

भले ही जैसा था

हमने उसमें बसने का

बना लिया मन

और ठुकरा दिया

तुम्हारे स्वर्ग को

उन लुभावने सपनो को

जिसे दिखलाते रहे तुम

और तुम्हारे दलाल…

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Added by anwar suhail on March 27, 2013 at 7:52pm — 4 Comments

तन्हाई

ये तन्हाई अब काटने को दौड़ती है 

यह गुमनामी हमें अन्दर से  तोडती है 

हम उस कीड़े की तरह  हैं जो आबाद समंदर में होकर भी

एक सीपी में कैद है 

हम उस पेड़ की तरह हैं जो घने जंगल में 

होकर भी सूरज की रौशनी  से अब तक महफूज़  है 

हम उस कैद पंच्छी  की तरह हैं, 

 जो असमानों को छोड़ एक पिंजरे में कैद है…
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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on March 27, 2013 at 11:24am — 3 Comments

दो भाई ! - भाग -४

(भाग -३ से आगे की कहानी )

जिस इलाके की यह कहानी है, वह पटना के पास का ही इलाका है, जहाँ की भूमि काफी उपजाऊ है. लगभग सभी फसलें इन इलाकों में होती है! धान, गेहूँ, के अलावा दलहन और तिलहन की भी पैदावार खूब होती है. दलहन में प्रमुख है मसूर, बड़े दाने वाले मसूर की पैदावार इस इलाके में खूब होती है. मसूर के खेत बरसात में पानी से भड़े रहते हैं. जैसे बरसात ख़तम होती है, उधर धान काटने लायक होने लगता है और इधर पानी सूखने के बाद खाली खेतों में मसूर की बुवाई कर दी जाती है. मसूर के खेत, केवाला…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on March 27, 2013 at 4:55am — 6 Comments

ऐसी ही एक शाम थी

ऐसी ही एक शाम थी

कुछ गुलाबी थोड़ी सुनहरी

सूर्य किरणें जल में तैरती

तरल स्वर्ण सी चमकीली

फैली थी घनी लताएँ

हरित पत्तों बीच गहरी

बैगनी फूलों की छाया

हृदय में थी ठहरी सी

मन झील सा शांत

इच्छाएँ थीं चंचल , अकिंचन

पहेलियाँ कितनी अनबुझी

तैर रही थी मीन सी

गोद में खुला पड़ा था

पत्र एक , किसी अंजान का

उपेक्षित सा यूँ ही

बरसों पहले था पढ़ा

कितनी रातें बीती थी

सपनों में भटकती थी

उपवन में कभी , कभी –

निविड़…

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Added by coontee mukerji on March 27, 2013 at 12:30am — 8 Comments

फाग अनुरागी बना, जगत बिरागी मन

Ecstacy                 ओबीओ के समस्त सदस्यों को होली की मंगलमय शुभ कामनाएं

फाग अनुरागी बना, जगत बिरागी मन।

       सुन्दर बसंती छटा, लगी मन…

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Added by Satyanarayan Singh on March 27, 2013 at 12:00am — 8 Comments

फिर भी फागुन तुम्हें मैं दिखा जाऊँगा

गीत रूठे हुए  मीत छूटे हुए

फिर भी रस्में ये सारी निभा जाऊँगा

ये अलग बात है रंग मुझमें नहीं

फिर भी फागुन तुम्हें मैं दिखा जाऊँगा



आप सो जाइये ओढ़ कर बदरियाँ

मुझको इस धूप में और जलना अभी

लक्ष्य संसार के हों समर्पित तुम्हें

मुझको इक उम्रभर और चलना अभी

मन के मंदिर में बस तुम ही तुम देव हो

प्रीत के कुछ सुमन फिर चढ़ा जाऊँगा

ये अलग बात है रंग मुझमें नहीं

फिर भी फागुन तुम्हें मैं दिखा जाऊँगा



रंग यौवन के जब सब उतरने लगें

फूल जब…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on March 26, 2013 at 9:00pm — 4 Comments

चलिये शाश्वत गंगा की खोज करें- द्वितीय खंड (3)

गंगा, (ज्ञान गंगा व जल  गंगा) दोनों ही अपने शाश्वत सुन्दरतम मूल  स्वभाव से दूर पर्दुषित  व  व्यथित,  हमारी काव्य कथा  नायक 'ज्ञानी' से संवादरत हैं। 

अब यह सर्वविदित है कि मनुष्य की तमाम विसंगतियों, मुसीबतों, परेशानियों   का कारण उस का ओछा ज्ञान है जिसे वह अपनी तरक्की का प्रयाय मान रहा है. इसी ओछे ज्ञान से मानव को निकालना और सही व ज्ञानोचित अनुभूति का संप्रेष्ण करना अब ज्ञानि का लक्ष्य है. इस के…
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Added by Dr. Swaran J. Omcawr on March 26, 2013 at 8:30pm — 8 Comments

चढ़े प्रेम का रंग (दोहे)-लक्ष्मण लडीवाला

चढ़े प्रेम का रंग                                            

-लक्ष्मण…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 26, 2013 at 6:30pm — 11 Comments

होली है!...............सरररररररर!!!

होली के हुड़दंग मा, खद्दरवा सत रंग।

आम जनता डर रही, शिव धनुवा जस भंग।।1



हाथी साइकिल चले, गदहा राज चलाय।

हर साख उल्लू बैठा, जनता रही लजाय।।2

होली से होली कहे, रंगों का रस रंग।

कौन खूनी रंग रहा, भारत मन बदरंग।।3



लड़खत दारू ठेलिये, कौन दिशा कहॅ ठांव।

नलियै में औंधे पड़े, धिक्कारे सब गांव।।4



होरियारन से होली, रंगो सजे समाज।

नशा मवाली फाग में,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 26, 2013 at 4:44pm — 3 Comments

ज़िन्दगी

क्या है तू ऐं ज़िन्दगी ?

मैं तुझे पहचान न सकी।

तेरे तो हैं रूप अनेक ,

कभी तुझे जान  न सकी।

क्या है तू ऐं ज़िन्दगी ?

देखा है मैंने तुझे कभी ,

 फूलों की तरह खिलते हुए।

और कभी देखा है मैंने तुझे,

शोलों की तरह जलते हुए।

तेरी कोई पहचान न रही,

कभी तुझे जान न सकी।

क्या है तू ऐं ज़िन्दगी ?

कहीं है तू पुष्प-सी-कोमल

तो कहीं काँटों-सी-कठोर।

कहीं पर है प्यार तेरा,

तो कहीं है अन्याय घोर।

तेरी कभी कोई शान न रही,

कभी तुझे जान न सकी।

क्या…

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Added by Savitri Rathore on March 26, 2013 at 3:24pm — 13 Comments

ललित छंद

ललित छंद (16+12मात्रायें:- छन्नपकैया की जगह "आनंद करो आनंद करो" का प्रयोग)



आनंद करो आनंद करो ,देखो होली आई !

मजे लेकर सब खा रहे है ,हलवा खीर मिठाई !!१

आनंद करो आनंद करो,इसको उसको रंगा !

झूमते हुड़दंग मचाया ,पीकर सबने भंगा !!२

आनंद करो आनंद करो,रंग भरी…

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Added by ram shiromani pathak on March 26, 2013 at 12:00pm — 3 Comments

:ःजय जय अंजनि लालाःः

चतुष्पदी ,चैापैया. (10, 8, 12 अन्त में दो गुरू)

जय अंजनि लाला, केसर बाला, पवन पुत्र सुखकारी।

तुम बाल प्यारे, शंकर सारे, अद्भुत लीला धारी।।

प्रभु देखि दिवाकर, फलम् समझकर, निगले भा अॅधियारी!

सृष्टि भई काली, ज्योति बिहाली, त्राहि त्राहि मम वारी।।1

छॅाड़े नहि रवि को, बड़े जतन सो, दैव आरत पुकारी।

इन्द्र अकुलाये, बज्र चलाये, हनुमत भय सुधहारी।।

कहॅू शंकर सुवन, केसरि नन्दन, बाल मुकुन्द सुरारी।

देवन्ह सब…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 25, 2013 at 10:55pm — 9 Comments

होली आयी खुशियां छायी

होली आयी

खुशियां छायी

रंग बिखरे

संस्कृति के

स्नेह मिलन का

पर्व है होली

रंग-गुलाल देते सन्देश

प्रकृति के

विभिन्न रंगों का

कितनी भी जतन करो

रक्षा होती सदैव

सत्य की

असत्य सदैव

सत्य से हारा

रंग प्रतीक हैं

वसंतागमन का

जिस तरह

खिलते हैं

विभिन्न रंगों के फूल

वसन्त में

उसी तरह

बिखरते हैं रंग

होली पर्व में

खेलो होली मजे से

बुरी रीतियों से बचो

शराब पीना

होली के दिन

काला… Continue

Added by सतवीर वर्मा 'बिरकाळी' on March 25, 2013 at 10:40pm — 6 Comments

गज़ल

फिलहाल कुछ ऐसा कीजिए
चुन के कांटे फूल धर दीजिए


और कुछ संभव हो या ना ,
छत को चोग से  भर दीजिए

बहुत अंधेरो की बोई फसल
रौशनी की भी मगर बीजिए

तीसरा नेत्र खोल के रखिए
चाहे दोनों आंखे भर लीजिए

हर कोई फोटो फ्रेम लगाए,
दिल में जगह मगर दीजिए 

Added by मोहन बेगोवाल on March 25, 2013 at 10:30pm — 6 Comments

अकेली औरत





शोभना जितनी सुन्दर थी उतनी ही बेबाक और गर्वीली भी थी. वह अमरीका से उच्च शिक्षा प्राप्त थी. होम मिनिस्ट्री में बहुत ही ऊँचे पद पर आसीन थी. उसे शादी नाम से बहुत चिढ़ थी. जब वह पैंतीस साल की हो गयी तो एकदिन उसके पिता ने उससे कहा- “ शोभना ! अगर तुम्हें कोई पसंद हो तो बता देना मैं तुम्हारी शादी उसीसे कर दूँगा. ”

शोभना ने भी सोचा अब शादी कर ही लेनी चाहिये. अतः अपने पिता से बोली – “ठीक है पिता जी, लेकिन मुझे मेरे ही ग्रेड का वर चाहिये. ’’

शोभना स्वयं अपने वर की तलाश करने लगी.…

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Added by coontee mukerji on March 25, 2013 at 9:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अनुभूति

वाणी जब नयनों से छलके

दो दिल में हो एक स्पंदन,

हो केशगुच्छ के अवगुंठन में

अधरों का अधरों से मिलन –

जब अलि के नीरव गुंजन से

सिहरित हो, पुष्पित कोमल तन,

जब भाव बहे सरिता बनकर

भाषा हो मृदुल, मंद समीरण –

प्रिये तभी होता है प्राणों का

जीवन से आलिंगन.

जब पवन चले औ’ किलक उठे

कलियों का दल इठलाकर,

जब तरु की शाखों में जाग उठे

उन कोमल पत्रों का मर्मर,

जब ओस बिंदु को मिलता हो

तृण का कम्पित अवलम्बन –

बंधु तभी मुखरित होता है,

यह जग,…

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Added by sharadindu mukerji on March 25, 2013 at 8:44pm — 4 Comments

तुम लिख देना इतिहास मेरे नाम से

तुम लिख देना इतिहास मेरे नाम से .
 
 
तुम लिख देना इतिहास मेरे नाम से 

तुम्हारे कडवे झूठो , तीखे बयानों से 

कितना भी कीचड़ उड़ेलो मेरे जज्बातों पर 

मैं बहार आऊँगी चन्दन की महक से 





मेरी मुखरता तुम्हे उद्वेलित करती हैं 

मेरी ख़ामोशी तुमको आक्रोशित करती हैं 

तुम कैसे स्वीकार सकते हो मेरे अस्तित्व…
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Added by Neelima Sharma Nivia on March 25, 2013 at 6:31pm — 7 Comments

छू लो तुम एकबार -- सुरमयी, छू लो तुम एकबार

कटी फसल सा

पड़ा हुआ हूं

मिटा गझिन आकार

परती धरती

धूम धनुष ले

करती तीक्ष्‍ण प्रहार

छू लो तुम एकबार -- सुरमयी, छू लो तुम एकबार

कर्म ताल में

कीच भर गए

यत्‍न सकल बेकार

मन की घिर्नी

घूम थक चुकी

पंथ मिला ना द्वार

छू लो तुम एकबार -- सुरमयी, छू लो तुम एकबार

जलद पटल

क्‍या चित्र बनाऊं

किसपर करूं सिंगार

स्‍वर्णमृग तो

राम साधते

मुझे चापते हार

छू लो तुम एकबार --…

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Added by राजेश 'मृदु' on March 25, 2013 at 12:24pm — 4 Comments

लघुकथा ­- चमेली

मंच के सामने आठ दस लोग कुर्सियों पर बैठे थे। सफेद झक कुर्ता पायजामा पहने छरहरे बदन का एक युवक मंच पर खड़ा भाषण दे रहा था, ‘आज हमारे देश को भगत सिंह के आदर्शों की जरूरत है……..।‘ भाषण खत्म होने पर संचालक ने घोषणा की, ‘थोड़ी ही देर में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे।‘

कुछ देर बाद एक युवती रंग बिरंगी वेशभूषा में मंच पर आयी और उसने एक गीत पर नृत्य आरंभ कर दिया ‘……चिकनी चमेली……’

भीड़ धीरे…

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Added by बृजेश नीरज on March 25, 2013 at 10:00am — 32 Comments

फागुनी दोहे " होली 2013 " -

दस फागुनी दोहे  " 2013 "

तेरी ही खातिर सजे रंग अबीर के थाल ,

तेरे आने से हुई मेरी होली लाल ।

रंग पर्व में घुल गए इंतज़ार के रंग ,

होली सच में शोभती अपनों के ही संग ।

सरसों टेसू और पलाश हैं बसंत के दूत ,

रंग रूप से कर रहे मादकता आहूत ।

लज्जा तेरा रंग है मेरा रंग संकोच ,

ऐसे में…

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Added by Abhinav Arun on March 25, 2013 at 9:30am — 14 Comments

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