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ग़ज़ल : सच वो थोड़ा सा कहता है

बह्र : मुस्तफ्फैलुन मुस्तफ्फैलुन

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सच वो थोड़ा सा कहता है

बाकी सब अच्छा कहता है

 

दंगे ऐसे करवाता वो

काशी को मक्का कहता है

 

दौरे में जलते घर देखे

दफ़्तर में हुक्का कहता है

 

कर्मों को माया कहता वो

विधियों को पूजा कहता है

 

जबसे खून चखा है उसने

इंसाँ को मुर्गा कहता है

 

खेल रहा वो कीचड़ कीचड़

उसको ही चर्चा कहता है

 

चलता है जो खुद सर के बल

वो…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 2, 2013 at 3:23pm — 18 Comments

उत्थान ----------कविता

दीप बन अँधेरी राहो पे जलने लगा हूँ !

धवल चंद्रमा सा चमकने लगा हूँ !

चीर  कर सीना निशा का  ,

जग के तम को हरने लगा हूँ !

ना दे सहारे को अब कोई बैसाखी !

खुद के पैरो पे जो चलने लगा हूँ !

लडखडाहट का दौर गुजर चुका है !

अब तो मैं सँभलने लगा हूँ !

धो चुका हूँ आँचल के दाग सारे !

फूलों सा अब महकने लगा हूँ !

बंदिशों के पिंजरे तोड़ सारे  !

मुक्त परिंदे सा चहकने लगा हूँ !

जला कर इर्ष्या और कपट को !

ज्वालामुखी सा…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 2, 2013 at 2:30pm — 17 Comments

तान्या : महसूस किया तुमको

इन मौन चट्टानों के सामने खड़ा

यह सोचता हूँ ,

कितनी कठोर हैं ये /

जितनी कठोर लगती हैं

क्या उतनी ही?

या कहीं ज्यादा ?

क्या भेद सकेगा कोई इनको?

और फिर मैं देखता हूँ

आकाश की ओर /

बदली छाई है ,

धूप का कतरा नहीं है ।

और फिर क्या देखता हूँ

तोड़ कर प्रस्तर कवच को ,

मोतियों सा झर रहा है ,

दुधिया झरना ।

भूल जाता हूँ मैं 

कि

कितने कठोर हैं ये पाषाण खंड ,

कि

मैं इन्हें भेद नहीं…

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Added by ARVIND BHATNAGAR on October 2, 2013 at 12:30pm — 22 Comments

कुण्डलियाँ

जीवन में पहली बार कुण्डलियाँ लिखने का प्रयास किया है. आप सबका मार्गदर्शन प्रार्थनीय है.

अम्बे तेरी वंदना, करता हूँ दिन-रात

मिल जाए मुझको जगह, चरणों में हे मात

चरणों में हे मात, सदा तेरे गुण गाऊँ

चरण-कमल-रज मात, नित्य ही शीश लगाऊँ

अर्पित हैं मन-प्राण, दया करिए जगदम्बे

शब्दों को दो अर्थ, मात मेरी हे अम्बे

.

- बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by बृजेश नीरज on October 2, 2013 at 11:30am — 32 Comments

अध्यादेश

शरीर पर बेदाग पोशाक, स्वच्छ जेकेट, सौम्य पगड़ी एवं चेहरे पर विवशता, झुंझलाहट, उदासी और आक्रोश के मिले जुले भाव लिए वे गाड़ी से उतरे... ससम्मान पुकारती अनेक आवाजों को अनसुना कर वे तेजी से समाधि स्थल की ओर बढ़ गए... फिर शायद कुछ सोच अचानक रुके, मुड़े और चेहरे पर स्थापित विभिन्न भावों की सत्ता के ऊपर मुस्कुराहट का आवरण डालने का लगभग सफल प्रयास करते हुये धीमे से बोले- “मैं जानता हूँ, जो आप पूछना चाहते हैं... देखिये, आप सबको, देश को यह समझना चाहिए... और समझना होगा कि ‘गांधी’ जी के…

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Added by Sanjay Mishra 'Habib' on October 2, 2013 at 9:08am — 25 Comments

बड़े साहब की गाँधी जयंती (कविता)- अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

बड़े साहब थे बड़े मूड में, भृत्य भेजकर मुझे बुलाये।                                                                                               

छुट्टी का दिन व्यर्थ न जाये, आओ इसे रंगीन बनायें॥                                                                                                          

आज के दिन जो मिले नहीं, उस चीज का नाम बताये।                                                                                            

और बोले कहीं से जुगाड़ करो, फिर…

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Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 2, 2013 at 12:30am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक तरही ग़ज़ल

अकीदत का करो रौशन चिरागाँ काम से पहले

खुदा को याद कर लेना कभी आलाम से पहले                     आलाम =तकलीफों

 

तुम्हारे दम से कायम ज़िन्दगी का है निशां यारब

झुके सजदे में सर मेरा किसी ईनाम से पहले

 

छुपा आगोश में माँ हमपे ममता की करे बारिश

हमें करुणा की ठण्डक दे कभी आराम से पहले



दुआओं की तेरी तासीर इतनी फ़ैज़ इतना माँ                        तासीर =प्रभाव, फ़ैज़= अनुकम्पा

महक जायें मेरी ये रहगुज़र हर गाम से…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 1, 2013 at 11:53pm — 14 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नील सागर .................डॉ० प्राची

संवेदनाओं के 

अंतर गुन्जन पर 

भाव लहरियों का 

निःशब्दित नृत्य..

इस ओर से उस छोर 

उस छोर से इस ओर

विलयित तटबन्ध..

लहर लहर मन 

आनंदित 'नील सागर'

मौलिक और अप्रकाशित 

Added by Dr.Prachi Singh on October 1, 2013 at 9:00pm — 54 Comments

दोहा -६ (आस -पास)

गाँव बसे कैसे भला ,करते बंदरबांट !

कम्बल तो देते मगर ,लूट लिये सब खाट !!१

हंस देखता रह गया ,बगुले के सर ताज !

गीदड़ अब राजा बना ,गीदड़ सिंह समाज !!२

आदि अंत सब हैं वही ,उनका ही संसार !

वो मिटटी के तन गढ़े ,कितने कुशल कुम्हार !!३

धन की चंचल चाल का ,फैला है भ्रमजाल !

जो पाते वो भी विकल ,बिन पाए बेहाल !!४

पर पीड़ा दिखती नहीं, ऐसे कैसे लोग!

दीमक जैसा खा रहा ,लालच नामक रोग !!५…

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Added by ram shiromani pathak on October 1, 2013 at 8:30pm — 21 Comments

कुण्डलिया (बीवी बनाम् शेरनी)

जंगल भागी शेरनी, ख़बर छपी अखबार।

फौरन फोन घुमाइए, नज़र पड़े जो यार।।

नज़र पड़े जो यार, पड़े हम भी चक्कर में,

कर डाला झट फोन, उसी पल चिड़ियाघर में।…

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Added by Sushil.Joshi on October 1, 2013 at 8:30pm — 24 Comments

कुंडलिया छंद

लोहा ले तलवार से, तभी कलम की शान
जनता करती याद है, बढे कलम का मान | 
बढे कलम का मान, जुल्म पर खुलकर बोले
मसी छोड़ दे छाप, न्यायिक तुला पर तोले 
रही धर्म के साथ, उसी ने मन को मोहा 
काँपे कभी न हाथ, झूठ से जब ले लोहा||
 (मौलिक व अप्रकाशित ) 

 

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला       

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 1, 2013 at 8:30pm — 9 Comments

कहानी प्यार के फूल------------

 आज बरसो के बाद उधर जा निकला जहाँ कभी मेरे प्यार की आखरी कब्र बनी थी , उस जगह न जाने कहाँ से दो पीले रंग के फूल खिले थे . आँखों से गंगा जमुना बहने लगी ! सब कुछ ऐसे याद आने लगा की जैसे कल ही की बात हो! मन पुरानी यादों में खो गया ! आज बहुत ज्यादा थक कर सोया था ये प्राइवेट स्कूल की नौकरी भी ना स्कूल वाले पैसे तो कुछ देते नहीं बस तेल निकलने पे लगे रहते है! ओ बेटा जल्दी उठा जा आज छुट्टी है तो क्या शाम तक सोयेगा जा उठकर देख दरवाजे पे कौन है माँ घर के दुसरे कोने पे कुछ काम कर रही थी , माँ की आवाज़…

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Added by डॉ. अनुराग सैनी on October 1, 2013 at 7:30pm — 2 Comments

दोहे/ रात

ओढ़ चुनरिया स्याह सी, उतरी जब ये रात!

गुपचुप सी वह कर रही, धरती से क्या बात!!

 

तारों का झुरमुट सजा, चाँद खड़ा मुस्काय!

इठलाये जब चाँदनी, मन-उपवन खिल जाय!!

 

धवल रंग की रोशनी, जगत रही है सींच!…

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Added by बृजेश नीरज on October 1, 2013 at 5:46pm — 22 Comments

जिन्दगी जिन्दगी जिन्दगी । गजल (प्रथम प्रयास )

मुतदारिक मुसद्दस सालिम

212 /212/ 212

जिन्दगी  जिन्दगी  जिन्दगी ।

बन्दगी तिश्नगी आशिकी ॥

जिन्दगी जिन्दगी जिन्दगी ।…

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Added by बसंत नेमा on October 1, 2013 at 4:30pm — 16 Comments

गीत -- कण कण में बसी है माँ।

गीत --
कण कण में बसी है माँ।
.
उडती खुशबु रसोई की
नासिका में समाये
भोजन बना स्नेह भाव से
क्षुधा शांत कर जाय
प्रातः हो या साँझ की बेला
तुमसे ही सजी है माँ
कण कण में बसी है माँ।
.
संतान के ,सुख की खातिर
अपने स्वप्न मिटाये
पीर अपने मन की ,तुमने
घाव भी नहीं दिखाए
खुशियाँ ,घर के सभी कोने में
तुमने ही भरी है…
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Added by shashi purwar on October 1, 2013 at 3:01pm — 18 Comments

मिलने पर नजरें चुराओगे था मालूम मुझे

यूं मुझे भूल न पाओगे था मालूम मुझे

दिल में लोबान जलाओगे था मालूम मुझे

अपने अश्कों से भिगो बैठोगे मेरा दामन 

एक दिन मुझको रुलाओगे था मालूम मुझे

 

मैंने सीने से लगा रक्खा है तेरा हर ख़त

ख़त मगर मेरा जलाओगे था मालूम मुझे 

 

यूं तो वादा भी किया, तुमने कसम भी खाई.

गैर का घर ही बसाओगे था मालूम मुझे

सारे इलज़ाम ले बैठा तो हूँ मैं अपने सर

मिलने पर नजरें चुराओगे था मालूम मुझे 

डॉ आशुतोष…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on October 1, 2013 at 1:58pm — 12 Comments

ये नज़र किससे मेरी टकरा गई

ये नज़र किससे मेरी टकरा गई

पल में दिल को बारहा धडका गई

 

एक टक उसको लगे हम ताकने

शर्म थी आँखों में हमको भा गई

लब गुलाबों से बदन था संदली

खुशबू जिसकी दिल जिगर महका गई

 

कैद है या खूबसूरत ख्वाब-गाह 

गेसुओं में इस कदर उलझा गई

 

पग जहाँ उसने रखे थे उस जगह

जर्रे जर्रे पे जवानी आ गई

 

“दीप” जो बुझने लगा था इश्क का 

मुस्कुरा के उसको वो भड़का गई

 

संदीप पटेल…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 1, 2013 at 1:30pm — 14 Comments

आत्म-मन्थन

आत्म-मन्थन

कभी-कभी इन दिनों

आत्म-मन्थन करती

जीवन के तथ्यों को तोलती

मेरी हँसती मनोरम खूबसूरत ज़िन्दगी

जाने किस-किस सोच से घायल

कष्ट-ग्रस्त

‘अचानक’ बैठी उदास हो जाती है

 

लौट आते हैं उस असामान्य पल में

कितने टूटे पुराने बिखरे हुए सपने

भय और शंका और आतंक के कटु-भाव

रौंद देते हैं मेरा ज्ञानानुभाव स्वभाव

और उस कुहरीले पल का धुँधलापन ओढ़े

अपने मूल्यों को मिट्टी के पहाड़-सा…

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Added by vijay nikore on October 1, 2013 at 1:30pm — 26 Comments

कुण्डलियाँ [ जीवन ]

जीवन के पथ हैं सरल ,अगर सही हो सोच
जीवन की इस दौड़ में ,आती रहती मोच /
आती रहती मोच ,बैठ कर रुक मत जाना
आगे की लो सोच लक्ष्य जल्दी यदि पाना
अगर सारथी कृष्ण दौड़ते जीवन रथ हैं
यदि हौंसले बुलंद, सरल जीवन के पथ हैं//

..........................

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Sarita Bhatia on October 1, 2013 at 11:30am — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मैं ग़ज़ल लिखूँ या गीत लिखूँ ? (राज)

छंदों की फुहार हैं भीगे अशआर हैं

कहे कलम क्या; सृजन करूँ ?

मैं ग़ज़ल लिखूँ  या गीत लिखूँ ?

 

जो नित नए रंग बदलते हों

पल पल में साथ बदलते हों

नूतन  परिधानों की…

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Added by rajesh kumari on October 1, 2013 at 11:30am — 18 Comments

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