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तेरी बातें (कविता)____मनोज कुमार अहसास

पढ़ा है दर्द की आँखों में तराना तेरा

तुझको मालूम हो शायद मेरा बेरंग सफ़र

मैंने हर लम्हा तेरी याद को पेशानी दी

तुझपे कुर्बान रही मेरी अकीदत की नज़र





मैं सुलगता हूँ तेरा साथ निभाने के लिए

हलाकि कुछ भी नही बाकि है जलने को इधर

ख़त्म हो चुकी इक रस्म की सांसो के लिए

ज़बी हर लम्हा ढूंढती है तेरी रहगुजर





तुझको पा लेना किसी हाल में मुमकिन ही न था

तुझको खोने की तमन्नाये उठी पर कैसे

जब थे मजबूर किसी बात की परवाह न थी

आज इन जमते हुए… Continue

Added by मनोज अहसास on August 9, 2015 at 10:39pm — 12 Comments

ग़ज़ल :यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे /श्री सुनील

2122 1212 22

यूँ ख़फ़ा भी कहाँ थे तब हम पर
तुम बहुत जाँ फ़िशाँ थे तब हम पर

उन दिनों खेलते थे तारों से
तुम हुए आस्मां थे तब हम पर

मन मुताबिक़ जहाँ में जी लेंगे
त़ारी कितने गुमां थे तब हम पर.

याद आई गली वो रूस्वाई
चीखते सब दहां थे तब हम पर.

हम तरद्दुद न इश्क़ के मानें
वो जुनूं हाँ जी हाँ थे तब हम पर.

मौलिक व अप्रकाशित

Added by shree suneel on August 9, 2015 at 5:46pm — 10 Comments

ट्रॉफी [लघु कथा]

"बधाई कर्नल कपूर i बेटे ने नाम रौशन कर दिया " कमांडेंट साहब ने गर्म जोशी से कर्नल से हाथ मिलाते  हुए कहा

 

"थैंक्यू सर "

 

आकाश देख रहा था अपने पिता को जो गर्व से फूले फिर रहे थे अपने ऑफिसर्स दोस्तों के बीच और सबकी बधाइयाँ ले रहे थे

 

उसके  काव्य संकलन को राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला था ,हफ्ते भर से टीवी ,अखबारों में उसी के चर्चे थे

 

वो सोचने लगा .. ,' उसके जैसा  नाकारा बेटा जो आर्मी में नहीं गया ,  जिसने हिंदी साहित्य विषय चुना  और…

Continue

Added by pratibha pande on August 9, 2015 at 1:30pm — 10 Comments

गजल(मनन)

गजल
2122 2122 2122
तू कहीं जा ओ यहाँअब खैर ही कब?
तोड़कर दिल वो कहेंगे गैर ही कब?
है बसी बस्ती यहाँ उन बागवां की,
लूटते जो दिल कहें की सैर ही कब?
बैठ तेरे पहलू' मन की बात करते,
नोच बखिया खूब बोले गैर ही कब?
आ कहेंगे हम रहे कबसे रे बुलाते,
रे निभायी है वफ़ा बस बैर ही कब?
है नदी साग़र नहीं जल तो बहुत है,
तिर किनारे तू लगे अब खैर ही कब?
"मौलिक व अप्रकाशित"@मनन
साग़र=प्याला
'=मात्रा-पतन
बागवाँ=बागवाले

Added by Manan Kumar singh on August 9, 2015 at 12:03pm — 7 Comments

एक गजल - सुलभ अग्निहोत्री

बहर - 212 212 212 212

काफिया - अनी, रदीफ - डाल दी

धुंध यादों पे भरसक घनी डाल दी

बन्द कमरे में वो अलगनी डाल दी 

चिथड़ा-चिथड़ा चटाई बिछी देख कर

उसने खा के तरस चांदनी डाल दी

नाम अनचाहे पर्याय भय का बना

हादसों ने अजब रोशनी डाल दी

उम्र के मशवरे चल पड़े स्वप्न भी

ला के आंखों में हीरक कनी डाल दी

वक्त का जायका था कसैला बड़ा

जिक्र भर ने तेरे चाशनी डाल दी

श्याम का नाम तूने लिया क्या…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 9, 2015 at 11:30am — 8 Comments

लघुकथा- रहस्य

लघुकथा- रहस्य   

“ इसी व्यक्ति के साथ बापू गया था . यह कह रहा था कि हम खूब पैसे कमाएंगे . बापू ने भी कहा था कि समुद्र से खूब मछलियाँ पकडूँगा . फिर ढेर सारा पैसा ले कर आऊंगा.” कहते हुए मोहन ने फोटो इंस्पेक्टर को दिया, “ साहब ! मैं वापस समुद्र के किनारे गुब्बारे बेचने जा रहा हूँ. शायद बापू या ये व्यक्ति मिल जाए.” कहते हुए मोहन  जाने लगा तो इंस्पेक्टर ने कहा, “ बेटा ! इसे देख ले. ये कौन है ?”

क्षतविक्षत फोटो में अपने बापू की कमीज पहचान कर मोहन के चीख निकल गई, “ ये तो मेरा बापू है…

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Added by Omprakash Kshatriya on August 9, 2015 at 8:00am — 6 Comments

राहत इन्दौरी साहब की ज़मीन पर एक ग़ज़ल -- दिनेश

2122-1122-1122-22



जिनको परखो, वो दग़ाबाज़ निकलते क्यूँ हैं

वक़्त पड़ने पे सभी लोग बदलते क्यूँ हैं



आज देखा जो उन्हें, हमको समझ में आया

देख कर उनको सितारे भी फिसलते क्यूँ हैं



कारवाँ दिल का लुटा था कभी जिन पर चलकर

जिस्मो-जाँ मेरे उन्हीं राहों पे चलते क्यूँ हैं



दरमियाँ अपने मरासिम जो थे सब टूट चुके

फिर मेरे ख़्वाब तेरी आँखों में पलते क्यूँ हैं



जब सियासत के हर इक रंग से हैं हम वाकिफ

रोज़ सरकारों के जुमलों से बहलते क्यूँ… Continue

Added by दिनेश कुमार on August 9, 2015 at 6:30am — 18 Comments

गजल (मनन)

गजल

122 122 122

उजाले डराने लगे हैं,

अँधेरे बुलाने लगे हैं।

विभा दीपकों से मिली थी,

जलाते ! बुझाने लगे हैं।

किताबें रखी थीं यहीं तो,

न माने,जलाने लगे हैं।

हुनर की कहूँ क्या?न पूछो,

मरे,कुछ ठिकाने लगे हैं।

नहीं है पता खुद,वहीअब

मुझे कुछ बताने लगे हैं।

न देखूँ, रिसाने लगे वे,

दिखें तो लजाने लगे हैं।

करूँ क्या कभी तो नजर है,

कभी वे बचाने लगे हैं।

भुलाता,न भूले कभी वे,

मुआ याद आने लगे हैं।

रही थीं धुनें चुप… Continue

Added by Manan Kumar singh on August 8, 2015 at 6:00pm — 3 Comments

पूछताछ /लघुकथा /कान्ता राॅय

" हो तेरी ...भीड़ ! क्या हो रहा है वहाँ बाहर ? लगता है रामचंद्र के छोरे को पुलिस पुछताछ में लगाई हुई है । जरूर कोई कांड करके आया है ये । "



"क्या कह रहे हो रनिया के बापू ... देखूं तो ..! दिन भर छोरे की तारीफ़ करती उसकी महतारी अघाती नहीं थी । जाकर अब जरा मुफ्त में अपना कलेजा ठंडा कर आती हूँ । "



"ठहरो , मै भी चलता हूँ । "



"क्या कांड किया हो दरोगा जी , इस लफंगे ने ?" - मुँछों पर ताव देकर ही मजा लिया जा सकता है... सो लगे रहे चुटकियों से मुँछे उमेठने में… Continue

Added by kanta roy on August 8, 2015 at 6:00pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सावन का 'कजरी' लोकगीत

 रिमझिम सावन की फुहार आज मेरा भैय्या आएगा

आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा

अम्बर पे बादल छाये

सखियों ने झूले पाए

भाभी ने गायी कजरी

बाबा जी घेवर लाए

कर लूँ अब मैं तनिक सिंगार आज मेरा भैया आएगा

आया तीजो का त्यौहार साथ मुझे लेके जाएगा

दीवार पे कागा बोले

यादों की खिड़की खोले

अम्मा ने संदेसा भेजा

सुनसुन मेरा मन डोले

मायके से आया तार आज मोरा भैया आएगा

आया तीजो का त्यौहार…

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Added by rajesh kumari on August 8, 2015 at 11:52am — 6 Comments

वो माँ विहीना / लघुकथा / कान्ता राॅय

बचपन में ही माँ का स्वर्गवास हो जाना और पिता का दुसरी शादी ना करने का निर्णय उस नन्हीं सी जान का अपने मामा के यहाँ पालन - पोषण का कारण बनी ।



मामी के सीने पर मूंग दलने के समान होने के बावजूद वो पल - पल बढती हुई ,उससे पिंड छुडाने के आस अब जाकर पूरी हो चुकी थी ।



शहर में पिता के पास पहुँचा दी गई ।

पिता को क्या मालूम बेटियाँ कैसे पाली जाती है !

लेकिन बेटी को मालूम था कि बेटियाँ माँ ,बहन और बेटी कैसे बनती है इसलिए दिन सुहाने से हो चले थे पिता और पुत्री दोनों के… Continue

Added by kanta roy on August 8, 2015 at 11:30am — 13 Comments

थपथपाये हैं हवा ने द्वार मेरे

मित्रों के अवलोकनार्थ एवं अभिमत के लिए प्रस्तुत एक ताज़ा नवगीत

"मौलिक व अप्रकाशित"  -जगदीश पंकज

थपथपाये हैं हवा ने द्वार मेरे

क्या किसी बदलाव के

संकेत हैं ये

फुसफुसाहट,

खिड़कियों के कान में भी

क्या कोई षड़यंत्र

पलता जा रहा है

या हमारी

शुद्ध निजता के हनन को

फिर नियोजित तंत्र

ढलता जा रहा है

मैं चकित गुमसुम गगन की बेबसी से

क्या किसी ठहराव के …

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Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on August 7, 2015 at 5:30pm — 9 Comments

गुनगुनाते हुए ज़िन्दगी की ग़ज़ल

२१२  २१२   २१२   २१२

गुनगुनाते हुए ज़िन्दगी की  ग़ज़ल

मैं चला जा रहा राह अपनी बदल

हुस्न को देख दिल जो गया था मचल

आज उसको भी देखा है मैंने अटल

वो  घने गेसू गुल से हसीं लव कहाँ

है मुकद्दर खिजाँ तो खिजाँ से बहल

उनके कूचे में मेरा जनाजा खड़ा

सोचता अब भी शायद वो जाए पिघल

शक्ल में गुल की ये मेरे अरमान हैं

नाजनी इस तरह तू न गुल को मसल

चैन मुझको मिला कब्र में लेटकर

शोरगुल भी नहीं न…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on August 7, 2015 at 2:52pm — 13 Comments

तनाव (लघुकथा)

“रंजना ! ये मोबाइल छोड़ दे. चार रोटी बना. मुझे विद्यालयों में निरिक्षण पर जाना है. देर हो रही है.”

रंजना पहले तो ‘हुहाँ’ करती रही. फिर माँ पर चिल्ला पड़ी, “ मैं नहीं बनाऊँगी. मुझे आज प्रोजेक्ट बनाना है. उसी के लिए दोस्तों से चैट कर रही हूँ. ताकि मेरा काम हो जाए और मैं जल्दी कालेज जा सकू.”

तभी पापा बीच में आ गए, “ तुम बाद में लड़ना. पहले मुझे खाना दे दो.”

“क्यों ? आप का कहाँ जाना है ? कम से कम आप ही दो रोटी बना दो ?” माँ ने किचन में प्रवेश किया.

“हूँउ  ! तुझे क्या…

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Added by Omprakash Kshatriya on August 7, 2015 at 7:30am — 14 Comments

दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ

2212       1221      2212     12



दिल चाहता है तुझसे कभी, ना गिला करूँ,

इस ज़िन्दगी में तुझसे यही सिलसिला करूँ |



दिन भर शराब पी के हुआ,था मैं दरबदर,

अब ढूंढता हूँ चादर ग़मों की सिला करूँ |



नफरत थी जिन दिलों में, भुलाया नहीं मुझे,

दिल में बता खुदा, उनके, कैसे खिला करूँ |



अमन-ओ-अमां के साये ही जिनसे नसीब हो,

ऐसे चमन  जमी दर ज़मीं  काफिला करूँ |



तन्हा है सब सफ़र और तनहा हैं रास्ते,

अब सोचता हूँ तुझसे यहाँ ही मिला…

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Added by Harash Mahajan on August 6, 2015 at 6:03pm — 13 Comments

पास क्या दूर भी नहीं कोई (इमरान खान)

आज किस तरह ज़िन्दगी खोई,

पास क्या दूर भी नहीं कोई.

एक तस्वीर दिल पे है चस्पा,

रूह जिसको लिपट-लिपट रोई.

रात भर बेकली रही मुझ पर,

और दुनिया सुकून से सोई.

फूल आंगन में अब न तुम ढूंढो,

फस्ल काँटों भरी अगर बोई.

वक़्त अपना कुछ इस तरह बीता,

हमनशीं हो गई गज़लगोई.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by इमरान खान on August 6, 2015 at 4:30pm — 7 Comments

कर सत्य को अंगीकार...

कर सत्य को अंगीकार  ....

आवरण से श्रृंगार किया

माया से किया प्यार

अन्तकाल संसार ने

सब कुछ लिया उतार

अद्भुत प्रकृति है जीव की

ये भटके बारम्बार

लौ लगाये न ईश से

पगला बिलखे सौ सौ बार

शीश झुकाये मन्दिर में

हो जैसे कोई मज़बूरी

अगरबत्ती भी यूँ जलाए

जैसे ईश पे करे उपकार

कपट कुण्ड में स्नान करे

और विकृत रखे विचार

कैसे मिलेगा जीव तुझे

उस पालनहार का प्यार

सत्य धर्म है,सत्य कर्म है

सत्य जीवन आधार

ईश स्वयं…

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Added by Sushil Sarna on August 6, 2015 at 1:13pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
असाधारण- लघुकथा (मिथिलेश वामनकर)

“आप सरकारी नौकरी के साथ समाज सेवा कैसे कर लेते है?”

“जब नौकरी से फ्री होता हूँ तो खाली समय का उपयोग कर लेता हूँ.”

 “आपको झुग्गी-बस्ती में शिक्षा के प्रसार की प्रेरणा कहाँ से मिली?”

“हा हा हा... प्रेरणा व्रेरणा कुछ नहीं भाई.... स्लम एरिया के पास वाले सिग्नल पर बच्चों को सामान बेचते और भीख मांगते देखा, तो स्लम में चला गया... लोगों से बात की तो लगा कुछ करना होगा और असली काम तो वालेंटियर ही कर रहे है.”

“आपको सब पर्यावरण-मित्र कहते है क्योकिं आप इतने बड़े ओहदे पर है फिर…

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Added by मिथिलेश वामनकर on August 6, 2015 at 12:00pm — 22 Comments

एक ग़ज़ल -- सुलभ अग्निहोत्री

बहर - 2212 1212   22 1212

वो भ्रम तुम्हारे प्यार सा बेहद हसीन था

सपनों के आसमान की मानो जमीन था

सारी थकान खींच ली गोदी में लेटकर

बच्चा वो गीत रूह का ताजातरीन था

हर खत में अपनी खैरियत, उसको दुआ लिखी

माँ यह कभी न लिख सकी, कुछ भी सही न था

मन, प्राण, आँख द्वार पर, बेकल बिछे रहे

कुनबा तमाम जुड़ गया, आया वही न था

अँजुरी मेरी बँधी रही और सारा रिस गया

वो प्यार रेत से कहीं ज्यादा महीन…

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Added by Sulabh Agnihotri on August 6, 2015 at 10:00am — 20 Comments

ठठरी पर ईमानदारी /लघुकथा /कान्ता राॅय

ईमानदारी जरा चोटिल ही हुई थी कि मौके का फायदा उठा कुछ लोगों ने उसे निष्प्राण घोषित कर तुरत - फुरत में ठठरी पर कसने लगे । उन्हे डर था उसके वापस जिंदा हो गतिमान होने का ।

जिन चार कंधों पर उसकी अर्थीं उठाई जा रही थी उनमें सबसे आगे देश के कर्णधार थे उसके पीछे भ्रष्टाचार , देश के सफलतम व्यवसाई और शेयर दलाल थे ।

सबकी आँखें चमक रही थी । सबके मन में लड्डू फूट रहे थे कि पीछे रोती हुई जनता अचानक खुशी के मारे तालियाँ बजाने लगीं ।

तालियों की शोर पर काँधे देने वालों ने चौंक कर देखा तो…

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Added by kanta roy on August 6, 2015 at 9:00am — 25 Comments

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