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इज्जत

(ताटंक छन्द)

इज्जत देना जब सीखोगे, इज्जत खुद भी पाओगे,

नेक राह पर चलकर देखो, कितना सबको भाओगे।

शब्द बाँधते हर रिश्ते को, शब्द तोड़ते नातों को।

मधुर भाव जो मन में पनपे, बहरा समझे बातों को।

तनय सुता वनिता माता सब,भूखे प्रेम के होते हैं,

कड़वाहट से व्यथित होय ये, आँसू पीकर सोते हैं।

इज्जत की रोटी जो खाते, सीना ताने जीते हैं,

नींद चैन की उनको आती, अमृत सम जल पीते हैं।

नारी का गहना है इज्जत, भावों की वह…

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Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on January 10, 2019 at 4:30pm — 3 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९१

२२१ २१२१ १२२१ २१२



आके तेरी निगाह की हद में मिला सुकूँ

हल्क़े को वस्ते बूद की ज़द में मिला सुकूँ //१



थी रायगाँ किसी भी मुदावे की जुस्तजू

दिल के मरज़ को दर्दे अशद में मिला सुकूँ //२



आशिक़ को अपनी जान गवाँ कर भी चैन था

जलकर अदू को पर न हसद में मिला सुकूँ //३



दामे सुख़न की अपनी हिरासत को तोड़कर

लफ़्ज़ों को ख़ामुशी की सनद में मिला सुकूँ…

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Added by राज़ नवादवी on January 10, 2019 at 1:04am — 10 Comments

ग़ज़ल: पांचों घी में रहती है जब सरकारी कारिन्दों की.............(१३)

(२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२ २ )

***

पांचों घी में रहती है जब सरकारी कारिन्दों की 

कौन सुने फ़रियाद अँधेरी नगरी के बाशिन्दों की 

***

टूटी है मिजराबें फिर भी साज़ बजाना पड़ता है 

बे-सुर होते सुर तो इसमें ग़ल्ती क्या साजिन्दों की 

***

फेंक दिया करते कचरे में क्या क्या लोग पुलिंदों में 

असली कीमत आज समझते कचराबीन पुलिंदों की …

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 9, 2019 at 11:00pm — 4 Comments

नींद जो कहलाती हूँ

श्रांत स्लॉथ हो, जब
घर, लौट के आता
तुझे विश्राम कराती हूँ,
हर थकान को मैं, मिटाकर
आराम तुझे दिलाती हूँ,
नींद जो कहलाती हूँ||
.
हर व्यथा और तिरस्कार को,
मैं भुलाकर
सपनों की सैर कराती हूँ
विचित्र दुनियाँ में
तुझे घुमाकर,
ख़ुशी तुझे दिलाती हूँ,
नींद जो कहलाती हूँ||
.
कभी नृप कभी रंक बनाकर
ब्रह्मांड का खेल दिखाती…
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Added by PHOOL SINGH on January 9, 2019 at 3:00pm — 3 Comments

इंतेज़ार

इंतज़ार!
उसके आने का!
की आकर रोक लेगा....
मेरे बहते अश्रुधार को!
थकान...दर्द..
उदासी..तड़प..
समेट लेगा सब
अपनी बाहों में!!
मेरी नाराजगी का बुलबुला
फूट जाएगा..
उसकी छुवन से!!
शाम हुई!
हुआ इंतेज़ार पूरा!
वो आया!
और कर गया अधूरा!
उसका आना
सच था...
या सपना??
मार गया मुझे!
उसका
अपरिचित सा मिलना!!


मौलिक व अप्रकाशित

Added by V.M.''vrishty'' on January 9, 2019 at 2:34pm — 5 Comments

बाद ए सबा

बाद ए सबा

 

पूछा जो किसी ने बावरी बाद ए सबा से

उफ़्ताँ व खेज़ाँ है तू ए बावली हवा

टकराई है तू बारहा बेरहम दीवारों से

खटखटाए हैं कितने बंद दरवाज़े भी तूने

आज बता तो ज़रा तेरी मंज़िल कहाँ है…

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Added by vijay nikore on January 9, 2019 at 1:05pm — 4 Comments

मेरी दस्तार ख़ानदानी है- ग़ज़ल

2122/1212/22

------------------------------

हार तूफ़ान से न मानी है

कश्ती ने तैरने कि ठानी है



मेरी पलकों पे ये जो पानी है

ऐ मुहब्बत तेरी निशानी है



हमने माना बहुत पुरानी है

पर बहुत ख़ूब ये कहानी है



दिल पे चस्पां है जो नही मिटती

यूूँ तेरी हर शबीह फानी है



राख मैं कर चुका तेरे ख़त को

याद लेकिन मुझे ज़बानी है



हर किसी दर पे ये नही झुकती

मेरी दस्तार ख़ानदानी है



पहली बारिश है तिफ़्ल बन…

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Added by Gajendra shrotriya on January 9, 2019 at 11:59am — 16 Comments

ग़ज़ल: न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी ...(१२ )

(१२१२ ११२२ १२१२ २२/११२ )

***

न हसरतों से ज़ियादा रखें लगाव कभी 

वगरना क़ल्ब में मुमकिन है कोई घाव कभी 

***

इमारतें जो बनाते जनाब रिश्तों की 

उन्हें भी चाहिए होता है रखरखाव कभी 

***

हयात का ये सफर एक सा कहाँ होता 

कभी ख़ुशी तो मिले ग़म का भी पड़ाव कभी 

***

न इश्क़ की भी ख़ुमारी सदा रहे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 8, 2019 at 7:00pm — 17 Comments

देहलीज़  -  लघुकथा -

देहलीज़  -  लघुकथा -

दिल्ली में जनवरी की कयामत की सर्दी वाली रात। रात के ग्यारह बजे के लगभग घर की डोर बेल बजी।  घर में दो बुजुर्ग प्राणी। दोनों ही सत्तर  पार। आमतौर पर नौ बजे तक रजाई में घुस जाते थे। गहरी नींद में थे। बार बार घंटी बजी तो शर्मा जी की आँख खुली तो उठकर द्वार खोलने चल दिये। खटर पटर की आवाज से तथा लाइट जलने से मिसेज शर्मा भी आँख मलते हुए उठ बैठी।

"सुनो जी, तुम रुको, मैं खोलती हूँ।"

वे थोड़ी मजबूत थीं। शर्मा जी दुबले पतले और बीमार  भी थे। वे रुक गये। मिसेज शर्मा…

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Added by TEJ VEER SINGH on January 8, 2019 at 6:14pm — 10 Comments

कसक- लघुकथा

रेशमा की नजर फिर उस लड़की पर पड़ी जो कल ही यहाँ लायी गई थी. बेहद घबराई और लगातार रोती हुई वह लड़की देखने में तो किसी गरीब घर की ही लगती थी लेकिन पढ़ी लिखी भी लगती थी. उससे रहा नहीं गया तो वह उसकी तरफ बढ़ी और पास जाकर उसने पूछा "क्या नाम है रे तेरा और कहाँ से आयी है? यहाँ रोने धोने से कुछ नहीं होता, जितनी जल्दी सब मान लेगी, उतना बढ़िया. वर्ना तेरी दुर्गति ही होनी है यहां पर".

लड़की ने उसकी तरफ देखा, रेशमा की आँखों का सूनापन देखकर वह सिहर गयी. उसने रेशमा का हाथ पकड़ा और फफक पड़ी "मुझे यहाँ से बचा…

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Added by विनय कुमार on January 8, 2019 at 5:52pm — 12 Comments

३ क्षणिकाएं :

३ क्षणिकाएं :

तृप्त हो गए

चक्षु

पिघला कर

एक पाषाण से बोझ को

हृदय की

स्मृति श्रृंखला से

.......................

मृत्यु

किसी जीवंत स्वप्न का

यथार्थ है

ज़िंदगी

यथार्थ का

आभास है

प्रीत

आभास में निहित

विश्वास है

...............................

कुछ टूटा

कुछ छूटा

प्रीत पथ के

अंतस से

वेदना साकार हुई

बुत बनी आँखों से …

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Added by Sushil Sarna on January 8, 2019 at 2:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल: फिर नए सपने दिखाना चुप रहो

2122 2122 212

आज उनका है ज़माना चुप रहो ।

गर लुटे सारा खज़ाना चुप रहो ।।

क्या दिया है पांच वर्षों में मुझे ।

मांगते हो मेहनताना चुप रहो ।।

रोटियों के चंद टुकड़े डालकर ।

मेरी गैरत आजमाना चुप रहो ।।

मंदिरों मस्ज़िद से उनका वास्ता ।

हरकतें हैं वहिसियाना चुप रहों ।।

लुट गया जुमलों पे सारा मुल्क जब ।

फिर नये सपने दिखाना चुप रहो ।।

दांव तो अच्छे चले थे जीत के ।

हार पर अब…

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Added by Naveen Mani Tripathi on January 8, 2019 at 12:30pm — 10 Comments

गजल

2122 2122 2122 212

प्यार का तुमने दिया मुझको सिला कुछ भी नहीं,

मिट गये हम तुझको लेकिन इत्तिला कुछ भी नहीं।

कोख में ही मारकर मासूम को बेफ़िक्र हैं,

फिर भी अपने ज़ुर्म का जिनको गिला कुछ भी नहीं।



राह जो खुद हैं बनाते मंजिलों की चाह में ,

मायने उनके लिए फिर काफिला कुछ भी नहीं।

हौंसले रख जो जिये पाये सभी कुछ वे यहाँ,

बुज़दिलों को मात से ज्यादा मिला कुछ भी नहीं।

ज़िंदगी चाहें तो बेहतर हम बना सकते यहाँ,

ज़ीस्त में…

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Added by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on January 7, 2019 at 8:02pm — 13 Comments

फूल की कहानी -फूल की जबानी

मैं सक्षम, हूँ विलक्षण

निर्मल करता, विचलित मन

पुलकित कर तेरे, तन मन

सुगन्धित करता, वन उपवन

प्रकृति का श्रृंगार कर

महक का प्रसार कर

चिंतन करता हर एक क्षण

खुशियाँ देता मैं पल पल

न्योछावर अपना जीवन कर

कभी मंदिर, कभी जमी में

कभी रेंगता धूलि में

जीवन की प्रवाह ना कर

खुशियाँ बाटता हर एक क्षण

कभी कंठ की शोभा बनता 

कभी बढाता शोभा शव

कभी गजरा नारी बनता

कभी में देता सेज सजा

क्षण भर के…

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Added by PHOOL SINGH on January 7, 2019 at 4:30pm — 4 Comments

कलम ....

कलम ....

कहाँ

चल सकती है

बिना बैसाखी के

कागज़ पर

कलम

पडी रहती है

निर्जीव सी

किसी के इंतज़ार में

कलमदान में

कलम

लेकिन

ये न हो तो

आसमान की ऊंचाईयों को

ज़मीन नहीं मिलती

शब्दों को पंख नहीं मिलते

सोच को साकार का माध्यम नहीं मिलता

भाव अन-अंकुरित ही रह जाते हैं

यथार्थ में देखा जाए तो

कलम को बैसाखी की नहीं

अपितु

भाव

बिना कलम की बैसाखी के

मृत समान होते…

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Added by Sushil Sarna on January 7, 2019 at 2:46pm — 2 Comments

गज़ल - गमों का नाम हो जाये हमारे नाम से साकी।

पिला दे घूंट दो मुझको, ज़रा नजरों से ऐ साकी।।

मिलुंगा मैं तुझे हर मोड़ पे पहचान ले साकी।।१।।

अभी तो दिन भी बाकी है ये सूरज ही नहीं डूबा।

इसे दिलबर के आंचल में जरा छुप जान दे साकी।।२।।

जिसे पूजा किये हरदम जिसे समझा खुदा मैंने।

किया बर्बाद मुझको तो उसी इन्सान ने साकी।।३।।

मेरा महबूब भी तू है मेरा हमराज भी तू है।

वे दुश्मन थे मेरे पक्के जो मेरे साथ थे साकी।।४।।

नहीं इससे बड़ी कोई भी अब अपनी तमन्ना है।

गमों का नाम हो जाये हमारे नाम से…

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Added by Amit Kumar "Amit" on January 6, 2019 at 10:30pm — 10 Comments

'तुरंत' के दोहे (पुच्छल )

प्रस्तुत है कुछ पुच्छल दोहे 

=====================

प्रेम और उत्साह जब ,पैदा करें तरंग | 

छोड़ कुसुम के तीर तब , विहँसे तनिक अनंग || 

मिलन का क्षण ही ऐसा | 

***

देश प्रेम की हर समय ,उठती रहे हिलोर | 

उन्नति की फिर देश में ,निश्चित होगी भोर || 

यही हो लक्ष्य हमेशा | 

***

ह्रदय सभी के आ सकें ,थोड़े से भी पास | 

फिर निश्चित इस देश में ,छा जाये…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on January 6, 2019 at 2:30pm — 5 Comments

विलीन ...


विलीन ...

क्या
मिटते ही काया के
सब कुछ मिट जाता है
शायद नहीं
जीवित रहते हैं
सृष्टि में
चेतना के कण
काया के
मिट जाने के बाद भी
मेरी चेतना
तुम्हारी चेतना से
अवशय मिलेगी
इस सृष्टि में
विलीन हो कर भी
काया के मिट जाने के बाद

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 6, 2019 at 2:09pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ९०

२१२२ ११२२ ११२२ ११२/२२



अस्ल के बाद तो जीना है निशानी के लिए

ज़िंदगी लंबी है दो रोज़ा जवानी के लिए //१



यूँ ज़बां ख़ूब है ये तुर्रा बयानी के लिए

उर्दू मशहूर हुई शीरीं ज़बानी के लिए //२



लोग क्यों दीनी तशद्दुद के लिए मरते हैं

जबकि जीना था उन्हें जज़्बे रुहानी के लिए //३



नफ़्स के झगड़े हैं ने'मत से भरी दुन्या में

चंद रोटी के लिए तो, कभी पानी…

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Added by राज़ नवादवी on January 6, 2019 at 1:18pm — 12 Comments

वन्दना (दुर्मिल सवैया)

कर जोड़ प्रभो विनती अपनी, तुम ध्यान रखो हम दीनन का।

हम बालक बृंद अबोध अभी, कुछ ज्ञान नहीं जड़ चेतन का

चहुओर निशा तम की दिखती, मुख ह्रास हुआ सच वाचन का

अब नाथ बसों हिय में सबके, प्रभु लाभ मिले तव दर्शन का ।।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by नाथ सोनांचली on January 6, 2019 at 1:06pm — 2 Comments

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