1212 1222 1212 22
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अदा में शोखियाँ मस्ती गुलाबी रंग धरे
ये कौन आया है महफ़िल में चाँदनी पहने
ये हुस्न है या कोई दरिया ही चला आया
है दिल डुबोने को गालों पे इक भँवर ले के
ठुमकने लगते हैं सपने सलोने सरगम पर
वो खिलखिला के हँसे तो लगे सितार बजे
नज़र उसी पे ही सबकी टिकी है महफ़िल में
ये बात और है उसकी निगाहें बस मुझ पे
ज़रा सा छू ने पे छुई मुई समेटे ज्यूँ खुद को
नज़र पड़े तो वो खुद को समेटती…
Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 17, 2019 at 7:30pm — 4 Comments
2122-2122-2122
वक्त से दो चार हो जाने लगे हैं।।
मन की मनमानी को ठुकराने लगे हैं।।
अब जो अरमानों को टहलाने-लगे* हैं।।(बहाने बाजी करना)
जीस्त की सच्चाई अपनाने लगे हैं।।
उम्र की दस्तक़ जो है चहरे प मेरे।
श्वेत होकर केश लहराने लगे हैं।।
बचपना अब रूठता सा जा रहा है ।
पौढ़पन* अब अक्श दरसाने लगे हैं।।
मंजिलों में जिनके परचम दिख रहे उन।
सब के तर* पे शाल्य* मनमाने लगे हैं।।( निचला हिस्सा,…
Added by amod shrivastav (bindouri) on March 16, 2019 at 1:21pm — 4 Comments
चलो मुद्दों की बात करते हैं
वही मुद्दे जिनसे वो डरते हैं
वादे जितने भी उनको करने हों
बेहिचक वो तो किया करते हैं
बात जो पूछ लो गरीबों की
वो अमीरों की बात करते हैं
आपने प्रश्न उनसे जो पूछे
देशद्रोही करार करते हैं
है कहाँ रोजगार गर पूछो
बैंड बाजे की बात करते हैं
क्या किसानों की करेंगे ये मदद
सोना, आलू से पैदा करते हैं
इनकी नज़रों में जनता उल्लू है
उल्लू ये सीधा किया करते…
Added by विनय कुमार on March 15, 2019 at 4:05pm — 6 Comments
ग़ज़ल
मापनी: 2122 2122 2122 212
आंख से आंसू कभी यों ही बहाया ना करो
दर्द दिल का भी जमाने को बताया ना करो
हर किसी को मुफ्त में कोई खुशी मिलती नहीं
मेहनत से आप अपना जी चुराया ना करो
जिन्दगी ले जब परीक्षा हौसलों से काम लो
आपदा के सामने खुद को झुकाया ना करो
हैं सफलता और नाकामी समय का खेल ही
लक्ष्य से अपनी नजर को तो हटाया ना करो
जीत लेंगे जिन्दगी की जंग ’मेठानी‘ सुनो
तुम निराशा को कभी मन में बसाया ना…
Added by Dayaram Methani on March 15, 2019 at 1:14pm — 5 Comments
1-
होते आम चुनाव से, नेता सत्तासीन।
वोटों की खातिर सभी, खूब बजाते बीन।।
खूब बजाते बीन, करें बढ़चढ़कर वादे।
बन जाते हैं मूर्ख, लोग जो सीधे-सादे।।
चुनकर स्वयं अयोग्य,बाद में खुद ही रोते।
लोकतंत्र की रीढ़, यही मतदाता होते।।
2-
आए हैं अब देश में, फिर से आम चुनाव।
इसीलिए गिरने लगे, नेताओं के भाव।।
नेताओं के भाव, फिरें घर-घर रिरियाते।
चुन जाने के बाद, न जो सुधि लेने आते।।
करिए सही चुनाव, वोट यह व्यर्थ न जाए।
पाँच वर्ष पश्चात्, चुनाव…
Added by Hariom Shrivastava on March 15, 2019 at 9:32am — 5 Comments
ग़ज़ल (यूँ ही तो न मायूस हम हो गए)
(फ ऊलन _फ ऊलन _फ ऊलन _फ अल)
यूँ ही तो न मायूस हम हो गएl
अचानक सितम उनके कम हो गए l
ज़माने की नाकाम साज़िश हुई
वो मेरे हुए उनके हम हो गए l
खिलाफे सितम क्या सुखनवर लिखें
बिकाऊ जब उनके क़लम हो गए l
हुकूमत बचा ज़ुल्म की संग दिल
सभी अब खिलाफे सितम हो गए l
कोई आ गया आख़री वक़्त क्या
सभी खत्म दिल के अलम हो गए l
यूँ ही तो न यारों को हैरत हुई…
ContinueAdded by Tasdiq Ahmed Khan on March 14, 2019 at 5:23pm — 6 Comments
खुशबू से भरा रहता…
ContinueAdded by Neelam Upadhyaya on March 14, 2019 at 3:00pm — 6 Comments
इसमें 32 मात्राऐं व 16'16 पर यति तथा अंत में भगण अर्थात् (211) अनिवार्य है।
【इस छंद में नया प्रयोग करने का प्रयास। अंत में भगण की अनिवार्यता के कारण ‘दीर्घ’ मात्रा प्रयुक्त, अन्यथा सम्पूर्ण छंद में लघु वर्ण】
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झटपट सजधजकर लचक-धचक, डगमग चलकर पथ महकाकर।
तन झटक-मटक नटखट कर-कर, नयनन सयनन मन बहकाकर।।
फिर घट कर गहकर सरपट चल, पनघट पर झट अलि सँग जाकर।
जल भरकर सर पर घट रखकर, पग-पग चलकर खुश घर आकर।।
(मौलिक व…
Added by Hariom Shrivastava on March 13, 2019 at 7:31pm — 5 Comments
ख़्वाब ....
चोट लगते ही
छैनी की
शिला से आह निकली
जान होती है
पत्थर में भी
ये अहसास हुआ आज
छीलता रहा पत्थर को
निकालना था एक ख़्वाब
बुत की शक्ल में
उसके गर्भ से
रो दी शिला
जब
ख़्वाब
बुत में
धड़कने लगा
क्या हुआ
जो रिस रहा था खून
बुतगर के हाथ से
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on March 12, 2019 at 5:00pm — 4 Comments
221 1221 1221 122
बातिल को नज़र से ही गिरा क्यों नहीं देते
आईना उसे सच का दिखा क्यों नहीं देते//1
अब ऐब तुम्हारा तो नज़र आने लगा है
अफ़वाह नई कोई उड़ा क्यों नहीं देते//2
क्या बेच नहीं पा रहा अपनी अना को वो
अख़बार कोई उसको पढ़ा क्यों नहीं देते//3
महफ़िल में तमाशा न करो ऐ मेरे मुंसिफ़
क़ातिल तो वहीं पर है सज़ा क्यों नहीं देते//4
क्या प्यार सभी क़ौम से है उसको अभी तक
टीवी पे नई बहस दिखा क्यों नहीं…
Added by क़मर जौनपुरी on March 12, 2019 at 1:13pm — 8 Comments
शीत जैसी चुभन, आग जैसी जलन।।
जाने क्या कह रहा है मेरा आज मन।।
इक कशिश पल रही है हृदय में कहीं।
कश्मकश चल रही , साथ मेरे कोई।।
डुबकियां ले रहा ही मेरा आज मन।।
इस कदर है अधर से अधर का मिलन।।
जैसे पुरवा पवन छू रही हो बदन।।..१
जाने क्या कह रहा है .....
गर हूँ तन्हा मेरे साथ तन्हाई है।
भीड़ के साथ हूँ तो ये रूसवाई है।
दौड़कर पास आना लिपटना तेरा।।
मेरे आगोश में यूँ सिमटना तेरा।।
यूँ लगे जैसे मिलतें हो धरती…
Added by amod shrivastav (bindouri) on March 12, 2019 at 10:48am — 2 Comments
Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 12, 2019 at 9:52am — 5 Comments
भारत के नौजवानों ,माँ भारती पुकारती ,
देश के सपूत तुम ,फर्ज तो निभाइए |
मुश्किल घड़ी है आज,दाव पे लगी है लाज,
सिंग सा दहाड़ कर देश को जगाइए |
वीरता रगों में भर ,शौर्य की कहानी गढ़ ,
प्रचंड चंड रूप तो शत्रु को दिखाइए |
पावन मन गंगा हो ,ले हाथ में तिरंगा हो ,
वन्दे मातरम् गीत ,गाते सब जाइए |
***********
मौलिक और अप्रकाशित रचना
महेश्वरी कनेरी
Added by Maheshwari Kaneri on March 11, 2019 at 5:30pm — 5 Comments
22-22-22-2
मन भी कितना आतुर है।।
ज्यूँ सबकुछ जीवन भर है।।
पशुओं कि यह हालत भी।
इंसानों से बेहतर है।।
लोक समीक्षा इतनी ही।
जितना चिड़िया का पर है।।
मेरा मेरा मुझको ही।
छाया है सब छप्पर है।।
कितना तुम अब भागोगे ।
तीन-कदम* पर ही घर है।।(बचपन जवानी बुढ़ापा)
खूब बड़े बन जाओ क्या…
ContinueAdded by amod shrivastav (bindouri) on March 11, 2019 at 2:49pm — 3 Comments
बेटा-बेटी में किया, जिसने कोई भेद।
उसने मानो कर लिया, स्वयं नाव में छेद।।
स्वयं नाव में छेद, भेद की खोदी खाई।
बहिना से ही दूर, कर दिया उसका भाई।।
कोई श्रेष्ठ न तुच्छ, लगें दोनों ही प्रेटी।
ईश्वर का वरदान, मानिये बेटा-बेटी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**
Added by Hariom Shrivastava on March 11, 2019 at 10:30am — 7 Comments
फिर उठीं है जाग देखों शहर में शैतानियाँ
दर्द आहों में बदलने क्यूँ लगी कुर्वानियाँ
जान लेने को खड़े तैयार सारे आदमी
हर जगह बढ़ने लगी है आज कल विरानियाँ
घूमते थे रात दिन हम आपकी ही चाह में
जब समझ आया खुदा तो हो गईं आसानियाँ
जोड़ तिनके है बनाया आशियाँ तुम सोच लो
आबरू इस में छुपी है मत करो नादानियाँ
गंध आने है लगी क्यूँ फिर यहाँ बारूद की
याद कर तू बस खुदा को छोड़ बेईमानियाँ
आदमी मजबूर देखो हो गया इस दौर में
खून में शामिल…
ContinueAdded by munish tanha on March 10, 2019 at 8:00pm — 3 Comments
22-22-22-22
मैं कुछ और कहाँ कहता हूँ।।
गैरों से लिपटा - अपना हूँ।।
वैमनष्यता न सर उठा पाए।
दुश्मन की तरहा रहता हूँ।।
दरपण भी छू सकता है क्या।
बस ये ऐसे ही - पूछा हूँ।
कलियाँ खुशबू बिखरायेंगी।
मैं वक़्त कहाँ कब रुकता हूँ।।
आमोद रखो, बिश्वास रखो।
पग पग जीवन में अच्छा हूँ।।
..अमोद बिंदौरी / मौलिक अप्रकाशित
Added by amod shrivastav (bindouri) on March 10, 2019 at 11:30am — 5 Comments
बेटा-बेटी में करें, भेदभाव क्यों लोग।
सबका अपना भाग्य हैं, जब हो जिसका योग।।
जब हो जिसका योग, और प्रभु की जो मर्जी।
कौन श्रेष्ठ या हेय, धारणा ही ये फर्जी।।
पुत्री हो या पुत्र, नहीं इसमें कुछ हेटी।
दोनों एक समान, आज हैं बेटा-बेटी।।
(मौलिक व अप्रकाशित)
**हरिओम श्रीवास्तव**
Added by Hariom Shrivastava on March 10, 2019 at 10:30am — 7 Comments
2122 1212 22
दरमियाँ हुस्न पर्दा दारी है ।
कैसे कह दूँ के बेक़रारी है ।।
ऐ कबूतर जरा सँभल के उड़ ।
देखता अब तुझे शिकारी है ।।
कौन कहता बहुत ख़फ़ा हैं वो ।
आना जाना तो उनका जारी है ।।
सब बताता है नूर चेहरे का ।
रात उसने कहाँ गुजारी है ।।
कैसे कर लूं …
ContinueAdded by Naveen Mani Tripathi on March 10, 2019 at 9:00am — 5 Comments
प्लेन उड़ाती लडकियां
(लघुकथा)
एयरोनॉटिकल शो। किस्म किस्म के हवाई जहाज़ आसमान में करतब दिखाते उड़े जाते हैं। अधिकतर प्लेन लड़कियां उड़ा रही हैं।
"पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी...।" एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है।
लड़कियां आसमान में प्लेन उड़ा रही हैं। लड़कियां आसमान छू रही हैं। लड़कियों का आत्मविश्वास आसमान पर है और एक छोटी बच्ची अपने पिता से ज़िद कर रही है, "पापा, पापा... मैं भी प्लेन उड़ाऊंगी।"
लोग कहते हैं, “लड़कियों को पंख लग गये…
ContinueAdded by Mirza Hafiz Baig on March 9, 2019 at 7:58pm — 8 Comments
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