ठूंठ - लघुकथा -
राम दयाल अपनी घर वाली की जिद के आगे झुक गया। हालांकि उसकी दलील इतनी मजबूत तो नहीं थी लेकिन वह घर में किसी प्रकार की क्लेश नहीं चाहता था। उसकी घर वाली का मानना था कि उसके सासु और ससुर की वजह से उसके बेटे की शिक्षा पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था।
अतः वह चाहती थी कि सासु ससुर जी को वृद्धाश्रम भेज दो।
आज मजबूरन राम दयाल उन दोनों को वृद्धाश्रम छोड़ कर घर वापस जा रहा था।लेकिन उसका मन इस कृत्य के लिये उसे धिक्कार रहा था।
वृद्धाश्रम से बाहर जैसे ही वह मुख्य सड़क…
ContinueAdded by TEJ VEER SINGH on December 28, 2019 at 1:37pm — 8 Comments
प्रिय तुझसे मैं प्यार करूँ ...
स्मृति घरौंदों में तेरा मैं
कालजयी श्रृंगार करूँ
अभिलाष यही है अंतिम पल तक
प्रिय तुझसे मैं प्यार करूँ
श्वास सिंधु के अंतिम छोर तक
देना मेरा साथ प्रिय
उर -अरमानों के क्रंदन का
कैसे मैं परिहार करूँ
अभिलाष यही है अंतिम पल तक
प्रिय तुझसे मैं प्यार करूँ
मेरी पावन अनुरक्ति का
करना मत तिरस्कार प्रिय
दृग शरों के घावों का मैं
कैसे क्या उपचार करूँ
अभिलाष यही…
Added by Sushil Sarna on December 27, 2019 at 6:30pm — 6 Comments
क्या तुम्हारा जमीर ना जागता
क्यों घायल किसी को करते हो
पुलिस वाले भी अपने भाई-बंधु
पत्थर उनको क्यूँ मारते हो ||
विरोध करना, विरोध करो तुम
संविधान अधिकार ये देता है
उपद्रव ना मचाने की
हिदायत भी संविधान हमारा देता है ||
उपद्रव का ना मार्ग चुनो
शांति से विरोध करो
पुलिस करती रखवाली हमारी
उस पर बेवजह ना वार करो ||
दिन रात करती हमारी…
ContinueAdded by PHOOL SINGH on December 26, 2019 at 3:21pm — 4 Comments
जब पीड़ा आसुओं को मात दे,
और संभाले ना संभले मन।
जब यादें मेरी दिल पर दस्तक दें,
और बेचैन हो ये अंतर्मन।
तब तुम कोई गीत लिखना प्रिये,
मैं आऊँगी भाव बनकर ज़रूर।
जब मेरी कमी तुमको खले,
और खोजे अक्श मेरा तुम्हारा मन।
जब बोझिल हो रातें काटे ना कटे,
और नींद से आँख-मिचौली खेले नयन।
तब तुम कोई सपना सजाना प्रिये,
मैं आऊँगी तुमसे मिलने ज़रूर।
जब पतझड़ में झड़ते हो पत्ते पुरातन,
और लहरों को देख विचलित हो मन।…
Added by Dr. Geeta Chaudhary on December 26, 2019 at 2:00pm — 6 Comments
२१२२ १२१२ २२/११२
अब दिखेगी भला कभी हममें..
आपसी वो हया जो थी हममें ?
हममें जो ढूँढते रहे थे कमी
कह रहे, ’ढूँढ मत कमी हममें’ !
साथिया, हम हुए सदा ही निसार
पर मुहब्बत तुम्हें दिखी हममें ?
पूछते हो अभी पता हमसे
क्या दिखा बेपता कभी हममें ?
पत्थरों से रही शिकायत कब ?
डर हथेली ही भर रही हममें !
चीख भरने लगे कलंदर ही..
मत कहो, है बराबरी हममें !
नूर ’सौरभ’…
ContinueAdded by Saurabh Pandey on December 25, 2019 at 11:30pm — 8 Comments
ऐ मेरे दोस्त मोहब्बत को बचाए रखना
दिल में ईमान की शम्अ' को जलाए रखना
-
इस नए साल में खुशियों का चमन खिल जाए
सबको मनचाही मुरादों का सिला मिल जाए
इस नए साल में खुशियों की हो बारिश घर घर
इस नए साल को ख़ुश रंग बनाए रखना
-
जान पुरखों ने लुटाई है वतन की ख़ातिर
गोलियाँ सीने में खाई है वतन की ख़ातिर
सारे धर्मों से ही ताक़त है वतन की मेरे
सारे धर्मों की मोहब्बत को बनाए रखना
-
ज़ात के नाम पे दंगों को…
ContinueAdded by SALIM RAZA REWA on December 24, 2019 at 7:00pm — 2 Comments
जाने कैसी विडम्बना जीवन की
जो इस दशा आ गिरी
ना कोई हमदर्द अपना
ना ही मेरा साथी कोई, ना किसी ने वेदना सुनी ||
आते-जाते सब देखते
मिलता ना अब तक बिरला कोई
मेरी सुने कभी अपनी सुनाये
आत्मीयता से मिले कभी ||
ना क्षुधा मुझे किसी के धन की
ना लोभ भी मन में कोई
कहीं पड़ा मिल जाता पाथेय
उससे अपना पेट भरी ||
आमूल तक मै टूट चुकी
महि मुझको कोष रही
व्रजपात…
ContinueAdded by PHOOL SINGH on December 24, 2019 at 12:56pm — 1 Comment
३ क्षणिकाएँ ....
बाहर
प्रचंड तूफ़ान
संघर्ष का
अंतस में
शब्दहीन
गहरा सागर
स्पर्श का
अनुबंध
खंडित हुए
बाहुबंध
मंडित हुए
मौन सभी
दंडित हुए
प्रश्न
विकराल थे
उत्तरों के जाल थे
गोताखोर
विलग न कर सका
आभास को
यथार्थ से
अंत तक
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on December 23, 2019 at 7:30pm — 6 Comments
सच सच बोलो आओगी ना
जब सूरज पूरब से पश्चिम
तक चल चल कर थक जाएगा
और जहाँ धरती अम्बर से
मिलती है उस तक जाएगा
चारो ओर सुनहला मौसम
और सुनहली लाली होगी
और लौटते पंछी होंगें
खेत-खेत हरियाली होगी
दिन भर के सब थके थके से
अपने घर को जाते होंगे
कभी झूम कर कभी मन्द से
पवन बाग लहराते होंगे
तुम भी उसी बाग के पीछे
आकर उसी आम के नीचे
झूम-झूम कर मेरे ऊपर
तुम खुद को लहराओगी ना
सच सच बोलो…
Added by आशीष यादव on December 22, 2019 at 10:30pm — 4 Comments
ज़िंदगी में रह गया है अपनी तो बस अब यही
प्रदीप्ति में तुम रहो रहोगे,तिरगी में हम सही
किसको किससे प्यार कितना, क्या करोगे जानकर
उसका मुझसे कुछ है ज्यादा, औऱ मेरा कम सही
आ चलें मंदिर में,औऱ सौगंध खा कर ये कहें
साथ गर टूटेगा अगर तो, हम नहीं या तुम नहीं
पी रहे हो रात दिन, होकर मगन क्या सोचकर
बादा है जान लो तुम,आब-ए ये जमजम…
ContinueAdded by प्रदीप देवीशरण भट्ट on December 20, 2019 at 12:00pm — 1 Comment
फ़लक पे चाँद ऊँचा चढ़ रहा है।
तेरी यादों में गोते खा रहा हूँ
हवा हौले से छूकर जा रही है।
तेरी खुशबू में भीगा जा रहा हूँ।
लिपट कर चाँदनी मुझसे तुम्हारे
बदन का खुशनुमा एह्सास देती
कभी तन्हा अगर महसूस होता
ढलक कर गोद में एक आस देती
नहीं हो तुम मगर ये सब तुम्हारे
यहाँ होने का एक जरिया बने हैं
समा पाऊँ तेरी गहराइयों में
हवा खुशबू फ़लक दरिया बने हैं।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:13am — 2 Comments
जाने अनजाने में कितनी
जिसे सोचते रातें काटीं
लम्हों-लम्हों में किश्तों में
जिनको अपनी साँसें बाटीं
कभी अचानक कभी चाहकर
जिसे ख़यालों में लाता था
और महकती मुस्कानों पर
सौ-सौ बार लुटा जाता था
उसकी बोली बोल हृदय में
तुमने जैसे आग लगा दी
तुमने उसकी याद दिला दी
अँधियारी रजनी में खिलकर
चम-चम करने लगते तारे
इक चंदा के आ जाने से
फ़ीके पड़ने लगते सारे
शीतल शांत सजीवन नभ में
रजत चाँदनी फैलाता था
तम-गम में भी…
Added by आशीष यादव on December 20, 2019 at 10:00am — 4 Comments
अहसास ...
देर तक
देते रहे
दस्तक
दिल के दरवाज़े पर
वो अहसास
जो तुम
अपनी आँखों से
छोड़ गए थे
मेरी आँखों में
जाते वक्त
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on December 19, 2019 at 7:30pm — 4 Comments
झूम के बरख़ा बरसी है ऐसे
जैसे दिन आया हो कोई ख़ास
मेरा तन भी भीगा मन भी भीगा
जगी अब पिया मिलन क़ी आस
पवन वेग से जल क़ी बूंदे कुछ
पूरब से पश्चिम तक हैं जाती
और पिया के सन्देशों को मेरे
अन्तर्मन की तह तक पहुँचाती
इससे पहले रुक जाए बरख़ा
तुम जल्दी घर आ जाओ ना
तप्त ह्रदय की ज्वाला की तुम
अपने नेह से प्यास बुझाओ ना
(मौलिक व अप्रकाशित)
- प्रदीप…
ContinueAdded by प्रदीप देवीशरण भट्ट on December 19, 2019 at 4:41pm — 2 Comments
अभी जरा मैं धनुष सजा लूं फिर आता हूँ
विष से थोड़े विशिख बुझा लूं फिर आता हूँ I
सोने की लंका बनती है तो बन जाने दो
रावण का डंका घहराता है घहराने दो
धर्म शास्त्र खंडित होते हैं मत घबराओ
छा रहा यज्ञ का धूम मलिन तो छाने दो
लेकिन हो रहा सतीत्व हरण यदि नारी का
लूटा जाता है सर्वस्व किसी सुकुमारी का
तो अग्निबाण मेरा अणु-बम सा फूटेगा
मैं प्रत्यंचा खींच धनुष की अब आता हूँ I
राक्षस था…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 18, 2019 at 8:30pm — 9 Comments
समय ने हद से बढ़ के जब नयी मजबूरियाँ दी हैं
उन्हीं मजबूरियों ने ही तनिक चालाकियाँ दी हैं।१।
सफर में राह ने काँटे उगाये पाँव बेबस कर
मगर इक हौसले ने ही कई बैशाखियाँ दी हैं।२।
बढ़ाया हाथ भी ठिठका कहा भौंरे ने जब इतना
खिले फूलों के रंगों ने चमन को तितलियाँ दी हैं।३।
भुला बैठे हैं सब शायद यही …
Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 17, 2019 at 8:29pm — 8 Comments
हमारे इल्म का वो क़द्रदान थोड़ी है ।
हमें दे रोटियां कोई महान थोड़ी है ।।
उसे है बेचना हर ईंट इस इमारत की ।
हुज़ूर मुफ़्त में वो मिह्रबान थोड़ी है ।।
विकास सब का हो और साथ भी रहे सबका ।
ये राजनीति है पक्की ज़ुबान थोड़ी है ।।
लुढ़क रहे हैं ख़ज़ाने ये फ़िक्र कौन करे…
ContinueAdded by Naveen Mani Tripathi on December 17, 2019 at 2:49pm — 1 Comment
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मत कहो आप दौरे गुरबत है ।
चश्मेतर हूँ ये वक्ते फुरकत है ।।
कुछ तो भेजी खुदा ने आफ़त है ।
ये तबस्सुम है या क़यामत है ।।
उसकी किस्मत को दाद देता हूँ ।
जिसको हासिल तुम्हारी कुर्बत है ।।
अलविदा मत कहें हुजूर अभी ।
बज़्म को आपकी ज़रूरत है ।।
इश्क़ में क्या …
ContinueAdded by Naveen Mani Tripathi on December 16, 2019 at 12:30pm — 1 Comment
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या
तुम सुगंध खिलते गुलाब सी
सुन्दर कोमल मधुर ख्वाब सी
मैं मरुथल का प्यासा हरिना
ललचाती मुझको सराब* सी
तुमको पाने की चाहत में
अब तक मचल रही हैं साँसें
तुम ही कह दो तुमको अपने
प्राणों का मनमीत लिखूँ क्या
तुम पर कोई गीत लिखूँ क्या
तुम शीतल हो चंदन वन सी
तुम निर्मल-जल, तुम उपवन सी
तुम चंदा सी और चाँदनी-
सी तुम हो, तुम मलय-पवन सी
नयन मूँद कर तुमको देखूँ…
ContinueAdded by आशीष यादव on December 15, 2019 at 3:00pm — 2 Comments
वोटर पापड़ बेल रहे हैं
और मसीहे खेल रहे हैं।1
उम्मीदें जिनकी मुरझाईं
उट्ठक - बैठक पेल रहे हैं।2
मत देने पर स्याही सूखी,
दाग लगे, सब झेल रहे हैं।3
लड़ते - मरते लोग - लुगाई
नेता भरसक रेल रहे हैं।4
'अक्ल बड़ी कह भैंस लजाई,
अंधे गाड़ी ठेल रहे हैं।5
जिसकी पूंछ मिले,पकड़ें सब
बैतरणी को हेल रहे हैं।6
पाठ पढ़ाते चलते हैं वे
जो जीवन भर फेल रहे हैं।7
कुर्सी खातिर मिल…
ContinueAdded by Manan Kumar singh on December 14, 2019 at 4:44pm — 8 Comments
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