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कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . .

मन से मन का हो गया, मन ही मन अभिसार ।
मन में  मन  के प्रेम  का, सृजित  हुआ संसार ।
सृजित हुआ संसार , हाथ  की  चूड़ी  खनकी ।
मुखर हुआ शृंगार , बात फिर निकली मन की ।
बंध  हुए  निर्बंध ,भाव   सब   निकले  तन  से ।
मन  ने  दी  सौगात , प्रीति  को  सच्चे  मन से ।

सुशील सरना / 2-2-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on February 2, 2025 at 5:05pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . संबंध

दोहा पंचक. . . . संबंध

अर्थ लोभ की रार में, मिटा खून का प्यार ।

रिश्ते सब  आहत  हुए, शेष  रही तकरार ।।

वाणी  कर्कश  हो  गई, मिटी नैन से लाज ।

संबंधों में स्वार्थ की, मुखर हुई आवाज ।।

प्यार मिटा पैदा हुई, रिश्तों में तकरार ।

फीके - फीके  हो गए, जीवन  के  त्योहार ।।

दिखने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।

वक्त पड़े तो छोड़ता, खून, खून का हाथ ।।

आपस में ऐसे मिलें, जैसे हों मजबूर ।

निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।…

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Added by Sushil Sarna on February 1, 2025 at 2:24pm — No Comments

दोहा अष्टक (प्रकृति)

*दोहा अष्टक* 

------------------

पहन पीत पट फूलते,

सरसों यौवन बंध।

चिकनाहट सी गात में,

श्वास तेल की गंध।1।

उड़ते हुए पराग कण,

मधुकर कर गुंजार।…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on January 29, 2025 at 5:00pm — 3 Comments

शंका-दोहा अष्टक-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

शंका-दोहा अष्टक

***

शंका दुख को जन्म दे, शंका मतकर व्यर्थ।

घर-बाहर इससे सदा, होता सकल अनर्थ।१।

*

आसपास जब-जब बढ़े, शंकाओं के शूल।

असमय जाते सूख तब, सुख के सारे फूल।२।

*

शंका नामक रोग  से, तन-मन जल भंगार।

औषध पाया खोज कब, इस का ये संसार।३।

*

लघुतम रहे विवाद को, शंका नित दे तूल।

संतों को असहज रहे, दुर्जन को अनुकूल।४।

*

शंका उस मन जन्म ले, जिसमें रहता खोट।

सदा  रक्तरंजित   रहे,  इससे  पाकर  चोट।५।

*

शंका बैरी चैन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 25, 2025 at 7:40am — No Comments

गणतंत्र ( दोहा सप्तक ) -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'



जन्म दिवस गणतंत्र का, मना रहे हम आज

रखने  को  सौगंध  खा, संविधान  की लाज।।

*

नाम रखा गणतंत्र गह, राजतंत्र की रीत

कैसे हो गण का भला, ऐसे में कह मीत।।

*

संविधान  की  पीठ  ने, रचे  बहुत  से स्वप्न

गण तक पहुँचे वो नहीं, तंत्र कर गया दफ्न।।

*

पथ में बिखरे शूल सब, यदि ले तंत्र समेट

जनसेवक से हो  नहीं, जनता का आखेट।

*

आठ दशक से जप रहे, गण हैं जिसका मंत्र

देता रोक  स्वराज  वह, क्यों पगपग पर तंत्र।।

*

गण की गण…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 25, 2025 at 7:30am — No Comments

छः दोहे (प्रकृति)

छः दोहे (प्रकृति)

----------

अलंकार सम रूख धर,

रंग बिरंगा रूप।

पुष्प पात फल वृन्त रस,

बाँट रहे ज्यों भूप।1।

धरा गगन के मध्य में,

मेघों का संचार।

शांत करें तन ताप मन,

ज्यों शीतल उद्गार।2।

हर्षाए से मेघ भी,

जल भर लाए थाल।

नव अंकुर मुँह खोलते,

ज्यों तरिणी…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on January 24, 2025 at 5:30pm — 1 Comment

दोहा सप्तक. . . धर्म

दोहा सप्तक. . . धर्म

धर्म बताता जीव को, पाप- पुण्य का भेद ।

कैसे जीना चाहिए, हमें सिखाते वेद ।। 

 

दया धर्म का मूल है, यही सत्य अभिलेख  ।

करे अनुसरण जीव जो, बदले जीवन रेख ।।

 

सदकर्मों से है भरा, हर मजहब का ज्ञान।

चलता जो इस राह पर, वो पाता पहचान ।।

 

पंथ हमें संसार में, सिखलाते यह  मर्म ।

जीवन में इन्सानियत, सबसे  उत्तम कर्म ।।

 

चलते जो संसार में, सदा धर्म की राह ।

नहीं निकलती कष्ट में, उनके मुख…

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Added by Sushil Sarna on January 18, 2025 at 1:00pm — 2 Comments

दोहे (प्रकृति)

  *दोहे (प्रकृति)*

 

कुदरत पूजूँ प्रथम पद,

पग - पग पर उपकार।

अस्थि चर्म की देह मम,

 पंच तत्त्व का सार।1।

 

दसों दिशाएं मन बसीं,

 करते कवि अरदास।

धरा अग्नि रवि वायु…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on January 18, 2025 at 12:30pm — 1 Comment

दोहा सप्तक. . . जीत - हार

दोहा सप्तक. . . जीत -हार

 

माना जीवन को नहीं, अच्छी लगती हार ।

संग जीत के हार से, जीवन का शृंगार ।। 

 

हार सदा ही जीत का, करती मार्ग प्रशस्त ।

डरा हार से जो हुआ, उसका सूरज अस्त ।।

 

जीत हार के राग  में, उलझा जीवन गीत ।

दूर -दूर तक जिंदगी, ढूँढे सच्चा मीत ।।

 

कभी हार है जिंदगी, कभी जिंदगी जीत ।

जीवन भर होता ध्वनित, इसमें गूँथा गीत ।।

 

मतलब होता हार का, फिर से एक प्रयास ।

हर कोशिश में जीत की,…

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Added by Sushil Sarna on January 16, 2025 at 3:00pm — 2 Comments

शर्मिन्दगी - लघु कथा

शर्मिन्दगी ....

"मैने कहा, सुनती हो ।"रामधन ने अपनी पत्नी को आवाज देते हुए कहा ।

"क्या हुआ, कुछ कहो तो सही ।"

"अरे होना क्या है । अपने पड़ोसी रावत जी की बेटी संजना ने अपने ब्वाय फ्रेंड के साथ भाग कर कोर्ट मैरिज करके इस उम्र में अपने माँ-बाप को शर्मसार कर दिया ।बेचारे! अच्छा हुआ, अपनी कोई बेटी नही केवल एक बेटा राहुल है ।" रामधन ने कहा।

इतने में डोर बेल बजी टननन ।

"कौन? " रामधन जी दरवाजे खोलते हुए बोले ।

" रामधन जी, अपने संस्कारवान बेटे को…

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Added by Sushil Sarna on January 15, 2025 at 1:12pm — 6 Comments

दोहा सप्तक. . . पतंग

दोहा सप्तक . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।

बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।। 

 

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।

आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

 

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।

डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

 

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।

जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

 

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।

उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग…

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Added by Sushil Sarna on January 14, 2025 at 8:30pm — 2 Comments

कविता (गीत) : नाथ सोनांचली

जब उमड़ते भाव अविरल अश्रु का संसार लेकर

तब कहीं कविता उपजती शब्द का आकार लेकर

पीर के परिमाप से करके स्वयं का 'नाथ' तर्पण

रात दिन पीड़ा दबाए आत्म का करके समर्पण

दर्द की अभिव्यंजना से कुछ नई गढ़ कल्पनाएँ

चित्र छपते जब हृदय पर कुछ नए किरदार लेकर

तब कहीं कविता उपजती शब्द का आकार लेकर

तप्त धरती बादलों की जिस घड़ी करती प्रतीक्षा

दर्द में  डूबे  हृदय  की  वास्तविक  होती  परीक्षा

याचना करता पपीहा और बिछुड़न के हृदय से

छेड़ती है राग विरहन जब…

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Added by नाथ सोनांचली on January 14, 2025 at 2:14pm — 4 Comments

मकर संक्रांति

 

प्रकृति में परिवर्तन की शुरुआत

सूरज का दक्षिण से उत्तरायण गमन

होता जीवन में नव संचार

बाँट रहे तिल शक्कर मूंगफली वस्त्र

ढोल पर तक - धिन - तक - धिन थिरकते

युवा बुजुर्गों संग बाल

कर्णप्रिय लोकगीतों की मधुर सी धुन…

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Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on January 13, 2025 at 8:00pm — 2 Comments

नए साल में - गजल -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

पूछ सुख का पता फिर नए साल में

एक निर्धन  चला  फिर नए साल में।१।

*

फिर वही रोग  संकट  वही दुश्मनी

क्या हुआ है नया फिर नए साल में।२।

*

बात यूँ तो  विगत भी रही अनसुनी

किसने माना कहा फिर नए साल में।३।

*

लोग नफरत  पहन  दौड़ते जा रहे

जब वही है हवा फिर नए साल में।४।

*

मैं न स्वागत  न  तू दोस्ती कर रहा

कौन सीखा बता फिर नए साल में।५।

*

मौलिक/अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 12, 2025 at 7:45am — No Comments

भाग्य और गर्भ काल ( दोहा दसक)-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

चाहे करता  भाग्य  ही, जीवन भर संयोग

उच्च कर्म से भाग्य भी, बदला करते लोग।१।

*

सद्कर्मों की  चाल  से, माता देकर त्राण

गर्भकाल में जीव का, करे भाग्य निर्माण।२।

*

कर्म भाग्य  दोनों  रहें, जब  बन पूरक रोज

पाते दुख के गाँव में, मानव तब सुख खोज।३।

*

सदा कर्म ही जीव का, देता है फल जान

उद्यत लेकिन कर्म को, भाग्य करे नादान।४।

*

गर्भकाल है स्वर्ग या, जीवन से बढ़ नर्क

या लेखा है भाग्य का, अपने अपने तर्क।५।

*

गर्भ काल सब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 8, 2025 at 1:30pm — No Comments

जाने तुमको क्या क्या कहता

तेरी बात अगर छिड़ जाती

जाने तुमको क्या क्या कहता

सूरज चंदा तारे उपवन

झील समंदर दरिया कहता

कहता तेरे होंठ गुलाबी

जैसे सूरज निकल रहा है 

कहता बदन तुम्हारा ऐसा

जैसे सोना पिघल रहा है 

मै तुमको सम्मोहक कहता

मै मनभावन रत्ना कहता

कहता तेरा रूप बहारों

की तरुणाई के जैसा है

और बदन, कहता संगमरमर

सी चिकनाई के जैसा है

तुमको पूनम की रातों का

जगमग जगमग चंदा कहता

तेरे…

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Added by आशीष यादव on January 7, 2025 at 8:30pm — 1 Comment

दोहा दसक- बेटी -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

बेटी  को  बेटी  रखो, करके  इतना पुष्ट

भीतर पौरुष देखकर, डर जाये हर दुष्ट।१।

*

बेटा बेटा  कह  नहीं, बेटी  ही  नित बोल

बेटा कहके कर नहीं, कम बेटी का मोल।२।

*

करती दो घर  एक  है, बेटी पीहर छोड़

कहे पराई पर उसे, जग की रीत निगोड़।३।

*

कर मत कच्ची नींव पर, बेटी का निर्माण

होता नहीं  समाज  का, ऐसे जग में त्राण।४।

*

बेटी को मत दीजिए, अबला है की सीख

कर्म उसी के गेह  से, रहे चाँद तक चीख।५।

*

बेटों को भी दीजिए, कुछ ऐसे सँस्कार

बेटी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 7, 2025 at 1:27pm — No Comments

दोहा सप्तक - नाम और काम- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

नाम भले पहचान  है, किन्तु बड़ा है कर्म

है जीवन में वो सफल, जो समझा ये मर्म।१।

*

महिमा कहते कर्म की, जग में संत कबीर

नाम-नाम ही जो रटे, समझो सिर्फ फकीर।२।

*

नामीं द्विज भी रह गये, कर्म फला रैदास

पुण्य कर्म  आशीष  को, गंगा  माई पास।३।

*

केवल कर्म बखानता, जग में है इतिहास

सूरज  जैसा  कर्म  ही, देता  नाम उजास।४।

*

दबे कोख इतिहास की, कर्महीन जो गाँव

किन्तु उजागर हो गये, सदा कर्म के पाँव।५।

*

लिखे कर्म की लेखनी, चमक चाँदनी…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 6, 2025 at 5:40pm — No Comments

जमा है धुंध का बादल

  

चला क्या आज दुनिया में बताने को वही आया

जमा है धुंध का बादल हटाने को वही आया

जरा सोचो कभी झगड़े भला करते किसी का क्या

कभी बारूद या गोले बसा पाए किसी को क्या

तबाही ही तबाही है दिखाने को वही आया

जमा है धुंध का बादल हटाने को वही आया

मतों का भिन्न हो जाना सही है मान लेते हैं

सभी चिंतन जरूरी हैं इसे भी जान लेते हैं

मगर कट्टर नहीं अच्छा जताने को यही आया

जमा है धुंध का बादल हटाने को वही आया

चला है देख लो कैसा…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on January 5, 2025 at 10:30pm — No Comments

शीत- दोहा दसक-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

शीत लहर की चोट से, जीवन है हलकान

आँगन जले अलाव तो, पड़े जान में जान।१।

*

मौसम का क्या  हाल  है, पर्वत  पूछे नित्य

ठिठुर चाँद सा हो गया, क्या बोले आदित्य।२।

*

धुन्ध फैलती जा रही, ठिठुरन  है चहुँ ओर

गर्म लहू का देह में, शिथिल पड़ गया जोर।३।

*

चला न पलभर सिर्फ रख, एसी-कूलर बंद

तन कहता है खूब ले, कम्बल का आनन्द।४।

*

फैला चादर  धुन्ध  की, हो मौसम गम्भीर

कहे सुखाओ रे! इसे, मिलकर सूर्य समीर।५।

*

पीते गटगट  चाय  सब, पहने  मोजे…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 4, 2025 at 2:23pm — No Comments

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