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दरार – ( लघुकथा ) -

दरार – ( लघुकथा )    -

 मीरा और मोहन कितने खुश थे जब उनके परिवार वालों ने उनके प्रेम विवाह को  मंज़ूरी दे दी!मीरा के तो पैर ज़मीन पर ही नहीं पड रहे थे! हनीमून के लिये श्रीनगर  गये!दौनों की खुशियां सातवें आसमान पर थीं!

 एक दिन अंतरंग क्षणों में, कसमे वादे के दौर में, मीरा ने मोहन को अपने साथ हुई एक घटना  सुना दी,” वह जब सोलह साल की थी!उसके दूर के रिश्ते के मामाजी ने उसके साथ ज़बरदस्ती की थी! उसने  मॉ को  रो रो कर सारा वाकया सुनाया! वह चाहती थी कि  पुलिस में शिकायत  कर दो! पर मॉ ने…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 26, 2016 at 11:50am — 10 Comments

नशा लघुकथा

नशा

कभी बाएं कभी दायें डोलती सी तेज गति से आती अनियंत्रित गाड़ी मोड पर पलट गई. भीड़ जमा हो गई आसपास किसी तरह से गाड़ी में सवार दोनों युवकों को बाहर निकाला गया. उफ़...ये क्या दोनों नशे में धुत थे..

पुलिसवाला होने के नाते मेरा फ़र्ज़ था कि ड्यूटी पर न होते हुए भी मामले को सुलझाऊ. मैंने दोनों मे से एक के पिता जो प्रोफेसर भी थे, को बुलवाया..

ये क्या वो शर्मिंदा होने के स्थान पर मुझसे ही उलझ गए “न कोई मरा है न किसी को चोट आई है तो एक्सीडेंट कहाँ से हो गया..ले दे कर बात खत्म करो बच्चों को घर… Continue

Added by Seema Singh on March 26, 2016 at 11:29am — 5 Comments

चिप्स पापड़ में ठनी...

गज़ल....बह्र----२१२२, ११२२,  ११२२,  २२

आम के बाग में महुआ से मिलाया उसने.

मस्त पुरवाई हसीं फूल सजाया उसने.

शुद्ध महुआ का प्रखर ज्ञान पिलाया उसने'

संग होली का मज़ा प्रेम सिखाया उसने.

ज़िन्दगी दर्द सही गर्द छिपा कर हॅसती,

चोट गम्भीर भले घाव सिलाया उसने.

ताल-नदियों में अड़ी रेत झगड़ती रहती,

लाज़-पानी के लिये मेघ बुलाया उसने.

वक्त की खार हवा घात अकड़ पतझड़ सब,

होलिका खार की हर बार जलाया…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 26, 2016 at 12:30am — 4 Comments

निःशब्द

कल सोते सोते

मेरी बांह को अश्रू से भिगोते
मेरे लाल ने जगा दिया
सकते में ला…
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Added by amita tiwari on March 25, 2016 at 8:30pm — 2 Comments

प्यास होंठों पे निगाहों में उदासी रह गई

ग़ज़ल



जबसे उनसे मिलने की चाहत अधूरी रह गई

प्यास होंठों पे निगाहों में उदासी रह गई



बैठकर धीरे से लम्बी कार में वो चल दिए

बैलगाड़ी प्यार की पीछे हमारी रह गई



फूल गुलदस्ते किताबें ख़त जला डाले सभी

फिर भी उनके प्यार की दिल में निशानी रह गई



दिन महीने साल बीते जाम आँखों से पिए

मुद्दतों के बाद भी मुझमें ख़ुमारी रह गई



हम मिले मिलके चले कुछ दूर राहे इश्क़ में

मिल गई मंज़िल मगर कुछ बेक़रारी रह गई



बेचकर सबकुछ भी दे… Continue

Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on March 25, 2016 at 12:30pm — 1 Comment

होलिका दबंग है

कलाधर छंद......होलिका दबंग है

विधान---गुरु लघु की पंद्रह आवृति और एक गुरु रखने का प्राविधान है. अर्थात २, १ गुणे १५  तत्पश्चात एक गुरु रखकर इस छंद की रचना की जाती है.   इस प्रकार इसमें इकतीस वर्ण होते हैं.  संदर्भ अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद की पुस्तक " छंद माला के काव्य-सौष्ठव"  में ऐसे अनेकानेक सुंदर छंद विद्यमान हैं..

यथा----…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 25, 2016 at 12:00pm — 4 Comments

इससे अच्छा है मर जाना (ग़ज़ल)

बह्र : २२ २२ २२ २२

 

जीवन भर ख़ुद को दुहराना

इससे अच्छा है मर जाना

 

मैं मदिरा में खेल रहा हूँ

टूट गया जब से पैमाना

 

भीड़ उसे नायक समझेगी

जिसको आता हो चिल्लाना

 

यादों के विषधर डस लेंगे

मत खोलो दिल का तहखाना

 

सीने में दिल रखना ‘सज्जन’

अपना हो या हो बेगाना

---------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 24, 2016 at 10:19pm — 10 Comments

गीतिका(मनन)

राम-राम,सलाम संग होली का पैगाम:

#गीतिका#

30 मात्राएँ, 16 14 पर यति

मापनी 2*8 2*7

***

छौंरा-छौंरी खेले होली खिसिआये हैं काकाजी

अपने-काकी के लफड़े रिसिआये हैं काकाजी।

आयी है होली हुड़दंगी हैं रंगे रामू-रजनी

काकी रंगों से कतराती बिखिआये हैं काकाजी।

पकवानों से मन भरता कब मीठा-मीठा हो जाता

कुछ तीखी नमकीनी खातिर रिरिआये हैं काकाजी।

काकी कहती खुद को देखो देखा करते काकी को

मटका करती भर आँगन सज दिठिआये हैं काकाजी।

काकी कहती छोड़ो बूढ़े! अब तो… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 24, 2016 at 8:11am — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
होली मनाना आपका.....ग़ज़ल // डॉ. प्राची

है अदा या फिर सितम होली मनाना आपका।

रात के बारह बजे जी भर सताना आपका।



रंग ले आना छिपाकर नित नई तरकीब से

हाय! चालों में उलझ हल्ला मचाना आपका।



टैग तय कर टोलियों में, बालटी के ड्रम लिए

क्या गज़ब अंदाज़ है, टोली में जाना आपका।



जीन्स टी-शर्टों की कतरन काट करना चीथड़े

बन लफंडर साथ फिर ऊधम मचाना आपका।



हम भला कोरे रहें ये आपको मंज़ूर कब

पर कहो अच्छा है क्या हमको भिगाना आपका?



बन के बन्दर लौटकर दर्पण में खुद को देखकर

साल के… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 23, 2016 at 3:00pm — 8 Comments

गजल(मनन)

2212 2 22 22

गगरी कहो तो भरती कब है!

परवान चाहत चढती कब है।1



उफनी उमंगों की लहरी यह

चढती चली फिर गिरती कब है।2



कबसे रही भँवरों में फँसकर

नैया भला यह तिरती कब है।3



बाँहें पसारे सागर उछला

सिकता जरा भी घिरती कब है।4



उठते किले ख्वाहिश के कितने!

आशा अपूरित मरती कब है।5



टंगी नजर दर आहट खातिर

रुनझुन रूठी लय रचती कब है।6



धड़कन गिना दे पुरवा खुलके

महफिल कहीं भी सजती कब है ।7



भौंरा बिंधा है… Continue

Added by Manan Kumar singh on March 23, 2016 at 12:25pm — 5 Comments

हंसीं शशि मलाला......

गज़ल.....१२२  १२२  १२२  १२२

हमारे घरों का उजाला लिये जो.

हंसीं शशि मलाला सितारा लिये जो.

 

लड़ी गोलियों से बिना खौफ खाये

खुले आसमां का हवाला लिये जो.

 

दुआ यदि सलामत कयामत भी हारे

ये तारिख बलन्दी की माला लिये जो.

 

चुरा कर खुशी ज़िन्दगी लूट लेते-

उन्हीं से मुहब्बत–फंसाना लिये जो.

 

ये होली-दिवाली मिले ईद-सत्यम

हंसी फाग समरस तराना लिये जो.

सुखनवर....केवल प्रसाद…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 23, 2016 at 11:58am — 9 Comments

होली विशेष

बिखर रहे हैं व्योम में, तरह तरह के रंग।

सबके भीगे अंग हैं, मन में भरी उमंग।।



होली के इस पर्व की, अद्भुत है हुड़दंग।

कोई नाचे राह में, कोई बाँटें भंग।।



चूँ चूँ चूँ चूँ गा रही, गौरैया भी गीत।

मैं भी बैठा सुन रहा, क्या कहती ये मीत।।



डी जे वाला शोर ये, मुझको नहीं पसंद।

जाने कौन बजा रहा, भद्दे भद्दे छन्द।।



मैल मिटा कर मेल कर, मन का निखरे रंग।

वर्ग विभाजन बन्द कर, बदलो अपने ढंग।।



हम लोगों के मेल में, भारत का… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 23, 2016 at 10:48am — 4 Comments

एक गज़ल....होली पर

एक गज़ल....होली पर
 
इसलिये प्यार है.
अपनी सरकार है.
 
कहता बदमाश पर,
करता सत्कार…
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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 23, 2016 at 10:31am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सॉनेट : एक प्रयास (मिथिलेश वामनकर)

क्या है जीवन, आज समझने मैं आया हूँ

कठिन समय का दर्द सदा ही पाया मैंने

बस आशा का गीत   हमेशा गाया मैंने

जब तुम बनते धूप, बना तब मैं साया हूँ

 

जन्म काल से सत्य एक जो जुड़ा हुआ है

मानव की उफ़ जात बनी ये आदत कैसी

सदा ज्ञात यह बात मगर क्यों भूले जैसी

वहीँ शून्य आकाश एक पथ मुड़ा हुआ है

 

आया है जो आज उसे निश्चित है जाना

इस माटी का मोह, रहे क्यों साँझ सकारे?

इस माटी का रूप बदल जायेगा प्यारे 

फिर भी रे इंसान…

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Added by मिथिलेश वामनकर on March 22, 2016 at 10:44pm — 31 Comments

नव गीत

धूसरित था मलिन-मुख हम स्वच्छ दर्पण कर रहे

झूठ को अपना लिया हर सत्य से अब डर रहे  

 

अवधान तुमने किया था

हमने उसे माना नहीं

पाखण्ड यौवन का सदा

उद्दाम था जाना नही

पत्र अब इस विटप-वपु के सब समय से झर रहे

 

चेतना या समझ आती

है मगर कुछ देर से

बच नहीं पाता मनुज

दिक्-काल के अंधेर से

जो किया पर्यंत जीवन अब उसी को भर रहे

 

हम अकेले ही नहीं 

संतप्त है इस भाव में

जल रहा है अखिल…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 22, 2016 at 7:50pm — 12 Comments

मन बहुत उदास है ...

मन बहुत उदास है ...

जाने क्यूँ आज

मन बहुत उदास है

वज़ह भी कोई ख़ास नहीं

फिर भी एक

अंजानी से उदासी ने

हृदय में पाँव पसार रखे हैं //

लगता है शायद

कुछ ऐसा रह गया

जो अपनी पूर्णता को

प्राप्त न कर सका हो //

या फिर कोई लम्हा

शब की चादर में

अधूरी ख्वाहिशों की उदासी के साथ

धीरे धीरे अंगड़ाई लेते लेते

जाग गया हो //

या फिर कोई याद

तन्हाईयों में रक्स करती

उदासी के घरौंदे में…

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Added by Sushil Sarna on March 22, 2016 at 4:25pm — 4 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण रामानुज

होली  पर्व  की  हार्दिक शुभकामनाओं सहित  प्रस्तुत -

कुंडलिया  छंद 

=========

होली का त्यौहार ये, लगता सदा बहार

भारत वासी मानते, सतरंगी त्यौहार,

सतरंगी त्यौहार, मनाते घर घर खुशियाँ

बजता ह्रदय मृदंग, रंग बरसाते हुरियाँ |

लक्ष्मण देखे लोग,बनाते अपनी टोली

जीजा साली संग, खेलते खुलकर होली |

 (2)

होली में दिल खोलकर, करे आप सत्कार

घर में खुशियों के लिए,आया यह त्यौहार

आया यह त्यौहार, यहाँ पर सभी मनाते

फाग खेलते…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 22, 2016 at 10:48am — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुहब्बत का करो इजहार होली में (ग़ज़ल 'राज '

बह्र --हजज मुसद्दस सालिम

१२२२ १२२२ १२२२

गुलाबी रंग दो रुख्सार होली में

खुमारी भंग की हो यार होली में

 

मिटा दो दुश्मनी मिलकर गले यारो   

मुहब्बत का करो इजहार होली में

 

कहानी प्रीत की फिर से नई लिक्खो  

पुरानी भूल कर तकरार होली में

 

अनेकों रंग मिलकर एक हो जाओ

करो मत धर्म का व्यापार होली में

 

खुले दिल से बिना डर के खिलें कलियाँ

हटाओ रास्ते से ख़ार होली में

 

मिटाकर दूरियाँ…

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Added by rajesh kumari on March 22, 2016 at 10:10am — 4 Comments

खिलौने वाली गन (लघुकथा) – शुभ्रान्शु पाण्डॆय

खिलौने वाली गन (लघुकथा) – शुभ्रान्शु पाण्डॆय

==================================

“पापा, वो वाली गन !  देखो न, कितनी असली सी लगती है !” – सुपर बाज़ार की भीड़-भाड़ में बिट्टू उस खिलौने वाली गन के पीछे हठ कर बैठा था ।

“नहीं बेटा.. हमें वो चावल वाली सेल के पास चलना है । जल्दी करो, नहीं तो वो खत्म हो जायेगा..”

“पापा, इस पर भी सेल की बोर्ड लगा रखी है.. पापा ले लो ना…प्लीऽऽज..”,

बिट्टू की मनुहार भरी आवाज सुन कर किसी का मन न रीझ जाये । लेकिन रमेश अपने एक मात्र हजार…

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Added by Shubhranshu Pandey on March 22, 2016 at 9:30am — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
होली पर एक प्रेम गीत....//डॉ. प्राची

माही तेरा रंग गुलाबी, सब रंगो में सबसे से गहरा



रंग भरी ले कर पिचकारी

क्यों करता नटखट अठखेली,

हाय! मेरी चूनर रंग डाली

चुहल करे हर एक सहेली,

पायल की रुनझुन में गुपचुप, मगर लाज का गूँजा पहरा।



इस अबीर का रंग है पक्का

लग जाए फिर ये ना छूटे,

बंधन ऐसा प्रेमपाश का

जुड़ जाए फिर ये ना टूटे,

शब्द-शब्द अंतर से उतरा, पर आँखों में आ कर ठहरा।



माही के रंगो में सोनी

सोनी के रंग रंगा माही,

ढले एक दूजे के ढंग में

जन्मों के जैसे… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 21, 2016 at 8:27pm — 2 Comments

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