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2212 2 22 22
गगरी कहो तो भरती कब है!
परवान चाहत चढती कब है।1

उफनी उमंगों की लहरी यह
चढती चली फिर गिरती कब है।2

कबसे रही भँवरों में फँसकर
नैया भला यह तिरती कब है।3

बाँहें पसारे सागर उछला
सिकता जरा भी घिरती कब है।4

उठते किले ख्वाहिश के कितने!
आशा अपूरित मरती कब है।5

टंगी नजर दर आहट खातिर
रुनझुन रूठी लय रचती कब है।6

धड़कन गिना दे पुरवा खुलके
महफिल कहीं भी सजती कब है ।7

भौंरा बिंधा है खारों से पर
गुनगुन कहीं धुन रूकती कब है।8

फागुन बसे जो अँवराई में
शहनाई' कह कम बजती कब है।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by रामबली गुप्ता on March 27, 2016 at 1:19pm
वाह वाह आ.मनन जी शानदार ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें
Comment by Manan Kumar singh on March 25, 2016 at 12:14pm
आभार जनाब शकूर जी।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 25, 2016 at 10:57am
जनाब मनन साहब ती के पहले दीर्घ मात्रिक स्वर यथा आ, ई होता या या मूल शब्द का आखिरी अक्षर समान होता यथा भरती के साथ सँवरती तो ये ऐब नहीं होता, अती काफ़िया नहीं लिया जा सकता। आगे आपकी मर्ज़ी रचना आपकी है जैसा चाहे रखें। और अधिक जानकारी आपको इसी मंच पर मौजूद ग़ज़ल की बातें नामक पोस्ट के काफ़िया दोष वाले हिस्से में मिल जायेगी। सादर,
Comment by Manan Kumar singh on March 25, 2016 at 10:08am
आदरणीय शकूर जी, पूरी गजल देखने पर शायद शंका निर्मूल हो जाये। काफिया तो ठीक ही प्रतीत होता है-अती।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on March 24, 2016 at 7:43pm
आदरणीय मननजी कोशिश अच्छी है बधाई स्वीकार करें। एक बात और मतले में काफ़िया दोष नुमायाँ है ज़रा देख लीजियेगा

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