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दर्द भूख का यारो - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

मौत   बेटियों   को  बस,  दाइयाँ  समझती  हैं

पीर  के  सबब  को  सब  माइयाँ  समझती  हैं

**

सोच  आज  तक  भी जब,  है  गुलाम जैसी ही

मुल्क  की  अजादी  क्या, बेडि़याँ  समझती हैं

**

दो  बयाँ  भले  ही  तुम  देश  की  तरक्की के

हर खबर है सच कितनी सुर्खियाँ समझती हैं

**

आप   के  बयानों  में    खूब   है  सफाई  पर

बेवफा  कहाँ  तक  हो,   पत्नियाँ  समझती हैं

**

दोष  तुम  निगाहों   को  बेरूखी  की  देते  हो

कान …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 16, 2014 at 12:30pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उपयोगिता

फौलाद भी

चोट से आकार बदल लेते हैं

या टूट जाते हैं

फिर इंसान की क्या बिसात

कब तक सहेगा चोट

आखिर टूटना पड़ेगा

इंसान ही तो है

मगर

टूटकर भी कायम रहेगा

या बिखर जायेगा

ये इंसान की प्रकृति तय करेगी

 

हालात बदलने को तैयार है

पुरानी सड़क पर

डामर की नई परत बिछेंगी

खण्डरों का जीर्णोद्धार होगा

पुरानी इमारत के मलबे पड़े हैं

कुछ मलबे काम आयेंगे

कुछ मलबे मिटाये जायेंगे

ये…

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Added by शिज्जु "शकूर" on May 15, 2014 at 6:08pm — 36 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कोयला दहके तो अच्छा है ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122     2122     2

अब हवा है , कोयला दहके तो अच्छा है        

देख ले ये बात भी कहके तो अच्छा है

 

खूब झेला पतझड़ों को, अब कोई कोना

इस चमन का भी ज़रा महके तो अच्छा है

 

सीलती सी, उस अँधेरी झोपड़ी में भी ,

देखते हैं आप जो रहके , तो अच्छा है

 

कहकहा केवल नहीं अनुवाद जीवन का

दर्द भी आकर कभी चहके , तो अच्छा है

 

ज़िन्दगी बेस्वाद लगती है लकीरों में

अब क़दम थोड़ा अगर, बहके तो अच्छा…

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Added by गिरिराज भंडारी on May 15, 2014 at 5:30pm — 40 Comments

तेरे धोखे को दुनिया भर की नजरों से छिपाया था//शकील जमशेदपुरी//

बह्र : 1222/1222/1222/1222

________________________________

तेरे धोखे को दुनिया भर की नजरों से छिपाया था

समझ लेना ये तेरे दिल में रहने का किराया था



सुनो वो गांव अपना इसलिए मैं छोड़ आया हूं…

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Added by शकील समर on May 15, 2014 at 4:14pm — 13 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२ २२ २२ २२

क्या तुमने ये सोचा पगली
गर मैं तेरा होता पगली

तेरी यादें फूलों जैसी
कांटे होते रोता पगली

इन आँखों के वादे पढ़कर
बन बैठा मैं झूठा पगली

मैं तो तेरा साया हूँ ,अब
तू है मेरी काया पगली

तेरी बातें तू ही जाने
मैं तो हूँ बस तेरा पगली

राहों पर यूँ नज़र बिछाना
गुमनाम करे दीवाना पगली


मौलिक व अप्रकाशित

Added by gumnaam pithoragarhi on May 15, 2014 at 4:00pm — 13 Comments

प्यार भी करते हो …

प्यार भी करते हो …



प्यार भी करते हो तो शर्तों पे करते हो

लगता है तुम शायद मुहब्बत के अंजाम से डरते हो

क्यों मुड़ मुड़ के अपने निशां तका करते हो

क्यों ज़माने के खौफ को दिल में रखा करते हो

कभी इकरार से तो कभी इंकार से डरते हो

न, न

ऐसे तो प्यार न हो पायेगा

पानी के बुलबुले सा ये प्यार

वक्त की लहरों में खो जाएगा

अहसास कभी शर्तों में समेटे नहीँ जाते

शर्त और सौदे तो बाज़ारों में हुआ करते हैं

समर्पण बाज़ारों में कहां हुआ करते हैँ

इससे…

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Added by Sushil Sarna on May 15, 2014 at 4:00pm — 8 Comments

अश्‍क

गजल अश्‍क

212   212     212    212

गीत उसके लिखे गुनगुनाता रहा

हाल दिल का सभी को बताता रहा

ये उदासी भरी जिन्‍दगी क्‍योंं मिली

सोच कर अश्‍क मैं तो  बहाता रहा

हम को उसके शहर में मिली मौत थी

लाश अपने शहर में जलाता रहा

चाँद में दाग है चाँदनी में नही

बात दिल को यही मैं बताता रहा

प्‍यार से चल सके ना कदम दो कदम

जाम पी पी तुझे तब भुलाता रहा 

मौलिक एवं अप्रकाशित…

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Added by Akhand Gahmari on May 15, 2014 at 10:30am — 26 Comments

खारे पानी के जीव

जब सूरज डूब जायेगा
सब कुछ समा जाएगा
महासागर की अतल गहराइयों में.
पर्वत का तुंग शिखर भी
नहीं बचेगा तृण मात्र
हड्डियों तक का नहीं रहेगा अस्तित्व.
जीवित रहेंगे फिर भी
खारे पानी के जीव ..
...............
नीरज कुमार नीर
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Neer on May 15, 2014 at 9:09am — 24 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
स्वागतम सोलह मई........अरुण कुमार निगम

सोलह की महिमा में सोलह पंक्तियाँ ...............

सोलह -सोलह लिये गोटियाँ,खेल चुके शतरंजी चाल

सोलह - मई बताने वाली ,किसने कैसा किया कमाल



सोलह कला सुसज्जित कान्हा ने छेड़ी बंसी की तान

सबका जीवन सफल बनाने,सिखलाया गीता का ज्ञान



मानव जीवन में पावनता , मर्यादा के हैं आधार

ऋषियों मुनियों के बतलाये, जीवन में सोलह संस्कार



सोलह - सोमवार व्रत करके , पाओ मनचाहा भरतार

सोलह आने जब मिल जाते, तब लेता रुपिया आकार



उम्र…

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Added by अरुण कुमार निगम on May 15, 2014 at 12:00am — 14 Comments

इंसान का कद

इंसान का कद

इंसान का कद इतना ऊँचा होगया

कि इंसानियत उसमें अब दिखती नहीं

दिल इतना छोटा होगया कि

भावनाएं उसमें टिक पाती नहीं

जिन्दगी कागज़ के फूलों सी

सजी संवरी दिखती तो है

पर प्रेम प्यार और संवेदनाओ

की कहीं खुशबू नहीं

चकाचौंध भरी दुनिया की इस भीड़ में

 इतना आगे निकल गया कि

अपनों के आँसू उसे अब दिखते नहीं

आसमां को छूने की जिद्द में

पैर ज़मी पर टिकते नहीं

सिवा अपने सब छोटे-छोटे

कीड़े मकोड़े से…

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Added by Maheshwari Kaneri on May 14, 2014 at 5:40pm — 10 Comments

छीन सकता है भला/गजल/ कल्पना रामानी

212221222122212

 

छीन सकता है भला कोई किसी का क्या नसीब?

आज तक वैसा हुआ जैसा कि जिसका था नसीब।

 

माँ तो होती है सभी की, जो जगत के जीव हैं,

मातृ सुख किसको मिलेगा, ये मगर लिखता नसीब।

 

कर दे राजा को भिखारी और राजा रंक को,

अर्श से भी फर्श पर, लाकर बिठा देता नसीब।

 

बिन बहाए स्वेद पा लेता है कोई चंद्रमा,

तो कभी मेहनत को भी होता नहीं दाना नसीब।

 

दोष हो जाते बरी, निर्दोष बन जाते…

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Added by कल्पना रामानी on May 14, 2014 at 2:23pm — 17 Comments

देखा जब भी जाम मेरे हाथों रूठे

2222    2112  2 222

देखा जब भी जाम मेरे हाथों रूठे

कोई तो समझाए उन्हें दिल भी टूटे

हमसे कहते यार कभी भी मत पीना

खुद पीते मयख्वार  बड़े ही हैं झूठे

यारों अपने पास नशे की वो दौलत

चोरी करता चोर नहीं डाकू लूटे

माया ममता त्याग कठिन होता कितना

मय जब उतरे यार गले सब कुछ छूटे

हमको ये मालूम हुआ मैखाने आ

कहकर मय को शेख बुरा मस्ती लूटे

मैखाने से देख निकलना मयकश का

डगमग डगमग…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 14, 2014 at 12:30pm — 13 Comments

कुंडलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

आँचल में ममता लिए, भरा ह्रदय में प्यार

क्या कोई भी दे सका,माँ सा प्यार दुलार

माँ सा प्यार दुलार, जिसे पाने को तरसे,

सर पर माँ जब हाथ,रखे तो प्रभु भी हरषे

कह लक्ष्मण मत टोक, लगाती टीका काजल

जीवन हो आबाद, मिले जब माँ का आँचल |

(2)

दोहा देखो छंद में,  सबका है  सरताज,

सभी शब्द हो शिल्प मय, तभी सजेगी साज

तभी सजेगी साज, छंद को गाकर देखे

मन में भरते भाव, सूर तुलसी के लेखे

लक्ष्मण ले आनंद, कबीर रचे वह…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 14, 2014 at 10:00am — 14 Comments

उजाले की ओर एक कदम और (लघुकथा)

रात गहराती जा रही थी उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी कमरे में अंघेरा इतना कि हाथ को हाथ सुझाई नही दे रहे थे |उसकी जिंदगी में अन्धेरा तो उसी दिन हो गया था जिस दिन उसने भूषन का हाथ थमा था पर फिर भी वो रौशनी की तलाश में अंधेरों से लड़ती रही | कभी उसका माथा फूट जाता, कभी आँखों के नीचे काला हो जाता तो कभी ठोकर खा कर गिरने से घुटना छिल जाता, अंधेरे में चलने से घाव तो लगने ही थे पर वो आगे बढ़ती रही |

अब वर्षों बाद इतनी दूर आ कर उसे थोड़ी सी रौशनी नसीब हुई तो अचानक ही उसे  फिर से ठोकर लगी और वो…

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Added by Meena Pathak on May 13, 2014 at 4:00pm — 12 Comments

माँ [दोहावली]

माँ है तेरी प्रार्थना ,माँ ही बनी अजान

माँ ही तेरा है खुदा माँ तेरा भगवान |



गीता कुरान में मिले रामायण में वास

माँ की ममता से सदा बढ़ता है विश्वास |



माँ की पूजा तुम करो माँ है खुदा समान

मंदिर मस्जिद ढूंडता घर बैठा भगवान |



मंदिर मस्जिद माँ बनी माँ बनी गुरूद्वार

चढ़ता जो इस नाव पे उतरेगा वो पार |



माँ समझे तेरी ख़ुशी माँ ही समझे पीर

माँ के नैनों से बहे केवल ममता नीर |



बच्चे होते हैं सबल जो माँ का हो साथ…

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Added by Sarita Bhatia on May 13, 2014 at 11:00am — 26 Comments

गजल

२ २ १ १ / २ २ १ १ / २ २ १ २ / १ २  
भावों से पले शब्द तो वो छंद हो गए 
कान्हा जो रहे पाल बाबा नंद हो गए 
.
छूकर के गया कृष्ण तो ये मन भी कह उठा 
फूलों से मिले शूल तो मकरंद हो गए
.
आखों को लगे छू रहा है आज तन बदन  
दर्द ऐ दिल की आज तो वो रंद हो गए 
.
नफरत से भरे ज्ञान की दीवार को गिरा  
हर भोर ख़ुशी गा रही आनंद हो गए 
.
राधा से मिले कृष्ण अधर पे है…
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Added by Ashish Srivastava on May 12, 2014 at 10:00pm — 16 Comments

दिल के वो बरक़रार हिस्सों में

जिसने तोड़ा हज़ार हिस्सों में

दिल के वो बरक़रार हिस्सों में

 

रोए, मुस्काए, चीखे, झुंझलाए

दिल का निकला ग़ुबार हिस्सों में

 

सबसे बदतर रहा  यह बटवारा

एक परवरदिगार हिस्सों में

 

रूह, कल्बो जिगर व साँसों के

वो अकेला शुमार हिस्सों में

 

हमको तसलीम है करो तकसीम

हाँ मगर शानदार हिस्सों में

 

आप शामिल रहे कहीं ना कहीं

ज़ीस्त के यादगार हिस्सों में

 

मौत साँसों की किश्ते आखिर…

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Added by Asif Amaan on May 12, 2014 at 5:30pm — 33 Comments

धड़कन [दोहावली]



दिल पर काबू ना रहे मिल जाते जो नैन

धड़कन धड़कन से मिले दिल को मिलता चैन |



दिल की यह मजबूरियाँ समझे कोई ख़ास

धड़कन बढ़ जाती अगर आता है वो पास |



तेरी धड़कन के बिना मेरी भी बेकार

दोनों की मिलती अगर नैया लगती पार |



तेरी धड़कन के सिवा कुछ भी ना अनमोल

सूना है सारा जगत इसका क्या है मोल |



धड़कन से चालू हुआ धड़कन पर सब बंद

मोल समय का जान लो यह इसकी पाबंद |



धड़कन चलती है अगर जीने की हो आस

अपनों का जो साथ…

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Added by Sarita Bhatia on May 12, 2014 at 4:00pm — 29 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तुम मेरी सम्पूर्णता की बानगी हो (ग़ज़ल 'राज')

2122  2122   2122 

तुम ग़ज़ल मेरी मुहब्बत में पगी हो

फूल, कलियाँ,वल्लरी सी ताज़गी हो

 

तुमको पाकर ये मकाँ घर हो गया है

तुम मेरी सम्पूर्णता की बानगी हो

 

इन तेरी साँसों से महके प्रेम उपवन

रूप यौवन में बसी इक सादगी हो

 

पास आकर भी नहीं तुम पास मेरे

दूरियों से क्यूँ न फिर नाराज़गी हो

 

बिन तेरे ये दिल धड़कना छोड़ देता   

आज कहता हूँ मेरी तुम जिंदगी हो

 

प्यार पाकर दिल नहीं भरता ये…

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Added by rajesh kumari on May 12, 2014 at 10:00am — 41 Comments

सिसकियाँ आस-पास की

आज सामाजिकता और नैतिकता का किस कदर पतन हो गया है कि देख कर दुःख होता है | आज कल आप कान लगा कर सुनिए कुछ कराहें सुनाई देंगी जो बेटों की माओं की हैं | मुंह में कपड़ा ठूंस कर कराह रहीं हैं, छुप कर आँसू बहा रहीं हैं क्यों की उन्हें डर है कि किसी ने उन्हें रोते या कराहते देख लिया तो उसका गलत अर्थ निकालेंगे और वो उपहास के पात्र बन जायेंगे | आज बेटे बाले डरे सहमे से हैं और ये वो मध्यमवर्गीय माता पिता हैं जिन्होंने अपने बेटों को बड़े संघर्ष से पढाया लिखाया है | एक नही कई ऐसे परिवार मै देख रही हूँ जहाँ…

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Added by Meena Pathak on May 11, 2014 at 2:00pm — 18 Comments

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