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गज़ल - वतन को लहू की नज़र कर दिया है - इमरान

122 122 122 122



सियासी जमातो! ग़दर कर दिया है,

वतन को लहू की नज़र कर दिया है।



निशाँ भी नहीं है कहीं रोशनी का,

के हर सू अँधेरा अमर कर दिया है।



डरी और सहमी है औलादे आदम,

ज़हन पर कुछ ऐसा असर कर दिया है।



नई नस्ले नफरत को पाने की धुन में,

रगों में रवाना ज़हर कर दिया है।



यहाँ कल तलक थी हज़ारों की बस्ती,

बताओ के उसको किधर कर दिया है।



ये वादा था सिस्टम बदल देंगे सारा,

मगर और देखो लचर कर दिया है।



गबन…

Continue

Added by इमरान खान on April 15, 2014 at 1:30pm — 11 Comments

आस के दीप गजल

212 212 212 212
गीत गा कर उसे हम सुनाते रहे
हाल दिल का उसे हम बताते रहे

रात भी तो गुजरने लगी थी मगर
पास आये न बाते बनाते रहे

प्‍यार उन से करे हम कहाँ बैठ जब
चाँद से भ्‍ाी उसे हम छुपाते रहे

प्‍यार हमने किया प्‍यार उसने किया
वो मिटाते रहे हम निभाते रहे

माँग उसकी सजाई लहू से मगर
साथ चल ना सके हम बुलाते रहे

फिर मिलेगे कभी ना कभी हम यहाँ
आस के दीप मन में जलाते रहे

मौलिक व अप्रकाशित अखंड गहमरी

Added by Akhand Gahmari on April 15, 2014 at 12:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल : ढंग अलग हो करने का

बह्र : २२ २२ २२ २

जीने का या मरने का
ढंग अलग हो करने का

सबका मूल्य बढ़ा लेकिन
भाव गिर गया धरने का

आज बड़े खुश मंत्री जी
मौका मिला मुकरने का

सिर्फ़ वोट देने भर से
कुछ भी नहीं सुधरने का

कूदो, मर जाओ `सज्जन'
नाम तो बिगड़े झरने का
-
(मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 15, 2014 at 10:30am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
रूप की चाहत जिन्हें हर दम रही (ग़ज़ल 'राज')

2122   2122     212

वक़्त की रफ़्तार तो पैहम  रही

जिंदगी की लौ मगर मद्धम रही

 

बर्फ बनकर अब्र जो है गिर रहा 

पीर की बहती नदी भी जम रही

 

ग़म भरे अशआर जिसमे थे लिखे

धूप में भी वो ग़ज़ल कुछ नम रही

 

टूट के बिखरे सभी वो आईने

रूप की चाहत जिन्हें हर दम रही 

 

वक़्त रहते कुछ नहीं हासिल किया

सोचते हैं जिंदगी कुछ कम रही

 

कैसे कह दें वो जहाँ में खुश रहे

आँखे उनकी तो सदा…

Continue

Added by rajesh kumari on April 15, 2014 at 9:30am — 31 Comments

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!

अपना फ़र्ज़ निभाने दे!
फिर से वही बहाने दे !!

तेरा भी हो जाऊँगा !
खुद का तो हो जाने दे !!

गैरों के घर खूब रहा!
अपने घर भी आनें दे !!

मूर्ख दोस्त से अच्छा है !
दुश्मन मगर सयाने दे!!

कागज़ की फिर नाव बनें !
बचपन वही पुराने दे !!

**************************

राम शिरोमणि पाठक"दीपक"

मौलिक/अप्रकाशित

Added by ram shiromani pathak on April 14, 2014 at 11:30pm — No Comments

गजल : फिर हाल-ए-दिल हमारा सहेली से पूछना//शकील जमशेदपुरी

बह्र : 221/2121/1221/212

—————————————————————————

किरदार मेरा अपनी सहेली से पूछना

औ लम्स* मेरा अपनी हथेली से पूछना     *[स्पर्श]

मैं इक खुली किताब हूं तू खुल के बात कर

मुझसे न कोई बात पहेली से पूछना

पहले तो मुझसे कहना किसी और की हूं मैं

फिर हाल-ए-दिल हमारा सहेली से पूछना

बेदर्द वक्त कितना है हो जाएगा पता

खंडर हुई है कैसे हवेली से पूछना

खुशबू ​तुम्हारे जिस्म की है जानता 'शकील'

अच्छा नहीं सहन* की…

Continue

Added by शकील समर on April 14, 2014 at 11:30pm — 11 Comments

ग़ज़ल: शह्र के अख़बार को मत हमजुबाँ रखिये

दिल में उम्मीदों का चलता कारवाँ रखिये

हर अँधेरे के लिए कोई शमाँ रखिये

 

बज़्म में आ ही गए कुछ तो निशाँ रखिये

कुछ अलग अपना भी अंदाज़े बयाँ रखिये

 

रोज़ का मेहमाँ कोई मेहमाँ नहीं होता

शह्र के बाहर सही अपना मकाँ रखिये

 

देवता, बुत और पत्थर बन के रहते हो

कुछ तो इंसानों के जैसी ख़ामियाँ रखिये

 

ख्वाब जब होंगे नहीं तासीर क्या होगी  

ख्वाब को अब तो सवार-ए-कहकशाँ रखिये

 

तीरगी को है मिटाती एक…

Continue

Added by भुवन निस्तेज on April 14, 2014 at 10:30pm — 14 Comments

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की/गजल/कल्पना रामानी

 1212212122

किसे सुनाएँ व्यथा वतन की।

है कौन बातें करे अमन की।

 

हुई हुकूमत हितों पे हावी,

हताश है, हर गुहार जन की।

 

फिसल रहे पग हरेक मग पर,

कुछ ऐसी काई जमी पतन की।

 

फरेब क़ाबिज़ हैं कुर्सियों पर,

कदम तले बातें सत वचन की।

 

निगल के खुशबू को नागफनियाँ,

कुचल रहीं आरज़ू चमन की।

 

ये किसके बुत क्यों बनाके रावण,

निभा रहे हैं प्रथा दहन की।

 

ज़मीं के मुद्दों पे चुप हैं…

Continue

Added by कल्पना रामानी on April 14, 2014 at 9:45pm — 10 Comments

इम्तेहान ( गजल )

221 2121 1221 212

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जिंदगी मैं अभी भी कुछ इम्तेहान बाकी हैं

गुजरी हैं आंधियां अभी तूफ़ान बाकी हैं

मैं दूर तेरी महफ़िल से जाऊं भी तो कैसे

महफ़िल मैं तेरी मेरे भी कदरदान बाकी हैं

बे-ईमानों की दुनिया मैं घूमता हूँ शान से

जब तक मेरे सीने मैं मेरा ईमान बाकी है

लौटकर के मौत भी घर से मेरे खाली गई

मेरी माँ का कोई ऐसा वरदान बाकी है

सो रहा है मुल्क मेरा जो सुकूं…

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Added by Sachin Dev on April 14, 2014 at 4:00pm — 29 Comments

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बचपन की वो सुन्दर यादें

गांव की मिट्टी,पेड़ों के झूले

कैसे भूलाए जा पाऐगे

रोना,हसना,और मचलना

गिरना,गिरकर फिर से संभलना

कैसे भूलाए जा पाऐगे

पगडन्डी पर दौड़ लगना

खुली हवा से बातें करना

कैसे भूलाए जा पाऐगे

तितली,बन्दर और गिलहरी

मोदक,मक्खन और जलेबी

कैसे भूलाए जा पाऐगेम

माँ की रोटी,दादी की कहानी

छुटपन की सहेली मीना,रानी

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

बाबू जी का डान्ट लगाना

और प्यार से गोद उठाना

कैसे भूलाऐ जा पाऐगे

सावन के… Continue

Added by Pragya Srivastava on April 14, 2014 at 1:27pm — 12 Comments

कटी-पतंग

कटी-पतंग

-----------------------

सतरंगी वो चूनर पहने

दूर बड़ी है

इतराती बलखाती इत-उत

घूम रही है उड़ती -फिरती

हवा का रुख देखे हो जाती

कितनों का मन हर के फिरती

'डोर' हमारे हाथ अभी है

मेरा इशारा ही काफी है

नाच रही है नचा रही है

सब को देखो छका रही है

प्रेम…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 14, 2014 at 10:00am — 12 Comments

ग़ज़ल: जब तुम बिना रहा

पत्थर बना रहा सदा पत्थर बना रहा
ग़ज़लों में रोये ज़ार हम वो अनसुना रहा

दुनिया है हुक्मरान की क़ानून हैं बड़े
लाखों किये जतन मगर ये बचपना रहा

रातो में नीद भी नही दिन में नही सुकूं
सब कुछ रहा अजीब सा जब तुम बिना रहा

मंजिल से दूर रोकने क्या क्या नही हुआ
रस्ते भुलाने के लिए कुहरा घना रहा

सोचा बुला दूँ जो तुझे जाएगी मेरी जान
जीता रहा जरूर मै पर तडपना रहा

अनुराग सिंह “ऋषी”

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Anurag Singh "rishi" on April 13, 2014 at 1:00pm — 19 Comments

ग़ज़ल : तुम्हारे लिए जश्न हाेगा ये मेला

सभी रास्ताें पर सिपाही खटे हैं 

ताे फिर लाेग क्याें रास्ते से हटे हैं । 

सियासत अाै मज़हब की दीवारें देखाे 

दीवाराें से ही लाेग गुमसुम सटे हैं । 

सरहद है सराें के लिए अाखरी हद 

अकारण यहाँ पर कई सर कटे हैं…

Continue

Added by Krishnasingh Pela on April 13, 2014 at 12:00pm — 27 Comments

हिज्र में भी उसकी याद ……

हिज्र में भी उसकी याद ……

आज वो रहगुज़र ..हमें बेगानी सी लगती है

उनके वादों पे यकीं इक नादानी सी लगती है

इक वाद-ऐ-फ़र्दा के साथ उनका यूँ ज़ुदा होना

फिर इंतज़ार उनका इक कहानी सी लगती है

जिनकी आमद से ख़ल्वत जलवत हो जाती थी

दीद-ओ-दिल में वही मूरत .पुरानी सी लगती है

दम भरती थी जो सदा जन्नत तक साथ देने का

तसव्वुर में उसकी तस्वीर .अंजानी सी लगती है

आज मेरे ख्वाब में वो इक शरर बनके चमकी है

हिज्र में भी…

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Added by Sushil Sarna on April 12, 2014 at 4:34pm — 10 Comments

ख़ाक में मिल जाएगा..

कोई कितना चाह ले , शक्ति से क्या वो जीतेगा
शक्ति का एक मौन भी ,उसपर कहर सा बीतेगा
तोड़ क्या पाएगा कोई शक्ति का फिर हौसला
पूज के शक्ति स्वरूपा क्या वो अब बच पाएगा ?
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी खुद ही उसने मार ली
घाव अब नासूर होगा कब तलाक सह पाएगा
कब्र में हों पैर जिसके ,आग से है खेलता
कोई क्या काँधे चढ़ेगा ,स्वयं चित में जल जाएगा
दम्भी अभिमानी का दम्भ ,ख़ाक में मिल जाएगा

  मौलिक / अप्रकाशित

Added by Lata R.Ojha on April 12, 2014 at 10:30am — 4 Comments

मेरी माँ

मेरी माँ है सबसे सुन्दर
फूल सरीखी माँ
श्रृद्धा ,त्याग ,तपस्या की
मूरत मेरी माँ
चन्दन और कुमकुम सी
लगती मेरी माँ
बाधाओं से कभी न हारे
ऐसी मेरी माँ
पूजा की घन्टी सी हरदम
बजती मेरी माँ
गीता,वेद,पुराणों में भी
मिलती मेरी माँ
मौलिक व अप्रकाशित

Added by Pragya Srivastava on April 11, 2014 at 11:51pm — 10 Comments

उत्तर दो ! (कविता)

सुन कर द्रोपदी की चित्कार

कलेजा धरती का फटा क्यों नहीं

देख उसके आँसुओं की धार  

अंगारे आसमां ने उगले क्यों नहीं

चुप क्यों थे विदुर व भीष्म

नेत्रहीन तो घृतराष्ट्र थे

द्रोण ने नेत्र क्यों बंद कर लिए

नजरें क्यों चुरा लिए पाँचों पांडवों ने  

कहाँ था अर्जुन का गांडीव

बल कहाँ था महाबली भीम का

क्या कोई वस्तु थी द्रोपदी

जिसे दाँव पर लगा दिया  

ये कौन सा धर्म था धर्मराज ?



कहाँ थे कृष्ण,

वो तो थी सखी तुम्हारी …

Continue

Added by Meena Pathak on April 11, 2014 at 2:00pm — 23 Comments

राजरानी के नवासे आप हैं - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

2122        2122     2122      212



जानता  हूँ  देह   के  बेलौस  प्यासे  आप  हैं

किन्तु जनता की नजर में संत खासे आप हैं

*

खुशमिजाजी आप की सन्देश देती और कुछ

लोग कहते  यूँ बहुत पीडि़त  जरा से  आप है

*…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 11, 2014 at 11:00am — 14 Comments

बेटियाँ ,बेटी,बिटिया [कुण्डलिया]

1.
बिटिया ना अपनी हुई कैसा रहा विधान 
राजा हो या रंक की बिटिया सभी समान 
बिटिया सभी समान रहेंगी सदा बेगानी
छोड़ो झूठे मोह ,पड़ेगी रीत निभानी 
उसका कहाँ कुसूर मिली गरीब की कुटिया 
सरिता कहती मान पराई होती बिटिया 
संशोधित 
........................................
2.
बेटी ना अपनी हुई, कैसा रहा विधान 
राजा हो या रंक की, बेटी सभी समान 
बेटी सभी समान, कहाँ चलती…
Continue

Added by Sarita Bhatia on April 11, 2014 at 10:25am — 13 Comments

ऐसी ही होती है - माँ (तीन पंक्तियाँ)

मेरी मृत्यु नहीं हुई थी,

इसलिए बिछड़ी नहीं

हमेशा के लिए |

उसने मुझे रहने को

दे दिया बड़ा सा वृद्धाश्रम

कई लोगों के साथ में

कई सालों के लिए

घर से बस थोड़ी सी दूर|

जो रहा था

बस नौ महीने

अकेला

मेरी छोटी सी कोख में |

** मौलिक और अप्रकाशित

 

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on April 10, 2014 at 7:00pm — 16 Comments

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