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सच

सच एक सवाल हो गया

झूठ का धमाल हो गया

कमाल हो गया, कमाल हो गया

नोट है तो वोट है

हर चीज में खोट है

चोट पर चोट है, चोट पर चोट है

धूप है छाँव है

अनकहे,अनछुए घाव ही घाव हैं

नोचता ,कचौटता मन को मसौसता

राह का पता नही ढ़ूढ़ता फिर रहा

कोई तो बता दे

ये सच कहाँ रहता है

 

 

 

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Pragya Srivastava on June 13, 2013 at 12:33pm — 7 Comments

सोचा न था..

यूँ तो तक़दीर ने देखे हैं मोड़ कई ...

जिंदगी यूँ ही मुड़ेगी कभी सोचा न था..

कई ज़माने से  प्यासा हूँ में यहाँ ..

ओस से प्यास बुझेगी कभी सोचा न था..

यूँ तो फिरते हैं कई लोग यहाँ ..

गुदड़ी में लाल मिलेगा कभी सोचा न था ..

किस्मत ने दी है हर जगह दगा ..

मुकद्दर यूँ ही चमकेगा कभी सोचा न था ..

खून करे हैं सभी के अरमानों के हमने..

खून मेरा भी होगा कभी सोचा न था..…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 13, 2013 at 10:35am — 6 Comments

रक्त पूर्ति भी ज़रूरी है

क्षुद्र बुद्धि और है पराक्रम भी क्षुद्र आज ज्ञान से मनुष्य ने बना ली बड़ी दूरी है
मायावी प्रपंच से प्रभावित हैं जन सभी कलि पाश दृढ हुआ यही मजबूरी है
शाश्वत परम्पराएं त्यागने लगे तभी तो धनवान हुए किन्तु साधना अधूरी है
खप्पर भवानी कालिका का रिक्त हो रहा है शत्रु शीश काट रक्त पूर्ति भी ज़रूरी है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ
सर्वथा मौलिक अप्रकाशित

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on June 13, 2013 at 9:30am — 10 Comments

राम सिया की भक्ति/ चौपाई एवं दोहों में (जवाहर)

रामसिया का रूप

राम सिया की जोड़ी कैसी, काम रती की जोड़ी जैसी.

राम सिया को जो नर ध्यावे, सब सुख आनंद वो पा जावे.

राम सिया जग के सुख दाता, जो मांगे वर वो पा जाता.

शुबह शाम नर नाम सुमीर तू, अपना काम समय पर कर तू.

कष्ट न दूजे को दे देना, सम्भव हो तो दुःख हर लेना.

परमारथ सा धरम न दूजा, नहीं जरूरत कोई पूजा.

वेद्ब्यास मुनि सब समझावे, गाथा बहु विधि कहहि सुनावे.

अन्तकाल में कष्ट जो पावे, सकल अतीत समझ में आवे.

कहत जवाहर हे रघुराई, मूरख मन से करौं बराई.

मरा मरा…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 13, 2013 at 7:30am — 12 Comments

रवि महिमा चौपाई एवं दोहों में / जवाहर

रवि महिमा

रवि की महिमा सब जग जानी, बिनू रवि संकट अधिक बखानी.

शुबह सवेरे प्रगट गगन में, फूर्ति जगावत जन मन तन में!

दूर अँधेरा भागा फिरता, सूरज नहीं किसी से डरता.

आभा इनका सब पर भारी, रोग जनित कीटन को मारी

ग्रीष्म कठिन अति जन अकुलानी, शरद ऋतू में दुर्लभ जानी

ग्रीष्महि जन सब घर छुप जावें, शरद ऋतू में बाहर आवें.

गर्मी अधिक पसीना आवे, मेघ दरस न गगन में पावे.

पावस मासहि छिप छिप जावें. बादल बीच नजर नहीं आवे.

हल्की बारिश में दिख जावें, इन्द्रधनुष अति सुन्दर…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on June 13, 2013 at 7:26am — 8 Comments

दिल से सुन ओ भाई .... ---------------------------

दिल से सुन ओ भाई ....

---------------------------

किसी की किस्मत पर जलने वालों के

दिलों को ठंडक कहाँ मिलती है,

किस्मत के धनी को इनकी परवाह भी कहाँ होती है.

देख उस खुदा की तरफ जिसने जहाँ बनाया...

तुझे और मुझे खाली हाथ यहाँ भिजवाया.

सद-कर्म से तू मर्म और धर्म का ईमान रख

अपने पे भरोसा कर, नेकी की राह चल.

बुलंदी के रास्ते तो खुद-ब खुद खुल जायेंगे

जलता रहा गर यूँ ही अगर

मातम के दरवाज़े पीढ़ी दर पीढ़ी खुल जायेंगे.

- दिनेश

शुभ…

Added by dinesh solanki on June 13, 2013 at 6:10am — 8 Comments

सोने का लोटा ,नंगे बदन पर लंगोटा !

 सुना भगवानों के पास धन बहुत,

और अपने देश में निर्धन-बहुत !



मंदिरों में जमा है अकूत सोना ,

वहीँ द्वार पर भूखी भीड़,दो,ना !

 …

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 12, 2013 at 9:30pm — 8 Comments

डायरी

आज बहुत पुरानी डायरी पर ...

उंगलियाँ चलाईं ...

जाने कहाँ से एक आवाज ..

चली आयी ..

आवाज, जानी पहचानी ...

कुछ बरसों पुरानी ..

एक हंसी,

जो दूर से हंसी जा रही थी..…

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Added by Amod Kumar Srivastava on June 12, 2013 at 4:00pm — 6 Comments

दुनिया मुझे न समझे, तो अच्छा है !

दुनिया मुझे न समझे, तो अच्छा है !

जीवन का मुझको, अभी ज्ञान कहा ,
कैसे जीना है,मुझको , इसका  भान कहा ,
सारे भव सागर का विष पी  लू, तो अच्छा है ॥ 
पर शिवतत्व का, मुझको अभी मान कहा ,
शव से बन जाऊ शिव, ऐसी  जीवन मे  तान कहा ,
तुम मुझको न मिल पाओ , तो अच्छा है ॥ !
 अभी भी मन कच्चा है, मेरा साचे प्रेम का पान कहा ,
छुने को मन करता है, देह नश्वर  है ये सम्मान कहा ,.....
    
मोलिक…
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Added by aman kumar on June 12, 2013 at 3:45pm — 14 Comments

क्या मैं..आकाश नहीँ छू सकती?

जब तक कि रुक नहीँ जाता

बेटियोँ के संग

भेदभाव का सिलसिला

मैँ पूंछती हूं..मैँ पूंछूंगी और पूंछती ही रहूंगी,

मैँ एक बेटी हूं

क्या बेटी होना कोई गुनाह है?

क्या मैँ माँ-बाप की

आशाओँ को

पूरा नही कर सकती?

क्या मैँ उनकी कसौटी पर

खरा नहीँ उतर सकती?

क्या मैँ वह नहीँ कर सकती..

जो एक बेटा करता है

माँ-बाप,भाई,बहन

और समाज के लिए?

क्या मैँ अपनी मेहनत से

इस बंजर जमीन को

हरा भरा नहीँ कर सकती?

क्या मैँ

किसी के जीवन… Continue

Added by Abid ali mansoori on June 12, 2013 at 2:01pm — 20 Comments

!! ये यादे !!

!! ये यादे !!  

कभी होठो पे हँसी लाती है ये यादे ।

कभी आंखो मे नमी लाती है ये यादे ।।

कभी माशूक कभी मासूम सी होती है ये यादे ।…

Continue

Added by बसंत नेमा on June 12, 2013 at 1:00pm — 9 Comments

जाने कब मिलेंगे हम अब्बू आपसे...

जाने कब मिलेंगे हम अब्बू आपसे...

-----------------------------------------अनवर सुहैल (मौलिक अप्रकाशित और अप्रसारित कविता)



कब मिलेगी फुर्सत

कब मिलेगा मौका

कब बढ़ेंगे कदम

कब मिलेंगे हम अब्बू आपसे...



बेशक, आप खुद्दार हैं

बेशक, आप खुद-मुख्तार हैं

बेशक, आप नहीं देना चाहते तकलीफ

        अपने वजूद से,

                      किसी को भी

बेशक , आप नहीं बनना चाहते

                   बोझ किसी पर..

तो क्या इसी बिना पर

हम आपको छोड़…

Continue

Added by anwar suhail on June 11, 2013 at 8:26pm — 8 Comments

दास्ताँ इक तुम्हे सुनानी है

दास्ताँ इक तुम्हे सुनानी है

आज पीने को मय पुरानी है 

मेरी आँखों में सूनापन सा है

सूनेपन की कोई कहानी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on June 11, 2013 at 4:30pm — 14 Comments

गिरा दे बूँदें : हाइकू ~

गिरा दे बूँदें 

प्रतीक्षारत हम 

नयन मूंदे 

*

और न कस 

हर कोई बेबस 

अब बरस 

*

चली जो हवा 

उड़ गए बादल 

हम नि:शब्द 

*

मन बहका 

आवारा बादल सा 

उड़ गया लो 

*

बरसे धार 

बढे -उमड़े प्यार 

हर्ष अपार 

*

सब है वृथा 

काश, घन सुनते 

हमारी व्यथा 

*

सलोने घन 

या तो डुबो देते हैं 

या जाते डूब

*

आये बौछार 

बजें मन के…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 11, 2013 at 2:27pm — 7 Comments

मेरी आह के बाद ....

सुनो,

तुम तो जानती ही हो ....

मेरी ग़ज़ल,

मेरी कविताओं ...

के हर अलफ़ाज़ को ...

और ये भी,

कि ये दुनियाँ कितनी रुखी है ...

ये जमाने भर तल्खी,

अक्सर घाव कर देती है,

मुझ पर ...

फिर तितलिया ..

वक्त के साथ साथ,

फीकी पड़ जाती है,

चुभते है नाश्तर बन के रंग...

और एक कसक लिए मैं,

जमाने के दरार वाले इस पहाड़ के पीछे,

करता हूँ तुम्हारा इन्तजार ..

तुम देखना,

एक दिन ये दुनियाँ,

ताजमहल के साथ भरभरा कर,

गिर…

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Added by अमि तेष on June 11, 2013 at 3:11am — 15 Comments

एक गीतिका ज़िदगी की

ज़िंदगी इतने दिन तूफ़ान रही,

कभी बारिश,कभी मुस्कान रही 



मिर्च थी खूब,मसाले भी बहुत

सौदा-सुलुफ की ये दुकान रही 

लोग चेहरे लगाये ,आये ,गए 

कौन रिश्ते थे बस पहचान रही 



आसमां पर निरी सलाखें थीं 

अपनी आँगन में ही उड़ान रही 

खूब ढोया है उम्र को हमने 

इसलिए दोस्त,कुछ थकान…

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Added by प्रो. विश्वम्भर शुक्ल on June 10, 2013 at 10:55pm — 12 Comments

पिता,परमात्मा सा होता है

पिता परमात्मा सा होता है

जो जन्म देकर दुनिया में ले आता है

वो दुनिया दिखाने वाला पिता,परमात्मा से कैसे कम है

हमारी आहट से जो सन्न हो जाता है

जिसके भीतर हर पल हमारे पालन की चिन्ता पलती है

जो हमें जन्म देने के बाद,

अपने सारे सुख भूल जाता है।।

दुनिया में हमारे आने के बाद

वो एक राह पर ही चलता है

और अपने पुरातन ताज्य कार्य भी छोड देता है

उसकी दुनिया हमारी आहट से बदल जाती है

वो पिता परमात्मा सा होता…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on June 10, 2013 at 4:38pm — 11 Comments

"शुक्रिया"

यूँ पाठ जिंदगी का पढ़ाने का शुक्रिया

की बेरुखी से मुझको भुलाने का शुक्रिया



गुज़रे हुए निशान कुछ रेती पे पैर के

यादें यूँ अपनी छोड़ के जाने का शुक्रिया



कोई तो चाहिए ही था इक हमसफ़र तुझे

दिल में किसी को और बसाने का शुक्रिया



रातों से हो गयी है मुहब्बत सी अब हमें

ख्वाबों में ही दीदार कराने का शुक्रिया



दिल मोम का है सोंच के रोता रहा सदा

पत्थर कि तरहा दिल को बनाने का शुक्रिया



मुझको लगा ये काफ़िला मेरे ही साथ है…

Continue

Added by Anurag Singh "rishi" on June 10, 2013 at 1:15pm — 11 Comments

कौन...??

दोस्तों को दुश्मन बनाया है किसने ..

शमशान में लाशों को पहुँचाया है किसने..



किसने किसको, किसको है देखा ..

न देखा है हमने न, देखा है तुमने...



हुयी शाम और ये रात है आयी..

किसने ये तारों की महफ़िल सजाई ...



सोचते-सोचते में सो गया हूँ ..

रात की कालिमा में मैं खो गया हूँ..



किसने इस कालिमा को लालिमा बनाया ..

किसने मुझको फिर से जगाया..



किसने किसको, किसको है देखा ..

न देखा है हमने न, देखा है तुमने... …

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on June 10, 2013 at 12:00pm — 8 Comments

किस काबिल किया - ग़ज़ल

मालिक ने इस दौड़ में यूं ही नहीं शामिल किया,

फ़क्त ये जानना ज़रूरी है कि किस काबिल किया |

 

कहते रहे जो ज़िंदगी भर खुदा ही आख़िरी ज़रुरत है,

उन्होंने अपनी रूह तक को भी ना हासिल किया |

 

बहुत कोशिशें की मगर पढ़ ना सके उस इबारत को,

जिन हर्फों ने राम और रहमान को फ़ाज़िल किया|

 

सोचा वो धुँआ थी, बिखर के मिल गयी हवाओं में

हर अधूरी ख्वाहिश को इस तरहा मुकम्मिल किया|

 

मैं ना ग़ालिब था, ना मीर ना ही और कोई…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on June 10, 2013 at 11:55am — 7 Comments

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