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जाने कब मिलेंगे हम अब्बू आपसे...

जाने कब मिलेंगे हम अब्बू आपसे...
-----------------------------------------अनवर सुहैल (मौलिक अप्रकाशित और अप्रसारित कविता)

कब मिलेगी फुर्सत
कब मिलेगा मौका
कब बढ़ेंगे कदम
कब मिलेंगे हम अब्बू आपसे...

बेशक, आप खुद्दार हैं
बेशक, आप खुद-मुख्तार हैं
बेशक, आप नहीं देना चाहते तकलीफ
        अपने वजूद से,
                      किसी को भी
बेशक , आप नहीं बनना चाहते
                   बोझ किसी पर..
तो क्या इसी बिना पर
हम आपको छोड़ दें तनहा!

ये सच है, आप तनहा हैं
ये सच है, आप कमज़ोर हो गए हैं
ये सच है, आपकी नज़रें अब
खोजने लगी हैं अपनों को
और हम फंसे हैं
अपनी उलझनों में
अपनी परेशानियों में
निकाल नहीं पा रहे फुर्सत
जबकि इस बीच हमने की
कई शादियों में शिरकत
कई आफीसियल टूर...
एल एल टी सी लेकर
मज़े लिए दार्जिलिंग में सपरिवार
सपरिवार?
हाँ सपरिवार
क्योंकि परिवार की परिभाषा में
अब माँ-बाप कहाँ आते हैं...?

Views: 558

Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on June 14, 2013 at 11:56pm
आदरणीय...अनवर साहब, भावपूर्ण अभिव्यक्ति..सुंदर रचना....
Comment by vijayashree on June 14, 2013 at 1:04pm

 परिवार की परिभाषा में
अब माँ-बाप कहाँ आते हैं...?

 

भावपूर्ण अभिव्यक्ति / सादर

Comment by coontee mukerji on June 14, 2013 at 1:06am

बह्त सुंदर भावना प्रधान  रचना / सादर /  कुंती

Comment by विजय मिश्र on June 12, 2013 at 6:31pm

 अनवर भाई , आपके साफगोई और एहसासात के इस बयान को सलाम . वख्त निकालिए . 

Comment by वेदिका on June 12, 2013 at 3:42pm
भावभरी रचना ....सच में ही तो कहाँ माँ-बाप परिवार में आ पाते है ..आज का नौज़वान सिर्फ अपने और अपने ही लिए तो जीने लगा है 
Comment by Sumit Naithani on June 12, 2013 at 12:42pm

बहुत सुन्दर

Comment by Shyam Narain Verma on June 12, 2013 at 12:28pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by aman kumar on June 12, 2013 at 10:01am

क्योंकि परिवार की परिभाषा में 
अब माँ-बाप कहाँ आते हैं...?

विषय का चयन के लिए विशेष बधाई !

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