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Anwar suhail's Blog (70)

ग़ज़ल

हर कोई लालायित कितना, कैसे भी हों कालजयी

इस चक्कर में ठेला-ठाली, धक्का-मुक्की मची रही

नदी वही है, लहर वही है, और खिवईया रहे वही

लेकिन अपनी नाव अकेली बीच भंवर में फंसी रही

बार-बार समझाते उनको हम भी हैं तुम जैसे ही

बार-बार उनके भेजे में बात हमारी नहीं घुसी

छोडो तंज़-मिजाज़ी बातें, आओ बैठो गीत बुनें

खींचा-तानी करते-करते बात वहीं पे रुकी रही

(अप्रकाशित मौलिक) 

Added by anwar suhail on February 22, 2016 at 8:30pm — No Comments

खनिकर्मी का जीवन

कोयला खदान की 

काली अँधेरी सुरंगों में 

निचुड़े तन-मन वाले खनिकर्मी के 

कैप लैम्प की पीली रौशनी के घेरे से 

कभी नहीं झांकेगा कोई सूरज 

नहीं दीखेगा नीला आकाश 

एक अँधेरे कोने से निकलकर 

दूसरे अँधेरे कोने में दुबका रहेगा ता-उम्र वह

पता नहीं किसने, कब बताया ये इलाज 

कि फेफड़ों में जमते जाते कोयला धूल की परत को 

काट सकती है सिर्फ दारु 

और ये दारू ही है जो एक-दिन नागा…

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Added by anwar suhail on January 1, 2016 at 3:30pm — 3 Comments

टुकड़खोर सेवादार

अइसई नहीं मिलता 

सेवादारी का ओहदा 

बड़ी कठिन परीक्षा है 

निभा ले जाना ड्यूटी सेवादारी की

हाकिम-हुक्काम तो 

कोई भी बन सकता है 

सेवादार बनना बहुत कठिन है 

सेवादार को होना चाहिए 

भाव-निरपेक्ष...संवेदनहीन 

अपने ड्यूटी-काल में 

और उसके अलावा भी 

जाने कौन सा राज़ 

कब किस हालत में फूट जाए 

और लेने के देने पड़ जाएँ 

हाकिम बना रहे 

हाकिम बचा रहे 

हुकुम सलामत रहे 

तो रोज़ी-रोटी की है गारंटी 

इतनी…

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Added by anwar suhail on December 15, 2015 at 5:53pm — 2 Comments

बाज़ार और साम्प्रदायिकता के बीच

बाज़ार रहें आबाद

बढ़ता रहे निवेश

इसलिए वे नहीं हो सकते दुश्मन

भले से वे रहे हों

आतताई, साम्राज्यवादी, विशुद्ध विदेशी...

अपने मुल्क की रौनक बढाने के लिए

भले से किया हो शोषण, उत्पीड़न

वे तब भी नहीं थे वैसे दुश्मन

जैसे कि ये सारे हैं

कोढ़ में खाज से

दल रहे छाती पे मूंग

और जाने कब तक सहना है इन्हें

जाते भी नहीं छोड़कर

जबकि आधे से ज्यादा जा चुके

अपने बनाये स्वप्न-देश में

और अब तक बने…

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Added by anwar suhail on November 14, 2015 at 9:00pm — 3 Comments

कोई बावफा कैसे दिखे

कोई हमनफस कैसे दिखे 

कोई हमनवा कैसे रहे 

बतलाए मुझको कोई तो

कोई बावफा कैसे दिखे...

तुम बदलते रूप इतने 

और बदलकर बोलियाँ 

खोजते रहते हो हममें 

वतनपरस्ती के निशाँ..

हम प्यार करने वाले हैं 

हम जख्म खाने वाले हैं 

हम गम उठाने वाले हैं 

हम साथ देने वाले हैं 

अकीदे का हर इम्तेहां 

हम पास करते आये हैं

किसी न किसी बहाने 

तुम टांग देना चाहते हो 

जबकि हमारे काँधे पे 

देखो…

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Added by anwar suhail on June 15, 2015 at 8:07pm — 2 Comments

अम्मी

हम बड़े हो रहे थे

लेकिन आप हमें

बच्चा ही समझती थीं

और जब हम अकड दिखाते

बात-बेबात बहस करते

तो आप खामोश हमें ताकते रहतीं

हम अपने मन की करते

और आपकी खामोश आँखें करतीं

हमारी सलामती की दुवाएं..



आज आप नहीं हैं

और इस संसार में

हम यूँ फिर रहे हैं

जैसे कोई फल हों

सड़क किनारे पेड़ के

जिसपर हर कोई

आजमाता है पत्थर...

हम बड़े ज़रूर हुए हैं अम्मी

लेकिन ममता की ऊष्मा से

वंचित हैं…

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Added by anwar suhail on May 10, 2015 at 7:00pm — 5 Comments

झूठ की खेती

वे झूठ के दाने बोते हैं

वे झूठ की खेती करते हैं 

जब झूठ की फसलें पकती हैं 

वे सच-मुच में खुश होते हैं 

फिर झूठ-मूठ ही मिल-जुलकर 

हर आने-जाने वाले को 

खाने की दावत देते हैं...

वहां झूठ के लंगर लगते हैं 

वहां झूठ के दोना-पत्तल में 

भर-भर के परोसी जाती हैं 

झूठ-मूठ की पूरी-सब्जी 

झूठ-मूठ के माल-पूवे....

इस झूठ के काले धंधे में 

कई सेवक मोटे- तगड़े से 

लट्ठ- हथियारों से लैस हुए 

जब कहते सबसे लो डकार 

और करो…

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Added by anwar suhail on April 17, 2015 at 6:52pm — 6 Comments

हे ईश्वर

किस तरह रच रहे हो तुम ये संसार

हे ईश्वर...

तुम भी तो पुरुष ही हो...

जानते हो तुमसे, हम पुरुषों से

किस कदर खौफ खाती हैं स्त्रियाँ

एक अप्रत्याशित आक्रमण

कभी भी हो सकता है उन पर

इस डर से भयभीत होकर

रखती हैं पर्स में हथौड़ी

कोई सलाह देता तो रख लेतीं मिर्च-पाऊडर

और बाज़ार बनाकर बेचता

कोई स्प्रे, कोई धारदार छोटा चाकू

कोई करेंट पैदा करने वाला यंत्र

या सरकारें ज़ारी करतीं ढेर सारे हेल्पलाइन…

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Added by anwar suhail on March 9, 2015 at 7:30pm — 5 Comments

पहचान का संकट

(अविजित राय की हत्या जैसे कायरतापूर्ण कृत्य ने दहला दिया...दुनिया भर के अल्पसंख्यकों को समर्पित कविता)

चेहरे-मोहरे

चाल-ढाल से जब 

पहचाना न जा सका 

तब पूछने लगा वो नाम 

और मैं बचना चाह रहा बताने से नाम 

फिर यूँ ही टालने के लिए 

लिया ऐसा नाम 

जो मिलता-जुलता हो उससे कुछ-कुछ 

जिसे कहने से

बचा जा सके पहचान लिए जाने से

लेकिन ये क्या 

अब पूछा जा…

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Added by anwar suhail on March 6, 2015 at 10:03pm — 9 Comments

कितना कम चाहिए...

कितना कम चाहिए 

नून, तेल, गुड के अलावा 

फिर भी मिल नही पाता 

मुंह बाये आ खड़ी होती है 

लाचारी सी हारी-बीमारी 

डागदर-दवाई में चुक जाती है 

जतन से जोड़ी रकम 

जबकि हमारी इच्छाएं है कितनी कम...

कितना कम चाहिए

रोटी और कपड़े के अलावा 

फिर भी मिल नही पाता 

आ धमकता वन-करमचारी

थाने का सिपाही 

या अदालत का सम्मन 

और हम बेमन 

फंसते जाते इतना 

कि छूटते इनसे बीत जाती उमर

दीखती न मुक्ति की कोई डगर.....

(मौलिक…

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Added by anwar suhail on February 26, 2015 at 10:08pm — 8 Comments

ये कैसी नियति

तुम चलाओ गैंती-फावड़ा 

काटो पत्थर, बनाओ नाली 

दिन है तो सूरज को घड़ी मानो 

और रात है तो गिनते रहो एक-एक प्रहर

कुत्ते कब भौंके 

सियार कब चीखे

मुर्गे ने कब बांग दी 

यही है तुम्हारी नियति....

तुम चलाओ छेनी-हथौड़ी 

तुम्हारे लिए बन नहीं सकतीं 

ऐसी यांत्रिक घड़ियाँ 

जिनमे काम के घंटों का हिसाब हो 

और आराम के पल का ज़िक्र हो...

तुम लिखो कविता-कहानी 

फट जाए चाहे 

माथे की उभरी नसें 

फूट जाए ललाई…

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Added by anwar suhail on February 15, 2015 at 7:30pm — 7 Comments

मजदूर दिवस : काश ऐसा न होता...

रात अंधड़ में 

छितराए फूस के छप्पर को 

करना है दुरस्त

लेकिन समय कहाँ

अभी तो जाना है काम पर 



फिरसे फूल आये पेट में 

कुलबुला रहा है जीव 

अनमनी सी कराह रही घरवाली

रांध नही पाती भात...



भूखे पेट पैडल मारता भूरा 

टुटही साइकिल खींच रहा 

ससुरी चैन साईकिल की 

काहे उतरती बार-बार

भूरा बेबस-लाचार, 

ठीकेदार का मुंशी भगा देगा उसे 

जो देर से पहुंचा वो...

लड़ भी तो नही सकता 

भगा दिया गया तो 

डूब…

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Added by anwar suhail on May 2, 2014 at 9:37am — 9 Comments

विरोध और गुंडई

इतना दंभ

इतना घमंड

इतनी आतुरता

इतनी व्यग्रता

इतनी उद्दंडता

ठीक नही बन्धु

अभी जियादा दिन नही हुए

गए अंग्रेजों को

भूल गये हाड-मांस के

नंगे-बदन, लंगोटी धारी

उस महामानव को

जिसने ऐसी चलाई थी आंधी

कि उखड गये थे पाँव

उनके जिनके साम्राज्य में

डूबता नही था सूरज.....

मैं जानता हूँ

कि विरोध सहना तुमने सीखा नही

कि विरोध करने और गुंडई करने के बीच

एक बड़ी दीवार है

गुंडई विरोध नही

गुंडई इन्किलाब… Continue

Added by anwar suhail on March 27, 2014 at 8:23pm — 3 Comments

हाशिये में प्रेम

जाने क्या सोचकर 

.......उसने भेजा 

एक गुलाब 

एक मुस्कान 

एक चितवन 

एक सरगोशी 

एक कामना 

एक आमंत्रण 



और मैंने पलटकर 

उसकी तरफ देखा भी नही 

भाग लिया 

उस तरफ 

जहां काम था 

चिंताएं थीं 

अपूर्णताये थीं 

सुविधाएं थीं 

अनुकूलताएँ थीं 

थकन और 

स्वप्न-हीन निद्रा…

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Added by anwar suhail on February 13, 2014 at 8:43pm — 6 Comments

कहाँ जाएँ...

भाग कर कहाँ जाएँ
हर जगह तुम्हे पायें

जब से किया किनारा मैंने
दूरियां हैं घटती जाएँ

तुम क्या जानो कैसे-कैसे
बेढंगे से ख्वाब सताएं

गुपचुप-गुपचुप, धीरे-धीरे
माजी के लम्हात रुलाएं

चारों ओर भिखारी, डाकू
मांगें और लूट ले जाएँ

तुमसा दाता कहाँ से पायें
वापस तेरे दर पर आयें

(मौलिक अप्रकाशित)

Added by anwar suhail on February 7, 2014 at 4:04pm — 5 Comments

मसीहा...

एक आंधी सी उठे है अन्दर 

एक बिजली सी कड़क जाती है 

एक झोंका भिगा गया तन-मन 

इस बियाबां में यूँ ही तनहा मैं

कब से रह ताक रहा हूँ उसकी...

 

वो जो बौछार से टकराते हुए 

एक छतरी का आसरा लेकर 

इक मसीहा सा बन के आता है 

मुझको भींगने से बचाता है...



हाँ...ये सच है बारहा उसने 

मेरे दुःख की घडी में मुझको 

राहतें दीं हैं....चाहतें दीं हैं....

और हर बार आदतन उसको 

सुख के लम्हों में भूल जाता हूँ 



वो मुझे दुवाओं में…

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Added by anwar suhail on January 26, 2014 at 6:30pm — 5 Comments

उत्तर खोजो श्रीमान जी...

एकदम से ये नए प्रश्न हैं

जिज्ञासा हममें है इतनी

बिन पूछे न रह सकते हैं

बिन जाने न सो सकते हैं

इसीलिए टालो न हमको

उत्तर खोजो श्रीमान जी....

ऐसे क्यों घूरा करते हो

हमने प्रश्न ही तो पूछा है

पास तुम्हारे पोथी-पतरा

और ढेर सारे बिदवान

उत्तर खोजो ओ श्रीमान...

माना ऐसे प्रश्न कभी भी

पूछे नही जाते यकीनन

लेकिन ये हैं ऐसी पीढ़ी

जो न माने बात पुरानी

खुद में भी करती है शंका

फिर तुमको काहे छोड़ेगी

उत्तर तुमको देना…

Continue

Added by anwar suhail on January 21, 2014 at 9:35pm — 5 Comments

लेकिन....

तुम क्या जानो जी तुमको हम 

कितना 'मिस' करते हैं...



तुम्हे भुलाना खुद को भूल जाना है 

सुन तो लो, ये नही एक बहाना है 

ख़ट-पद करके पास तुम्हारे आना है 

इसके सिवा कहाँ कोई ठिकाना है...



इक छोटी सी 'लेकिन' है जो बिना बताये 

घुस-बैठी, गुपचुप से, जबरन बीच हमारे 

बहुत सताया इस 'लेकिन' ने तुम क्या जानो 

लगता नही कि इस डायन से पीछा…

Continue

Added by anwar suhail on January 15, 2014 at 9:01pm — 5 Comments

माल्थस का भूत

कितनी दूर से बुलाये गये 

नाचने वाले सितारे 

कितनी दूर से मंगाए गए 

एक से एक गाने वाले 

और तुम अलापने लगे राग-गरीबी 

और तुम दिखलाते रहे भुखमरी 

राज-धर्म के इतिहास लेखन में 

का नही कराना हमे उल्लेख 

कला-संस्कृति के बारे में...



का कहा, हम नाच-गाना न सुनते 

तो इत्ते लोग नही मरते...

अरे बुडबक...

सर्दी से नही मरते लोग तो 

रोड एक्सीडेंट से मर जाते 

बाढ़ से मर जाते 

सूखे से मर जाते 

मलेरिया-डेंगू से मर जाते …

Continue

Added by anwar suhail on January 14, 2014 at 9:30pm — 8 Comments

बाज़ार के लुटेरे....

खोज रही उनकी टोही निगाहें मुझमे 

क्या-क्या उत्पाद खरीद सकता हूँ मैं...



मेरी ज़रूरतें क्या हैं 

क्या है मेरी प्राथमिकताएं 

कितना कमाता हूँ, कैसे कमाता हूँ 

खर्च कर-करके भी कितना बचा पाता हूँ मैं...



एक से एक सजी हैं दुकाने जिनमे 

बिक रही हैं हज़ार ख्वाहिशें हरदम 

मेरी गाढ़ी कमाई की बचत पर डाका 

डालने में उन्हें महारत है...

 

कैसे बच पाउँगा बाज़ार के लुटेरों से

एक दिन उड़ेल आऊंगा बचत अपनी 

हजारों ख्वाहिशें कहकहा…

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Added by anwar suhail on January 13, 2014 at 7:00pm — 4 Comments

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