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चाँद को भी हम कब तलक देखें

चाँद को भी हम कब तलक देखें
न देखें तुम्हे तो क्या फलक देखें

खुद चला आया जो आफताब आँखों में
फिर क्या किसी शम्मा की झलक देखें

आने का यकीं दे चले थे मुस्कुरा के वो
कुछ और हम ये तनहा सड़क देखें

वो न देखें मेरे ये लडखडाये से कदम
देखना है तो मेरी आँखों में चमक देखें

क्या देखते हैं आप यूं काफियों को घूर कर
मिल जाए जो जहां बस सबक देखें

-पुष्यमित्र उपाध्याय



Added by Pushyamitra Upadhyay on November 26, 2012 at 10:36pm — 7 Comments

मुक्तिका : अपनी माटी से जब कटकर जाना पड़ता है

टुकड़ों टुकड़ों में ही बँटकर जाना पड़ता है

अपनी माटी से जब कटकर जाना पड़ता है

 

परदेशों में नौकर भर बन जाने की खातिर

लाखों लोगों में से छँटकर जाना पड़ता है

 

गलती से भी इंटरव्यू में सच न कहूँ, इससे

झूठे उत्तर सारे रटकर जाना पड़ता है

 

उसकी चौखट में दरवाजा नहीं लगा लेकिन

उसके घर में सबको मिटकर जाना पड़ता है

 

आलीशान महल है यूँ तो संसद पर इसमें

इंसानों को कितना घटकर जाना पड़ता है

 

जितना कम…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 26, 2012 at 9:30pm — 11 Comments

ढूँढ़ लफ्जों को, गजल कहना कठिन है-रविकर

2 1 2 2 2 1 2 2 2 1 2 2

टिप्पणी भी अब नहीं छपती हमारी ।
छापते हम गैर की गाली-गँवारी ।

कक्ष-कागज़ मानते कोरा नहीं अब-
ख़त्म होती क्या गजल की अख्तियारी ।

राष्ट्रवादी आज फुर्सत में बिताते -
कल लड़ेंगे आपसी वो फौजदारी ।

नाक पर उनके नहीं मक्खी दिखाती-
मक्खियों ने दी बदल अपनी सवारी ।

ढूँढ़ लफ्जों को, गजल कहना कठिन है-
चल नहीं सकती यहाँ रविकर उधारी ।।

Added by रविकर on November 26, 2012 at 8:00pm — 12 Comments

बूढ़ा बैल । ताटंक छन्द ।

बूढ़ा बैल । ताटंक।

तड़प रहा हूँ भूख प्यास से , बँधा खूँटे में कसाई ।

मालिक ने ही जब बेच दिया , अंजान कब दया आई ।

देखकर ही ताकतवर बदन , बेचा कीना जाता था ।

जो भी ले गया काम कराया , स्नेह से वो खिलाता था ।

दम ना रहा जब बदन में तब , कोई साथ नहीं देता ।

बूढ़ा कह कर मजाक उड़ाते , कुढ़ कर ही मैं सुन लेता ।

खान पान को कौन पूछता , पास कोई न आता है ।

दिन बीते कड़ी मेहनत में , रहा न कोई नाता है ।

थका बदन आँखें ना देखें , किसी को रहम न आये ।

भूल गये सब दुनिया… Continue

Added by Shyam Narain Verma on November 26, 2012 at 5:00pm — 9 Comments

ना जाने कितने कसाब?

आखिरकार कसाब मारा गया! एक लम्बा चला आ रहा विरोध और इंतज़ार ख़त्म हुआ! इस मृत्यु से उन सभी शहीदों जिन्होंने कि देशरक्षा के लिए अपने प्राण निस्वार्थ अर्पण कर दिए के परिजनों को मानसिक शांति तो मिली होगी किन्तु उन्होंने जो खोया उसकी भरपाई नहीं हो सकती|

  कसाब को मारना सिर्फ एक कदम था निष्क्रियता से उबरने के लिए, हालांकि ये बहुत जरुरी भी था| मगर सवाल ये उठता है कि क्या कसाब को मार देना ही उन शहीदों के लिए श्रृद्धांजलि होगी? क्या कसाब ही अंतिम समस्या थी? शायद नहीं! कसाब उस समस्या का सौंवा हिस्सा…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on November 26, 2012 at 4:49pm — 1 Comment

तबादला

तबादला

तबादला कोई खौफ नहीं,

नियमित घटना है,

रहो सदा तैयार इसके लिए,

यह नौकरी का हिस्सा है ।

 

कभी पसंद का,तो कभी मुश्किल का होता है,

कभी सुख तो कभी दुख देता है,

परिवर्तन संसार का नियम है यारो,

तबादले को खुशी से अपनालों यारो ।

 

बेमौसम तबादले तकलीफ़ देते हैं,

पत्नी…

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Added by akhilesh mishra on November 26, 2012 at 3:00pm — 3 Comments

जाओ तूती

नक्‍कारों में

गूंज रही फिर

तूती की आवाज

नहीं जागना

आज पहरूए

खुल जाएगा राज



लाचार कदम

बेबस जनता के

होते ही

कितने हाथ

आधे को

जूठी पत्‍तल है

आधे को

नहीं भात



अकदम सकदम

जरठ मेठ है

और भीरू

युवराज

भव्‍य राजपथ

हींस रहे हैं

सौ-सौ गर्धवराज



आओ खेलें

सत्‍ता-सत्‍ता

जी भर खेलें

फाग

झूम-झूम कर

आज पढ़ेंगें

सारी गीता

नाग



जाओ

इस नमकीन शहर से

तूती अपने…

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Added by राजेश 'मृदु' on November 26, 2012 at 12:30pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
मैं वही हूँ

देखा है

क्रूर वक़्त को,

पैने पंजों से नोचते

कोमल फूलों की मासूमियत

और बिलखते बिलखते

फूलों का बनते जाना पत्थर,

 

देखा है

पत्थर को गुपचुप रोते

फिर कोमलता पाने को

फूल सा खिल जाने को

मुस्काने को, खिलखिलाने को,

 

देखा है

अटूट पत्थर का

फूल बन जाना

फिर कोमलता पाना

महकना, मुस्काना, इतराना,

 

देखा है

सब कुछ बदलते

आकाश से पाताल तक

फिर भी मैं वही हूँ…

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Added by Dr.Prachi Singh on November 26, 2012 at 9:38am — 10 Comments

इक पुरानी ग़ज़ल

इक पुरानी ग़ज़ल से आप सब के साथ मैं भी अपने पुराने दिनों की याद कर रहा हूँ, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 

कर्म के ही हल सदा रखती है कन्धों पे नियति 

पर कभी फसलें मेरी बोनें नहीं देती मुझे 
मेरी देहरी ही बड़ा होने नहीं देती मुझे 
पीर पैरों के खड़ा होने नहीं देती मुझे 
फिर वही आँगन की परिधि में बँट…
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Added by ajay sharma on November 26, 2012 at 12:00am — 3 Comments

लरज़ते अश्कों को रोक लो तुम

छुपा के होठों से गम को अपने

लरज़ते अश्कों को रोक लो तुम |

बना लो गीतों को मेय का प्याला

छलकती बूंदों ही को कहो तुम |

 

ये गम की तड़पन से लिपट लो,

हवा दो आग को जितनी भी तुम |

सुख को हौले से फिर भी छू लो ,

लरज़ते अश्कों को रोक लो तुम |

 

मंजिल पे जख्मों को तो न देखो,

मंजिल को छू लो नयनों से अपने |

बसा के आँखों में कल के सपने,

लरज़ते अश्कों को रोक लो तुम |

 

आसान नहीं खुद को पहचान…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:17pm — 6 Comments

भारत माता की आरती

तेरे नयनों में भर आये नीर तो, लहू मैं बहा दूं माँ,

न्योच्छार तुझपे जीवन करूँ, क्या जिस्म क्या है जाँ |

 

तू धीर गंभीर हिमाला को

मस्तक पे धारण करे |

तू चंचल गंगा जमुना का

प्रतिक्षण वरण करे |

विविध भी एक हैं , देख ले चाहे जहां |

 

जब उठा के लगा दें

हम मस्तक पे धूल |

बसंत है चारों तरफ

खिले मुस्कान के फूल |

नफरत भी बन जाती है, प्रेम का समाँ |

 

तेरे बेटों की ओ माँ

बस यही है आरजू…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:16pm — 5 Comments

हर दुःख मुझे देता है प्रेरणा

हर दुःख मुझे देता है प्रेरणा

संघर्ष को और बढाने की |

हर हार मुझे देती है आशा

जय को करीब लाने की |

 

बिखर जाये जब मन मेरा

मैं उसके मोती चुन लेता हूँ |

निराशा के हर अंगारे को

मैं अमृत समझ के सहता हूँ |

 

ये निराशा मेरे प्रेम की भाषा

जल्दी ही बन जाने की |

हर दुःख मुझे देता है प्रेरणा.....

 

पतझर में जो झर गये पत्ते

आने पे सावन खिल जायेंगे |

मनुष्य यदि प्रयास करे तो

बिछड़े क्षण…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:14pm — 4 Comments

जाने कब क्या हो जाये

इस ज़िंदगी के किस पल में

जाने कब क्या हो जाये |

मिल कर सारे जहाँ की ख़ुशी,

ज़िंदगी ही खो जाये |

 

खुशियों के दर्पण के पीछे,

हम दीवाने हो जाते हैं |

दीवानगी में ये ना सोचे,

अक्स ही हमें सुहाते हैं |

सुख के हर इक अक्षर को, दुःख जाने कब धो जाये |

 

सुख तो इक आज़ाद पंछी,

पिंजरे में न रह पायेगा |

दिल का सूना पिंजरा भरने,

दुःख ही फिर से आ जाएगा |

जाने कब गम का आंसू, दामन को भिगो जाये…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on November 25, 2012 at 11:00pm — 6 Comments

मोहब्बत,,,

हमेशा हमेशा के लिए वो चली गई है दूर मुझसे

जाते जाते बोली मुझे मोहब्बत नहीं है तुझसे



लेकिन फिर भी अश्क थे उसकी नजरों में

वह कह तो गई नहीं है मोहब्बत मुझसे



आज भी सोचता हूँ मैं उसके कहे उस बात को

पागल…

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Added by Neelkamal Vaishnaw on November 25, 2012 at 8:00pm — No Comments

कार्तिक मास महत्त्व

देव उठे अरु लग्न हुए, सखि कार्तिक पावन मास यहाँ,

मत्स्य बने अवतार लिये,प्रभु कार्तिक पूनम सांझ जहाँ,

पद्म पुराण बताय लिखें, महिना इसको हि  पवित्र सदा,

मोक्ष मनुष्य प्रदाय करे,सखि कार्तिक स्नान व दान सदा/…

Continue

Added by Ashok Kumar Raktale on November 25, 2012 at 7:45pm — 3 Comments

पत्नी का खतरनाक बाउंसर (हास्य व्यंग

सचिन तेंदुलकर बोंले -

पत्नी का गुस्सा तेज है

पत्नी के आगे निस्तेज है

हमने कहाँ पत्नी के आगे

सभी पति निस्तेज है

वे बोंले -

बाँल से भी खतरनाक है

बेलन बाँल से क्या कम

खरतनाक है ?

बाँल तो दूर से आती है

बेलन तो हाथ में रखती है ।

पत्नी के बाउंसर से -

हर पति डरता है,

कमाई ला झट से -

हाथ में धर देता है ।

फिर जरुरत पड़ने पर

हाथ फैलाना पड़ता है ।

यह कोई नयी बात नहीं है

हर युग में होता आया है

कृष्ण ने राधिका… Continue

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 25, 2012 at 5:57pm — 6 Comments

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

   

बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,

जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .

 

न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,

फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया  की है .…

Continue

Added by shalini kaushik on November 25, 2012 at 3:57pm — 8 Comments

ग़ज़ल - अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिये

एक पुरानी ग़ज़ल....

शायद २००९ के अंत में या २०१० की शुरुआत में कही थी मगर ३ साल से मंज़रे आम पर आने से रह गयी...

इसको मित्रों से साझा न करने का कारण मैं खुद नहीं जान सका खैर ...

पेश -ए- खिदमत है गौर फरमाएं ............





अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिये


शीशे के घर में लग रहे लोहे के फाटक देखिये…



Continue

Added by वीनस केसरी on November 25, 2012 at 2:59pm — 31 Comments

शांति

शांति 
------
पक्षियों का कलरव 

जल प्रपात 

समुद्र की गोद में 
क्रीड़ारत लहरें 
धुआं उगलते कारखाने 
फर्राटा  भरती  गाड़ियाँ 
शोर हर तरफ 
घुटता दम 
इसके बीच हम 
नहीं सुनायी देती 
नही दिखती 
अबला की चीत्कार 
भूखे नंगे सिसकते बच्चे 
नफरत की चिंगारी 
झुलसते…
Continue

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on November 25, 2012 at 2:36pm — 10 Comments

चलो,वॉट करें।

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Added by MARKAND DAVE. on November 25, 2012 at 11:27am — 3 Comments

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