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सम्पूर्ण ओबीओ परिवार की ओर से आप सभी को शास्त्री/गाँधी जयन्ती की बधाई !

अमर 'शास्त्री'

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

छंद: कुकुभ

(प्रति पंक्ति ३० मात्रा, १६, १४ पर यति अंत में दो गुरु)  

'लाल बहादुर' लाल देश के, काम बड़े छोटी…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on October 2, 2012 at 4:00pm — 24 Comments

कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .

एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की,

दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने के .
जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में ,
आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की .
लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित ,
देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की .
सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया ,
बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की .
आज़ादी के लिए…
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Added by shalini kaushik on October 2, 2012 at 2:39pm — 4 Comments

पुढील स्टेशन (लघु कथा)

तेज लोकल में मध्यम ध्वनि गूँजी, “पुढील स्टेशन अँधेरी”.

“यार ये पुढील स्टेशन का मतलब पुलिस स्टेशन है क्या”? देव ने अजय से पूछा.

अजय बोला, “पता नहीं यार. मैंने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया”.

तभी उनके बगल में खड़ा एक लड़का बोला, “तुम साला भैया लोग यहाँ बस तो जाता है, लेकिन यहाँ का लैंग्वेज सीखने में तुम्हारा नानी मरता है”.

“ए छोकरा ये बातें नेता लोग…

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Added by SUMIT PRATAP SINGH on October 2, 2012 at 11:30am — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
बुजुर्ग दिवस के उपलक्ष में

बुजुर्ग दिवस के उपलक्ष में 

सेदोका एक जापानी विधा ३८ वर्ण ५७७५७७

(१)बूढ़ा बदन 

कंपकपाते हाथ 

किसी का नहीं साथ 

लाठी सहारा 

पाँव से मजबूर 

बेटा बहुत दूर 

(२)धुंधली आँखें 

झुर्री  भरा…

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Added by rajesh kumari on October 1, 2012 at 8:56pm — 12 Comments

इस दौर में बेटों के मुक़ाबिल हैं बेटियाँ

अनजान हैं जो कह रहे, जाहिल हैं बेटियाँ

दुनिया में अब हर काम के,  काबिल हैं बेटियाँ



तौरो तरीके बा-अदब, रखना हैं जानती

इस दौर में बेटों के मुक़ाबिल हैं बेटियाँ



कुर्बान खुद को कर रही, उल्फत-ए-मुल्क पर

अब जंग के मैदाँ में भी शामिल हैं बेटियाँ



मौजे तमन्ना गर कोई, तूफाँ खड़ा करें   

जो थाम ले हर मौज वो साहिल हैं बेटियाँ



सबको यहाँ संवारतीं बन बेटी माँ बहन

इंसान की नेकी का ही हाशिल हैं बेटियाँ





संदीप पटेल "दीप"

सिहोरा ,…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on October 1, 2012 at 1:58pm — 12 Comments

इतनी दूर चले जाना था इतनी पास बुलाया क्यों -----------

तुमसे सीखा हंसना मैंने आखिर मुझे रुलाया क्यों ....

इतनी दूर चले जाना था इतनी पास बुलाया क्यों ...



तेरी यादें, ख़त तेरे कुछ केवल बचा खजाने में 

नींदें, दिल का चैन , खो गया तेरे ख्वाब सजाने में

सोना था तो सो जाते तुम नाहक मुझे जगाया क्यों 

इतनी दूर चले जाना था इतनी पास बुलाया क्यों -----------



काँटों पर चलना था चलते, लेकिन तुम भी होते साथ 

जब भी ठोकर गर मैं खाता तुम दे देते अपना हाथ 

वादे ढेरों लेकिन तुमने इक भी नहीं…

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Added by ajay sharma on October 1, 2012 at 12:02pm — 2 Comments

द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ ,,,,,,,,,

छोटी छोटी बातें बने आस्था के प्रश्न जब ,

बातें बड़ी बड़ी जाने क्यों बिसा र जाते है

अन्नदाता को तो है पिलाते दूध हम किन्तु ,

नौनिहाल देश की प्यासे मर जाते है

द्रौपदी के हिय की व्यथा सुनेगा कौन यहाँ

कृष्ण की चरित्र जब सत्ता की निमित्त हों

कैसे होंगे सीमित दु:शासनों के आचरण

कुंती पुत्र जब आत्मदाह को प्रवत्त हों

कैसे राष्ट्रगान राष्ट्र चिंतन करेगा कोई

पेट को भूख को अंगारे छलते हो मित्र

कैसे होगा देश का भविष्य खुशहाल भला

सड़कों पे जब वर्त्तमान…

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Added by ajay sharma on September 30, 2012 at 11:30pm — 2 Comments

जब वचन निभाने राम चले ....

जब वचन  निभाने राम चले ....
जब वचन  निभाने राम चले ,
संग सिया चली और लखन चले,
दशरथ के प्राणाधार चले ,
कौशल्या के अरमान चले 
जब वचन ......
 
जिस आँगन में खेले राघव ,
घुटनों के…
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Added by shikha kaushik on September 30, 2012 at 9:49pm — 3 Comments

शर्मिंदा हूँ

मनाना तो चाहता हूँ ईद

मगर बंद है

मेरे दिल के दरवाज़े

और ईद का चाँद

मुझे दिखाई नहीं पड़ता

 

दिवाली,दशहरा कैसे मनाऊँ

मेरे अन्दर का रावण

नहीं मरता मुझसे

 

बापू की जयंती है

पर मै

उनसे भी शर्मिंदा हूँ  

मेरे अन्दर हिंसा है

लालच है

मै नहीं मिला पाता

अपनी नज़रें

उनकी तस्वीर से

 

जिन शहीदों ने

जान तक दे दी

हमारी आज़ादी के लिए

हमने उनका सब कुछ लूट…

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Added by नादिर ख़ान on September 30, 2012 at 7:00pm — 5 Comments

लघुकथा :- मोम

“रोहन! अब ये आदत कहाँ से सीख रहा है! रोमी आंटी को नमस्ते क्यों नही किया?” रमेश गुस्से में बोला!

“थॉरी पापा!” रुआंसा आवाज थी रोहन की!

“ह्वाट सॉरी...गलती फिर सॉरी..कोई सॉरी नही मिलेगी!”

“अरे बेटा! अब जाने भी दो! पाँच साल का भी तो नही है ये....” कमरे में बैठे बुज़ुर्ग बोले ही थे कि रमेश बीच में ही बोल पड़ा, “पिताजी, आपको पता है न, मुझे टोक पसंद नही, फिर भी? शांत रहिए!” बुज़ुर्ग चुप हो गए! रमेश बोलता रहा!

अगले दिन! स्कूल में!

“रोहन! बातें नही, इधर ध्यान दो!” टीचर… Continue

Added by पीयूष द्विवेदी भारत on September 29, 2012 at 10:34pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३७ (बन्दिश में आके शाइरी कुम्हलाके रह गई )

 

दर पे हमारे शाम इक इठला के रह गई

हमको तुम्हारी दास्ताँ याद आके रह गई

 

बहरोवज़न के खेल भी हमने समझ लिए

बन्दिश में आके शाइरी कुम्हलाके रह गई

 

होना था दिल के टूटने के बाद और क्या

ज़िदमें ही ज़ीस्त ख्वाबको झुठलाके रह गई

 

बेबस हुए कुछ इस तरह किस्मतके हाथ हम

तेरी निगाहेनाज़ भी समझा के रह गई

 

मुझको तिरी बेजारियों का कुछ गिला नहीं

मेरी भी ज़िंदगी अना दिखला के रह गई  

 

गुंचे शगुफ्ता…

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Added by राज़ नवादवी on September 29, 2012 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ब था तेरा मिलाना नैना

कभी जो मैंने गुजारे थे पल

तुम्हारे दामन में दिन-ओ-रैना

हसीं वो मंजर भुला न पाया

ग़ज़ब था तेरा मिलाना नैना



दिवानापन ले भुला के खुद को

तुम्हारी चाहत को फिरता दरदर

भटकता राहों में तन्हा ऐसे

मिले न राहत मिले न चैना



जुदाई दे के चले हो मुझको

सुनो ये ताने ज़माना कसता

उड़े थे चाहत…
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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on September 29, 2012 at 6:56pm — 2 Comments

तू मेरा अभिमान है ....



पेड़ -

सुनो पेड़ -

छीन ली बैसाखी ,

मोनू आया तेरे दर

पैंया पैंया !

तुमने जो कहा -

मैंने क्या सही सुना -

बहन बड़ा न भैया

सबसे बड़ा रुपैया !



पेड़ पर तूफ़ान उठा है

सुनामी बस्ती उजाडेगी ,

बवंडर तो मचाएगी

डेंगू का डंक मौनू को डसेगा

एलोपैथी ने जबाव दिया टका सा

खून चढाना है एकमात्र उपाय

खून और कोयले की नहीं…
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Added by DR. SAROJ GUPTA on September 29, 2012 at 2:49pm — 2 Comments

मन एक सागर

मन एक सागर

जहाँ ;

भावनाओं की जलपरियाँ

करती हैं अठखेलियाँ

विचारों के राजकुमारों के साथ ;

घात लगाये छुपे रहते

क्रोध के मगरमच्छ ;

लालच की व्हेल भयंकर मुँह फाड़े आतुर

निगल जाने को सबकुछ ;

घूमते रहते ऑक्टोपस दिवास्वप्नों के ;

आते हैं तूफान दुविधाओं के ;

विशालता ही वरदान है

और अभिशाप भी ;

अद्भुत विचित्रता को स्वयं में समेटे

एक अनोखा सम्पूर्ण संसार है

जो सीमाओं में रहकर भी

सीमाओं से मुक्त है ;

मन एक सागर

जहाँ ;

अतीत डूब…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on September 29, 2012 at 12:41pm — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ३६ (साबुन की तरह इश्क भी इकरोज़ गल गया)

ऐसा लगता है कि इस ग़ज़ल की बह्र तरही मुशायरे २७ की ग़ज़ल की ही है. रदीफ़ तो वही है, पर काफिया अलग. मैंने शेर वज़न और बह्र में कहने की कोशिश तो की है, पर मेरे आलिम दोस्त ही बताएंगे कि मैं कोशिश में कितना कामयाब हुआ.

 

लम्हा-ए-दीदनी-ओ-नज़ारा-ए-पल गया

वो माह बनके अर्श पे आया निकल गया

 

गर्दूं में शब की चांदनी हौले से आ बसी

रोज़ेविसालेयार भी आखिर में ढल गया

 

मिटने लगे हैं फर्क अब दिन रात के सभी

मौसम हमारे शह्र का कितना बदल…

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Added by राज़ नवादवी on September 29, 2012 at 9:43am — 2 Comments

शहर में शांति है

शहर में शांति है



आज गाँधी जी के बुत के सामने फिर दंगे भड़क गए

धर्म के नाम पर लोग भिड़ गए मेरे शहर में

कितने ही मासूमों का खून बह निकला सड़कों पर

दिनभर से शहर में कर्फ्यू लगा है 

और प्रशासन कह रहा है शहर में शांति है |



हर रोज बलात्कार होते हैं मेरे शहर में

आबरू लूटती है चोराहों पर दोपहर में

नन्ही बच्चिओं को मार देते हैं जन्म से पहले

दर्द भरी चीखें निकलती हैं अँधेरी गलियों से 

और…
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Added by Er.vir parkash panchal on September 28, 2012 at 5:30pm — 4 Comments

दर्द में जो बात है वो बात राहत में कहाँ !

संघर्ष में आनंद है जो कामयाबी में कहाँ !

दर्द में जो बात है वो बात राहत में कहाँ !



मुद्दा कोई उलझा रहे चलती रहें बस अटकलें ,

जो मज़ा उलझन में है वो सुलझने में कहाँ !



ज़िंदगी की मुश्किलों से रोज़ टकराते रहें ,

ज़िंदगी के साथ है सब मौत आने पर कहाँ !



बरसो बाद दोस्त मिला दिल को मिली कितनी ख़ुशी !

ये गर्मजोशी ,शिकवे ,गिले रोज़ मिलने में कहाँ !



हमको सुकून की नहीं हमें कशमकश की चाह ,

जो…
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Added by shikha kaushik on September 28, 2012 at 5:00pm — 5 Comments

ख़ुद अपनी आँच में

तुम जल रहे हो, हम जल रहे हैं

ख़ुद अपनी आँच में पिघल रहे हैं

 

नया  दौर  हैं नये हैं रस्मों-रिवाज़

अब इंसानियत के पैगाम बदल रहे हैं

 

बाज़ारों की रौनक है, जादू का खेल

किस…

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Added by नादिर ख़ान on September 28, 2012 at 4:00pm — 6 Comments

पौधा रोपा परम-प्रेम का

पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |

पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

जब पादप की बढ़ी उंचाई, पर्वत ईर्ष्या से कुढ़ जाता -

टांग अडाने लगा रोज ही, बकती जिभ्या काली गाली |

लगी चाटने दीमक वह जड़, जिसने थी देखी गहराई -

जड़मति करता दुरमति से जय, पीट रहा आनंदित ताली |

सूख गया जब प्रेम वृक्ष तो, काट रहा जालिम सौदाई -

आज ताकता नंगा पर्वत, बिगड़ चुकी जब हालत-माली |

लगी खिसकने चट्टानें अब , भूमि स्खलित होती हरदम -

पर्वत की…

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Added by रविकर on September 28, 2012 at 2:00pm — 4 Comments

ये जिंदगानी

फूलों का सफर या

कांटों की कहानी

क्‍या कहूं कैसी है

ये जिंदगानी

कभी तो इसी ने

आंखों से पिलाया

बड़ी बेरूखी से

कभी मुंह फिराया

गम की इबारत या

जलवों की कहानी

क्‍या कहूं कैसी है

ये जिंदगानी

 

कभी सब्‍ज पत्‍तों पर

शबनम की लिखावट

कभी चांदनी में

काजल की मिलावट

 

कभी शोखियों की

गुलाबी शरारत

कभी तल्‍ख तेवर की

चुभती…

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Added by राजेश 'मृदु' on September 28, 2012 at 12:46pm — 3 Comments

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