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अनुष्टुप में एक प्रयोग

चित्र से काव्य तक प्रतियोगिता अंक १०  में आदरणीय सौरभ बड़े भईया द्वारा अनुष्टुप छंद के विषय मे दी गयी बहुमूल्य जानकारी के आधार पर यह व्यंग्य प्रयोग प्रस्तुत है...

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समय है चुनावों का, गाल सब बजा रहे |

राम युग बसाएंगे,…

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Added by Sanjay Mishra 'Habib' on January 22, 2012 at 11:30am — 8 Comments

अकेला

अकेला .......

अकेला

एक शब्द

स्वयं मे अकेला|

हजारों कि भीड़ मे

एक अहसास

अकेले होने का

इंसान को अकेला कर देता है

समाज मे,स्वयं कि सोच मे|

कितना अजीब सा है

यह अहसास

अकेलेपन का ?

कभी सोचा है तुमने

किसी सुखी मनुष्य का बारे मे

क्या उसे सालता है अहसास

अकेलेपन का

अथवा यह है अनुभूति

केवल दुखी मनुष्य के साथ?

अकेलापन किसी कि बपौती नहीं

यह है मात्र अहसास

विचारों के साथ|

कभी कभी अच्छा लगता…

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Added by dr a kirtivardhan on January 21, 2012 at 11:00pm — 3 Comments

तेरे बिना लगती है जिंदगी अधूरी सी |

तेरे बिना लगती है जिंदगी अधूरी सी |

अपनी बज़्म की है अब हर ख़ुशी अधूरी सी ||



बन के अब्र कोई ,बरसाए बारिशे-उल्फत ,

मुहब्बत के बिन तो है दिल की ज़मीं अधूरी सी ||



इसको गुनाह समझ ,चाहे समझ खता इसको ,

हमसफ़र के बिन लगती है खुदी अधूरी सी ||



जाम छलके हैं चाहे रोज़ मैकदे में, पर ,

तेरे बिन साकीया ,मैकशी अधूरी सी |



मैं चाहता हूँ अक्सर देखना खुदा को ,

जाने क्यों रह जाए बन्दगी अधूरी सी |



उनके ख्यालों में खोकर "नजील" अब मै तो… Continue

Added by Nazeel on January 21, 2012 at 7:45pm — 6 Comments

बड़ी उलझन है उलझी सी

नहीं जो हौंसला होता,
न तू काफ़िर हुआ होता |

सभी को भूल जाती मैं,
न कोई रतजगा होता |

न दी आवाज़ ही होती,
न कोई सिलसिला होता |

कहानी कौन कर पाता,
किसे कब कुछ पता होता |

ग़ज़ल तो बस ग़ज़ल होती,
न कोई ज़लज़ला होता |

न आती मौत इंसां को
न सोने को मिला होता |

बड़ी उलझन है उलझी सी,
न होती मैं तो क्या होता |

Added by Nutan Vyas on January 21, 2012 at 3:00pm — 9 Comments

दिल मेरा

हमको यह गुमा था की हम है दिलो के खरेदार…

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Added by Kiran Arya on January 20, 2012 at 3:19pm — 4 Comments

नहीं आती,,,,,,,,

नहीं आती,,,,,,,,

-------------------



क्रिकॆटर हॊ तॊ जातॆ मगर, बैटिंग नहीं आती ॥

इन्टरनॆट पर भाई हमकॊ, चैटिंग नहीं आती ॥१॥…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 19, 2012 at 11:09am — 3 Comments

कोयलिया जब गाती है

चल झूठ रूठना है तेरा

आंखें सब बतलातीं है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

आँखों से अब ना आस गिरा

बातों पे रख विश्वास जरा

जाने दे मत रोक मुझें

सर पे दुनियां दारी है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

न तू भूलीं न मैं भुला

जब झूलें थे सावन झुला

मौसम अब के बरसातीं है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

चलतें थे तट पे साथ प्रिये

नटखट हाथों में हाथ…

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Added by shashiprakash saini on January 19, 2012 at 4:00am — 2 Comments

तुमनें पूछा ...

मैं कौन हूँ ?

ये ही पूछा हैं न ?

ये मेरी ही दस्तक है

जो फैलाती हैं सुगंध

बनती है मकरंद.

जो काफी है

भौरों को मतवाला बनाने को

और कर देती है लाचार

बंद होने को पंखुड़ियों में ही

तुम नहीं देख पाए मुझको

उन परवानों के दीवानेपन में

जो झोंक देते हैं प्राण शमा पर

क्या मैं नहीं होता हूँ

उन ओस की बूंदों में

जो गुदगुदाती हैं

प्रेमियों को

रिमझिम फुहार में

बस…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on January 18, 2012 at 4:00pm — 12 Comments

नीयत साफ़ रखॊ,,,,,, -----------------------

नीयत साफ़ रखॊ,,,,,,

-----------------------



कुछ इस तरह सॆ,तबियत साफ़ रखॊ ।

नज़र साफ़ रखॊ, नीयत साफ़ रखॊ ॥१॥



यॆ सारा ज़माना,तुम्हारा हॊ जायॆगा,

मन साफ़ रखॊ,मॊहब्बत साफ़ रखॊ ॥२॥



हर बात की तासीर दिखाई दॆगी बस,

अदा साफ़ रखॊ,औआदत साफ़ रखॊ ॥३॥



मज़ाल क्या जॊ, बिगड़ जायॆं बच्चॆ,

अदब साफ़ रखॊ,नसीहत साफ़ रखॊ ॥४॥



तुम्हारा बॊया ही,औलाद कॊ मिलॆगा,

बीज साफ़ रखॊ, वशीयत साफ़ रखॊ ॥५॥…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2012 at 2:52am — 2 Comments

रिश्तॆ,,,,,, -----------------

रिश्तॆ,,,,,, -----------------

दूर जब सॆ दिलॊं कॆ मॆल हॊ गयॆ ।

रिश्तॆ जैसॆ राई का तॆल हॊ गयॆ ॥१॥

जिननॆ दी रिश्वत नौकरी मिली,

डिग्रियां लॆ खड़ॆ थॆ फ़ॆल हॊ गयॆ ॥२॥

इरादॆ बहुत नॆक मगर क्या करॆं,

मंहगाई मॆं दब कॆ गुलॆल हॊ गयॆ ॥३॥

बॆमानी भ्रष्टाचार न मरॆंगॆ कभी,

बढ़ रहॆ हैं जैसॆ अमरबॆल हॊ गयॆ ॥४॥

बात की बात मॆं बदल जातॆ लॊग,

वादॆ जैसॆ बच्चॊं, कॆ खॆल हॊ गयॆ ॥५॥

नर और नारी रचॆ थॆ नारायण…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 18, 2012 at 2:50am — 3 Comments

बड़ॆ खराब हॊ,,,,

बड़ॆ खराब हॊ,,,,

---------------------

कद से बढ़ कर हाज़िर जवाब हो!

अकेले गज़ल की पूरी किताब हॊ !!



तुम्हे खिज़ाब लगाने की क्या पड़ी,

रंग-रूप से तॊ पैदाइशी खिज़ाब हॊ !!



वक्त की आँधियों ने क्या बिगाड़ा है,

खिले गुलाब थे अब सूखे गुलाब हॊ !!



इस उम्र मे भी आ रहे हैं मिस काल,

मोहब्बत के मामले मॆं कामयाब हॊ !!



हमने तो महज़ सितारा समझा था,

मगर आप तो दहकते आफ़ताब हो !!…



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Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 17, 2012 at 7:32pm — 3 Comments

खाली ज़मीन --- हास्य/ शुभ्रांशु पाण्डेय



सुबह-सुबह लाउडस्पीकर पर बजरंगबली के गोलगप्पा ले के कूद पडने वाले गाने को सुन कर मेरा मन भी बजरंगबली की तरह कूदने को होने लगा. यों मैं बताता चलूँ कि इस गाने या भजन (?) की कोई तुक समझ में नहीं आती है. लेकिन बजता है तो कुछ जरूर होगी. या तो ये गीत है या भजन है.

लेकिन सुबह-सुबह मेरे घर के बगल की खाली जमीन पर गोलगप्पा खिलाये बिना कुदाने वाले कौन लोग आ गये ? यही जानने समझने के लिये मैं हडबडा कर…

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Added by Shubhranshu Pandey on January 17, 2012 at 5:30pm — 10 Comments

ये क्या किया तन्हाई !

ये  क्या  किया तन्हाई !

क्यूँ संजोया तुमनें उन पलों को

जो बन चुके हैं

घाव से नासूर

ढूंड पाओगी

कभी मेरा कसूर ?

गहरी साँसों का मंजर

अधूरे ख्वाबों का खंजर

जो धंस गया है दिल में

चुभनें लगा है फिर से

तुम्हारे आते ही.

कर रहा है मंथन 

भावों में

अब रिस रहा है

धीरे धीरे चीस्ते से

घावों में .

हाए वो अनलिखे मजमून

जो ख़त नहीं बन पाए

क्यों रख दिए तुमनें

तह बना कर

दिल…

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Added by Dr Ajay Kumar Sharma on January 17, 2012 at 3:25pm — 2 Comments

उत्तर ढूंढना है

काश !

कोई दिन मेरा घर में गुजरता

बेवजह बातें बनाते

हँसते – हँसाते

गीत कोई गुनगुनाते

पर नही मुमकिन

मैं दिन घर में बिताऊँ!

 

एक नदी प्यासी पड़ी घर में अकेले

और रेगिस्तान में मैं जल रहा हूँ

थक चुका पर चल रहा हूँ

ढूढता हूँ अंजुली भर जल

जिसे ले

शाम को घर लौट जाऊँ

प्यास को पानी पिला दूँ !

 

मेरे आँगन की बहारों पर

जवानी छा गई है

और मैं

धूप के बाज़ार में बैठा हुआ…

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Added by Arun Sri on January 17, 2012 at 1:30pm — 2 Comments

मुस्काने की फितरत साथ दे अगर

मुश्किल में एजद की रहमत साथ दे अगर |

तो छू लें बुलंदी हम ,किस्मत साथ दे अगर ||



मिट  जाएगा  झूठ  हमारी  कायनात  से ,

बस हमको इक बार सदाकत साथ से अगर…

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Added by Nazeel on January 17, 2012 at 12:30pm — 4 Comments

गीत विरह के

गीत विरह के 


जिसनें जीवन के सुन्दर पल

साथ हमारे काटे थे
क्या खबर थी उनके जीवन में
बस  काँटे  ही काँटे  थे
 

हम बेबस थे,थे लाचार
कैसे जताते अपना प्यार
हमनें…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on January 17, 2012 at 12:30pm — 8 Comments

आजमाइश

तुम्हारी हर आजमाइश के आगे हम सर झुकाते चले गए

सोचा यह आजमाइश ही सच्चे प्रेम की निशानी है

इक आजमाइश पर उतरकर खरे खुश होने से पहले ही

तुम एक और आजमाइश संग खड़े मुस्काते नज़र आये

हम फिर जुट गए उस पर खरा उतरने की जुगत में

जब होने लगा यकीन तुम्हे प्यार पे मेरे आजमयिशो से परे

तुम लगे सोचने ख़त्म करने को सिलसिला आवाजाही का

तब तक मन का जीव मुक्त हो चुका था हर आजमाइश से

और सिर्फ खुली हुई आंखें मेरी रह गई बैचैनी का मंज़र लिए

पूछती एक ही ही…

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Added by Kiran Arya on January 17, 2012 at 10:59am — 5 Comments

सृष्टि का ऋत

अवश्य ही कट जाएगा,

एक दिन वह भी मुझसे,

जो शेष बचा रहा अब तक,

स्वार्थ में अपने...

नहीं इसलिए कि ,

उसका है ध्येय  अनुचित

वरन यही तो है

सृष्टि  का ऋत!

Added by Nutan Vyas on January 17, 2012 at 9:30am — 1 Comment

फुटकर ख्याल

कल्पना में बिखरे कुछ टुकड़े पेश हैं:

 

घर में छा जातीं खुशियाँ

अगर कोई लल्ला हो गया l

 

और अगर जन्मी बिटिया

तो भारी पल्ला हो गया l

 

जब कभी फसल हुई कम

तो मंहगा गल्ला हो गया l

 

कोई डिग्री लेकर घर बैठे

तो वो निठल्ला हो गया l

 

शादी क्या हुई जनाब की

बीबी का…

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Added by Shanno Aggarwal on January 17, 2012 at 3:30am — 8 Comments

घनाक्षरी



हुए थे सूरमा कई, जो खेले थे जान पर ,

उनके ही प्रताप से , ये देश स्वतंत्र है |
न हो तानाशाह कोई, जनता का राज हो ,
दे संविधान बनाया , इसे गणतन्त्र है |…
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Added by dilbag virk on January 16, 2012 at 10:17pm — 3 Comments

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