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ये तेरी बेरुखी की इंतेहा है या मेरी ख्वाहिशों का कसूर,
आज भी रोने के लिए हम तेरे शाने को तरसते हैं।

...........................................................................

तेरे साथ ही हूँ मगर अब वो एहसास नहीं दिखता,
जो गुदगुदा जाता था मुझे, कभी बस राहों मे तेरे मिल जाने से !

...............................................................................

दिल में सोई हुई तमन्नाओ का इज़हार करके देखो,
ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है, किसी से प्यार करके देखो,

क्या हुआ जो एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े,
कभी तो मिलेगी ही मंज़िल, बस तलाश बार-बार करके देखो।

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2012 at 12:31pm

इस सुखद कोशिश के लिये बधाइयाँ.

Comment by Vasudha Nigam on January 16, 2012 at 9:50am

abhaar aap sabhi ka

Comment by Shubhranshu Pandey on January 15, 2012 at 12:50pm

क्या हुआ जो एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े,
कभी तो मिलेगी ही मंज़िल, बस तलाश बार-बार करके देखो।

बहुत खूब. 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 14, 2012 at 3:29pm

कहन बढ़िया है, और भी कसने की जरुरत, बधाई |

Comment by Abhinav Arun on January 13, 2012 at 8:55pm

बेहद खूबसूरत अशआर साझा किये आपने आदरणीय वसुधा जी ! हार्दिक बधाई और विस्तारपरक - सशक्त लेखन हेतु हार्दीक शुभकामनाएं !!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on January 13, 2012 at 11:20am

बहुत खूब.

Comment by Nazeel on January 13, 2012 at 11:09am

बहुत सुंदर रचना ..... हार्दिक बधाई ..:)

कृपया ध्यान दे...

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