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सपना ---
लंगड़े की बैशाखी,बच्चे का खिलौना,
रेल आई -रेल आई,लेकर दौड़ा छोना |

.
सुख की परिभाषा उस बच्चे से पूछो,
ना खाने को रोटी,ना सोने का बिछोना|

.

खेलता है फिर भी,रुखी रोटी खा,
मांगता नहीं वह कार या खिलौना|

.

देखा है मैंने उसको सपने सजाते,
खुले गगन तले चाहता है वह सोना|

.

धरती से अम्बर उसकी सीमाएं हैं,
देखता है सबको रोटी का वह सपना|
.

.
डॉ अ कीर्तिवर्धन
9911323732

Views: 423

Comment

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Comment by Shubhranshu Pandey on January 15, 2012 at 1:02pm

एक अच्छी रचना के लिये बधाई 

Comment by dr a kirtivardhan on January 14, 2012 at 10:49pm

aap sab mitron ke prati kragyata gyapit karata hun,itna utsah badhane ke liye.

Comment by AK Rajput on January 11, 2012 at 6:32pm

सुख की परिभाषा उस बच्चे से पूछो,
ना खाने को रोटी,ना सोने का बिछोना|..

मन को छूने वाली  रचना .

बधाई ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 11, 2012 at 12:54pm

बच्चे की मनोदशा बताते हुए व्यापी विडंबनाओं को रेखांकित करनी की बेहतर कोशिश के लिये कीर्तिवर्द्धनजी को सादर बधाई प्रेषित करता हूँ.

Comment by Neelam Upadhyaya on January 11, 2012 at 10:04am

मन को छूने वाली ह्रदय स्पर्शी रचना के लिये बहुत बहुत बधाई ।

Comment by Shanno Aggarwal on January 11, 2012 at 2:21am

बहुत हृदय स्पर्शी रचना..बधाई !

''सुख की परिभाषा उस बच्चे से पूछो,

ना खाने को रोटी,ना सोने का बिछोना|''

Comment by Abhinav Arun on January 10, 2012 at 1:36pm
बिलकुल नए अंदाज़ की रचना ! नए बिम्बों का अत्यंत खुबसूरत रूप ! हार्दिक बधाई श्री कीर्ति वर्धन जी !!
Comment by AjAy Kumar Bohat on January 9, 2012 at 11:29am

बहुत सुंदर एवं मार्मिक अभिव्यक्ति, बधाई स्वीकार करें...

कृपया ध्यान दे...

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