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Vikram Srivastava
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  • Faizabad
  • India
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योगराज प्रभाकर commented on Vikram Srivastava's blog post तलाश
"बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति विक्रम भाई. साधुवाद स्वीकार करें."
Jan 13
Vikram Srivastava posted a blog post

तलाश

चल पड़ा हूँ इक सफ़र पर, एक अनजानी डगर पर | मजिल पता है, कि जाना कहाँ है | पर रास्ता नहीं, वो कहीं खो गया है | वो मंजिल मैं अब हर डगर ढूँढता हूँ | कभी तो मिलेगी, अगर ढूँढता हूँ | जज्बों में हिम्मत, इरादे बड़े हैं | मगर राह में ऊंचे पर्वत खड़े हैं | इन्हें पार करना भी मुश्किल बड़ा है | मगर अब ये बंद भी जिद पे अड़ा है| इन्हें लांघने का सबब ढूँढता हूँ | कभी तो मिलेगा अगर ढूँढता हूँ | किसी कि दुआएं मेरे साथ भी हैं| कुछ संग चलते मेरे आज भी हैं | कह नहीं सकता कि कब तक रहेंगे | परिवर्तन कि धारा में…See More
Jan 11
Vikram Srivastava replied to Admin's discussion "OBO लाइव महा उत्सव" अंक १४
"अभी शब् है के कोई ख्वाब सहेजें आओ | अपनी सुबह को हसीं और भी कर दे आओ | लम्हे खुशियों के जो बिखरे है आज | उन्ही लम्हों को फिर से समेटें आओ | अभी शब् है...... रात काली है मगर चांदनी की तो है आस | हमको कुछ देर भी हुई तो है आज | सुबह भूले थे…"
Dec 9, 2011
Vikram Srivastava and Shyam Bihari Shyamal are now friends
Dec 7, 2011
Prabhakar Pandey commented on Vikram Srivastava's blog post ३ कह मुकरियाँ
"सम्मानीय विद्वतजन, (३) हमरे जीवन कै आधार वो ही तो सगरा संसार बड़ा सोच के रचिन रचैया  ऐ सखी साजन?? न सखी मैया...   इस मुकरी पर आई टिप्पणियों को पढ़ने के बाद मैं थोड़ा मतिभ्रम हो गया हूँ। क्योंकि मुझे लगता है कि ये मुकरी भी एकदम सार्थक और…"
Nov 30, 2011
Vikram Srivastava posted a blog post

"कौन पागल है ?".......

 क्या वो पागल है, जो बेवजह मुस्कुराता है ?पागल ही है, तभी सरे राह गुनगुनाता है |अपनी ही धुन में वो गली गली घूमता है |राह चलते जानवरों को तो कोई पागल ही चूमता है |वो राहगीर है, उसका कोई घर बार बही है |उसे किसी का, किसी को उसका इंतजार नहीं है |बिना खाए पिए भी दिन रात मुस्कुराता है |ऐसे ही इंसान को तो पागल कहा जाता है |क्या वो पागल है........ हर तरफ आग है, है हर ओर बस नफरत का धुंआ,एक दूजे कि जाँ ले रहे हैं हिन्दू मुसलमाँ |पर उसे फर्क नहीं, वो तो मुस्कुराता है |जलते चौराहों पर वो नाचता और गाता है…See More
Nov 29, 2011
Saurabh Pandey commented on Vikram Srivastava's blog post इश्क़
"आप इस बह्र का नाम जानना चाहते हैं ? हाँ जी.. ."
Nov 26, 2011
वीनस केसरी commented on Vikram Srivastava's blog post इश्क़
"सौरभ जी,बह्र को २२२२ २२२२ बिलकुल किया जा सकता है मगर आप इस बह्र की ग़ज़लों में अक्सर दीर्घ को विषम संख्या में ही पायेंगे जैसे २२२२ २२२ ,, २२२२ २२२२ २ ,,, २२२२ २२२२ २२२ आदि कारण है लयात्मकता (इस बह्र में सारा खेल लयात्मकता का है,, नियमानुसार यदि आप…"
Nov 26, 2011
Saurabh Pandey commented on Vikram Srivastava's blog post इश्क़
"बह्र को २२२२ २२२२ क्यों न बना दें.  मतले में आखिर में है भर जोड़ना है.  कृपया कहें कि २२२२ २२२ क्या बह्र है?    "
Nov 26, 2011
वीनस केसरी commented on Vikram Srivastava's blog post इश्क़
"सभी आदरणीय से विनम्र निवेदन है कि यदि विक्रम जी को प्रोत्साहित करना है तो उनकी रचना में कमियों को बताने साथ साथ उन्हें कैसे सुधार जाए इस पर भी चर्चा होनी चाहिए थी एक तुच्छ प्रयास कर रहा हूँ निवेदन है कि इस चर्चा को आगे बढ़ाएँ जिससे कि गाठें खुलें और…"
Nov 26, 2011
Vikram Srivastava posted a blog post

रात का शोर

तुमने कभी सुना है, रात का शोर?कभी सुने हैं चीखते सन्नाटे?जो सोने नहीं देते । बार बार एक ही नाम पुकारते है |और ये अंधेराजो शोर मचाता है  किसी की याद दिलाता है | सन्नाटों को ये जुबान किसने दे दी ?किसने सिखाया यूं चीखना चिल्लाना, रोना बिलखना?कोई इनसे पूछो,और ये भी पूछो  के ये मुझे क्यूँ जगाते हैं ? किसी की याद दिलाते है |  जिन यादों को मैं भुला आया था | और वो बातें जो मैंने सबसे छुपा रखी थी |दिमाग के किसी कोने मे दबा रखी थी |वो बातें ये रात कैसे जान गयी?और ये सबको क्यूँ बताती है ?किसी की याद…See More
Nov 20, 2011
विवेक मिश्र commented on Vikram Srivastava's blog post इश्क़
"विक्रम जी!कहना चाहूँगा कि आपका शे'र- /यह कैसा व्यापार हुआ- दुश्मन सारा बाज़ार हुआ-/ यदि इसे इस तरह लिखा जाए-/यह कैसा व्यापार हुआ- दुश्मन अब बाज़ार हुआ-/ तो इसकी बह्र २२२२ २२२ होगी, न कि २२२२ २११२. (यहाँ र(१)+हु(१) अर्थात दो लघु मिलकर एक दीर्घ (२)…"
Nov 20, 2011
Vikram Srivastava replied to Admin's discussion खुशिया और गम, ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार के संग...
"जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएँ ......परमपिता आप पर अपना स्नेह सदा बनाए रखें....:)  "
Nov 18, 2011
Vikram Srivastava replied to Ambarish Srivastava's discussion 'चित्र से काव्य तक' प्रतियोगिता अंक-८ in the group चित्र से काव्य तक
"जाने क्यों तुम इसे  मौत का कुआं कहते हो मेरे लिए तो इसका हर ज़र्रा ज़िंदगी से बना है कभी ध्यान से देखो  ये ज़िंदगी का कुआँ है   जैसे ज़िंदगी हमें गोल गोल नचाती है  वैसे मेरी मोटर भी  चक्करों मे चलती है रंग बदलता है…"
Nov 18, 2011
Vikram Srivastava joined Admin's group
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चित्र से काव्य तक

प्रतियोगिता "चित्र से काव्य तक" में भाग लेने हेतु सदस्य इस समूह को ज्वाइन कर ले |
Nov 18, 2011
आशीष यादव commented on Vikram Srivastava's blog post इश्क़
"bahut achchhi koshish ki hai aapne. bs ye rachna ghazal nahi bn payi hai lekin mujhe pura wishwas hai ki aap is kala me jald hi mahir ho jayenge. jo kuchh bhi aapne kaha hai bahut achchha lga mujhe|  badhai"
Nov 17, 2011

Profile Information

Gender
Male
City State
Faizabad U.P.
Native Place
Faizabad
Profession
Student

Vikram Srivastava's Blog

तलाश

Posted on January 11, 2012 at 2:00am 1 Comment

चल पड़ा हूँ इक सफ़र पर,

एक अनजानी डगर पर |

मजिल पता है, कि जाना कहाँ है |

पर रास्ता नहीं, वो कहीं खो गया है |

वो मंजिल मैं अब हर डगर ढूँढता हूँ |

कभी तो मिलेगी, अगर ढूँढता हूँ |



जज्बों में हिम्मत, इरादे बड़े हैं |

मगर राह में ऊंचे पर्वत खड़े हैं |

इन्हें पार करना भी मुश्किल बड़ा है |

मगर अब ये बंद भी जिद पे अड़ा है|

इन्हें लांघने का सबब ढूँढता हूँ |

कभी तो मिलेगा अगर ढूँढता हूँ |



किसी कि दुआएं…

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"कौन पागल है ?".......

Posted on November 29, 2011 at 3:22pm 0 Comments

 

क्या वो पागल है, जो बेवजह मुस्कुराता है ?

पागल ही है, तभी सरे राह गुनगुनाता है |

अपनी ही धुन में वो गली गली घूमता है |

राह चलते जानवरों को तो कोई पागल ही चूमता है |

वो राहगीर है, उसका कोई घर बार बही है |…

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रात का शोर

Posted on November 20, 2011 at 1:47am 0 Comments

तुमने कभी सुना है, 

रात का शोर?

कभी सुने हैं 

चीखते सन्नाटे?

जो सोने नहीं देते । 

बार बार एक ही 

नाम पुकारते है |

और ये अंधेरा

जो शोर मचाता है  

किसी की याद दिलाता है |

 

सन्नाटों को ये जुबान 

किसने दे दी…

Continue

इश्क़

Posted on November 12, 2011 at 2:08am 12 Comments

 

ये कैसा व्यापार हुआ,

दुश्मन सारा बाज़ार हुआ |

 

दिल लेकर दिल दे बैठे तो,

क्यूँ जग में हाहाकार हुआ|

 …

Continue

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At 9:34pm on November 10, 2011, Arun Kumar Pandey 'Abhinav' said…

shri Vikram Shrivastav JI "स्वप्न सुंदरी" को माह की श्रेष्ठ रचना चुने जाने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !!

At 9:43am on November 10, 2011, आशीष यादव said…

आदरणीय श्री विक्रम श्रीवास्तव जी,

आप की रचना को महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना घोषित किया गया है| आप की रचनाएँ बहुत अच्छी है| मेरी तरफ से बधाई स्वीकार करें|

At 5:21pm on November 7, 2011, Ganesh Jee "Bagi" said…

आदरणीय श्री विक्रम श्रीवास्तव जी,

सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आप की रचना "स्वप्न सुंदरी" को महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना (Best Creation of the Month) के रूप मे सम्मानित किया गया है, तथा आप की छाया चित्र को ओ बी ओ मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया गया है |
इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे,धन्यवाद,
आपका
गणेश जी "बागी"

संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 9:36am on September 19, 2011, Admin said…

 
 
 

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