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दोषी कौन

ऋषि मुनियों की ये धरती

बहती ज्ञान की गंगा

योगी सिद्ध जन पूजे जाते

था मन निर्मल तन चंगा

कोई गाये लहराए कोई पूछे

बाबा रे बाबा तेरा रंग कैसा

दिव्य मुस्कान ले बाबा बोले

जिसमें मिला दो उस जैसा

काल बदला विचार बदला

आदमी का हाल बदला

अंधविश्वास आधुनिकीकरण की दौड़

बाबाओं ने भी चोला बदला

बिकता पानी बिकता खून

बिकती भूख गिरते भ्रूण

अस्मत बिकती कटते वन

सफ़ेद चोला काला मन

बिक रही जब हर चीज

बाबा फिर…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 7, 2012 at 9:30pm — 12 Comments

बिंदिया [लघु कथा ]

मीनू की डोली जब प्रशांत के घर के आगे रुकी तो दरवाजे पर पूजा की थाली लिए शिखा खड़ी थी | शिखा ने आगे बढ़ कर अपने प्यारे भैया प्रशांत और अपनी प्यारी सखी जो आज दुल्हन बनी ,भाभी के रूप में उसके सामने  खड़ी थी ,आरती उतार कर स्वागत किया |बर्तन में भरे हुए चावल को अपने पैर से बिखराते हुए ,पूरे रीति रिवाज के अनुसार मीनू ने अपने ससुराल में प्रवेश किया |पूरा घर खुशियों से चहक उठा ,शिखा ने मीनू को गले लगाते हुए कहा ,''आज तुम्हारा पांच साल से परवान चढ़ता हुआ प्रेम सफल हुआ ,मै जानती हूँ तुम और…

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Added by Rekha Joshi on June 7, 2012 at 5:25pm — 23 Comments

मन मेरे...

मन मेरे

हिम्मत न हार

जय तेरी होगी|

निरंतर अग्रसर हो

कर्म के पथ पर,

प्रत्याशा के रथ पर

मिटा के अंतर्द्वंदों को

त्याग आलस्य को,

घातक नैराश्य को

तुझमें नैर्गुण्य नहीं,

तू बिलकुल शून्य नहीं

तुझमें भी क्षमता है

अपनी महत्ता है|

स्वयं की पहचान कर

खुद पर अभिमान कर,

शंखनाद कर दे

अस्तित्व के संग्राम का,

भय क्या परिणाम का

निर्भीकता शस्त्र है

मार्ग प्रशस्त है,

कल्पना के चित्र को

यथार्थ पर उकेर,…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 7, 2012 at 4:30pm — 10 Comments

गीत -मैं भी कुछ सुनाऊँ तुमको, जो एसी भी शक्ति दी होती

मैं भी कुछ सुनाऊं तुमको,

जो ऐसी भी शक्ति दी होती



हे माँ तेरी चरणों में,

कुछ मेरी भी अर्जी तो होती



मैं दीन हूँ माँ समझो,

पर हीन न समझा करो



सीने से न अपने सही,

चरणों से न दूर करो



मैं पुत्र कुपुत्र हूँ माँ,

समझा न तेरे मन को



तुम तो माँ कुमाता नहीं,

समझो तो मेरे मन को



थोड़ा मुझ को भी दे दो माँ,

स्नेह अपनी झोली से तुम



है माँ बेटे का नाता,

माँ खोयी हो कहाँ तुम | …

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Added by जगदानन्द झा 'मनु' on June 7, 2012 at 1:00pm — 6 Comments

(क्या ऐसे होते हैं-?)

(क्या ऐसे होते हैं-?)
 
क्या बाबा ऐसे होते हैं
जो लोगों को उकसाते हैं
मधुर बाणी से फँसाते हैं
और करोडो अरबों कमाते हैं
लोग तो भोले भाले हैं
बस झांसे में आ जाते हैं 
तन मन धन जब लुट जाता 
तब कहीं होश में आते हैं
धोखा देते जनता को…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on June 7, 2012 at 12:36pm — 8 Comments

- - - -जब मुझे प्यार हो जायेगा - - - - -

आँखें भर आयेंगी, ये दिल भी रो जायेगा 

बदनामों में नाम हमारा भी हो जायेगा 
नींद भी जाएगी ,चैन भी खो जायेगा 
मुझे जब  किसी से  प्यार हो जायेगा 
             चाँद में कभी दाग मुझको नज़र आयेगा 
             पर ' वो ' हमेशा ही  बेदाग नजर आयेगा
             कभी रोशनी से उसकी चमकेगा जहां मेरा 
              रोशनी से उसकी कभी चाँद  भी लाज़ायेगा
चेहरा उसका खिलता गुलाब…
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Added by Ajay Singh on June 7, 2012 at 12:09pm — 6 Comments

टूट गया है क्या वह सांचा बाबाजी

कितना झूठा, कितना साचा बाबाजी

हमने सब का  चेहरा बांचा बाबाजी



अग्निपथ टू  देख के दर्शक चौंक उठे

विजय से ज़्यादा हॉट है कांचा बाबाजी



जुहू तट पर अपनी अपनी आयटम संग…

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Added by Albela Khatri on June 7, 2012 at 9:22am — 22 Comments

बड़े आदमी का माँगने का कला (व्यंग्य)

एक बड़ा आदमी अभी बोला कि वो माँगने कू नहीं गया था | उसे तो महामहिम ने अपने आप दे दिया , तो वो ले लिया | वो एकदम ई सच्ची बोला | क्यूं , इस वास्ते कि बड़ा आदमी छोटा चीज कभी नईं मांगता | बड़ा चीज भी वो एसीच्च नईं मांगता | बड़ा आदमी का माँगने का कला भी बड़ा ई अलग होता | अपुन जैसा मिडिल क्लास मांगेगा तो बोलेगा कि मिल जाएगा तो बड़ा मेहरबानी होगा , अक्खा लाईफ ओबलाईज रहेगा | थोड़ा और नीचे जायेंगा , बोले तो एकदम फटीचर क्लास में  तो वो बोलेगा कि माईं बाप अपुन…

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Added by अरुण कान्त शुक्ला on June 6, 2012 at 11:30pm — 13 Comments

हैं हर-सू धमाके अमन हो रहा है

यूँ बदनाम अपना वतन हो रहा है

था धरती कभी अब गगन हो रहा है



जो चढ़ फूल देवों 'प' इतरा रहे हैं

बे-ईमान सारा चमन हो रहा है



जो पग में चुभा था कभी खार बनके

वो झूठा फरेबी सुमन हो रहा है



दी आहूति सपनों भरी अब युवा ने…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on June 6, 2012 at 6:00pm — 10 Comments

पाप के भागीदार

खंडेला गाँव से गौरी गंगोत्री नगर उच्च सिक्षा हेतु आई जहां उसने विवेकानंद महाविद्यालय में दांखिला लिया | तीन वर्ष की अध्ययन अवधि में उसकी सुनीला के साथ मित्रता ही नहीं, बल्कि परिवार के लोगो के साथ भी अच्छा परिचय हो गया | धीरे धीरे सुनीला का भाई धर्मेन्द्र गौरी को चाहने लगा | धर्मेन्द्र के पिताजी प्रोफ. सोमेंद्रनाथ टेगोर महाविद्यालय से सेवा निवृत होगये | उन्होंने होनहार लड़की देखकर गौरी के पिता से अपने लडके धर्मेन्द्र का रिश्ता करने का प्रस्ताव् किया, जो गौरी के पिता ने गौरी की भावनाओ को देखते…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 6, 2012 at 5:30pm — 6 Comments

मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

होता हूँ जब अकेला चुपके से आता है

मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

कभी बन आँखों में आँसू

कभी बन दिल में कसक

रातों को जगाने सपनों में

मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

मैं अपने गाँव का, गाँव मेरा है

उसके सपने सारे सपने मेरा है

होता हूँ जब अकेला चुपके से आता है

मुझे मेरा गाँव याद अब भी आता है

मैं अपने गाँव को सम्हालूँगा

मैं अपने सपनों को फिर से सजाऊंगा

टूटा हुआ तारा हूँ मैं जिस गाँव का

फिर से…

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Added by जगदानन्द झा 'मनु' on June 6, 2012 at 5:30pm — 12 Comments

बोलो न माँ ..........क्यों बेटियाँ बोझ होती हैं !

क़त्ल करना है तो सबका करो

मुझ अकेली को मारने से क्या होगा

अगर मिटाना है मेरी हस्ती को

तो सबको मिटाओ ..............

मुझ अकेली को मिटाने से क्या होगा ..............…

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Added by Sonam Saini on June 6, 2012 at 3:30pm — 12 Comments

दुश्मनों तुम सरहदों के पार मत देखा करो

दुश्मनों तुम सरहदों के पार मत देखा करो॥

आँख जल जाएगी ये अंगार मत देखा करो॥



ऐ मसीहा इस तरह बीमार मत देखा करो॥

आदमी में सिर्फ तुम आज़ार मत देखा करो॥…



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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 6, 2012 at 12:00pm — 6 Comments

संकुचित पर्यावरण हो रहा बाबाजी

यह जो शहरीकरण हो रहा बाबाजी

हरियाली का  हरण हो रहा बाबाजी



चीलें, कौए, चिड़ियाँ, तोते, तीतर संग

वनजीवन का…

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Added by Albela Khatri on June 6, 2012 at 12:00pm — 20 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघु कथा : ममता

                            चार दिन पहले ही तो सिन्हा साहब की नई चमचमाती कार आई थी, और आज सुबह घर में कोलाहल मचा हुआ है, पूछने पर पता चला कि सिन्हा जी के  बड़े लड़के  रवि  नें, गाड़ी सीखने के दौरान स्कूल जाते हुए एक विद्यार्थी पर गाड़ी चढ़ा दी थी | थोड़ी देर में रवि का छोटा भाई पिंकू आते हुए दिखा, सभी लोग उससे दुर्घटना के बाबत पूछताक्ष करने लगे |
                            सिन्हा जी नें घबराकर पूछा  "बेटा, रवि कैसा है ज्यादा चोट तो नहीं आई ?" नहीं पापा…
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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 6, 2012 at 10:30am — 25 Comments

दोहा मुक्तिका: पल पल हो मधुमास... --संजीव 'सलिल'

दोहा मुक्तिका:

पल पल हो मधुमास...

संजीव 'सलिल'

*

आसमान में मेघ ने, फैला रखी कपास.

कहीं-कहीं श्यामल छटा, झलके कहीं उजास..

*

श्याम छटा घन श्याम में, घनश्यामी आभास.

वह नटखट छलिया छिपे, तुरत मिले आ पास..

*

सुमन-सुमन में 'सलिल' को, उसकी मिली सुवास.

जिसे न पाया कभी भी, किंचित कभी उदास..

*

उसकी मृदु मुस्कान से, प्रेरित सफल प्रयास.

कर्म-धर्म का मर्म दे, अधर-अधर को हास.

*

पूछ रहा मन मौन वह, क्यों करता परिहास.

क्यों दे पीड़ा उन्हीं को,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on June 6, 2012 at 9:40am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पर्यावरण



कविताओं में बाँचिये , शीतल मंद समीर

शब्दों में ही बह रहा , निर्मल निर्झर नीर

निर्मल निर्झर नीर,हरा वसुधा का आँचल…

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Added by अरुण कुमार निगम on June 6, 2012 at 12:30am — 12 Comments

ये मदिरा है बहुत नशीली बाबाजी

तेज़ हवा और एक ही तीली बाबाजी

फिर भी हमने  बीड़ी पी ली बाबाजी



घर की सादी छोड़ के बाहर मत ढूंढो

रंग-रंगीली, छैल-छबीली बाबाजी…

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Added by Albela Khatri on June 5, 2012 at 8:00pm — 13 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
५-जून ( विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में)

५-जून ( विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में)

****************************************************
पर्यावरणिक तंत्र है, सात सुरों का राग.
भू, अम्बर, जल तत्व सब, अन्तः गर्भित भाग.
****************************************************
भूधर,जलधर, वायुधर,सब की बदली चाल.
जड़ चेतन सब कांपते, हो दूषित बदहाल.
****************************************************
क्षत विक्षत जल 'औ' धरा , बदल…
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Added by Dr.Prachi Singh on June 5, 2012 at 6:30pm — 12 Comments

जब भी जिंदगी को सोचता हूँ

भंगुरता सी प्रतीत हो रही

जब भी जिंदगी को सोचता हूँ

रोज की जद्दोजहद में फंसा मैं

मस्तिष्क पटल को नोचता हूँ

उतार चढ़ाव से उतना नहीं परेशान

लेकिन कुछ छूट रहा सा लग रहा है

डग लम्बे भर रहा लेकिन

मंजिल और दूर सी लग रही है

बहुत हिम्मत करके कभी कभी

आँगन में नए पौधे लगाता हूँ

बिखरे हुए सपनो को सामने करके

नयी दिशा को पग बढ़ाता हूँ

लेकिन परिवार और समाज में बंधा

मुल्ला की…

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Added by AJAY KANT on June 5, 2012 at 5:30pm — 4 Comments

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