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"ग़ज़ल" शाम अब ढलने लगी है या सबेरा हो गया

इक ग़ज़ल पेशेखिदमत है दोस्तों 



उड़ गयी चिड़िया सुनहरी क्या बसेरा हो गया

देखते ही देखते बाजों का डेरा हो गया



कुर्बतों में मिट गयी तहजीब की दीवार यूँ

आपका कहते थे जो अब तू औ तेरा हो गया



कागजी टुकड़े खुदा हैं और उनके नूर से

बंद…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 22, 2012 at 4:00pm — 11 Comments

आज मैं चुप नहीं रहूंगी /कहानी

वो हडबडा कर उठ बैठी , तेज़ गति से चलतीं साँसें ,पसीने से भीगा माथा,थर-थर कांपता शरीर उसकी मनोदशा बयान कर रहे थे I वो बार-बार बचैनी से अपना हाथ देख रही थी I अकबका कर तेज़ी से उठी और बाथरूम की तरफ भागी I कई बार साबुन से हाथ धोया, उसकी धड़कने अभी भी तीव्र गति से चल रहीं थीं, शरीर अभी भी काँप रहा था I बेडरूम में वापस न जाकर ड्राइंग रूम में बिना…

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Added by seema agrawal on December 22, 2012 at 3:00pm — 13 Comments

महिला उत्पीडन -कारण और निवारण

 
नारी  शब्द की ही क्यों बात करे, लड़की हो, महिला हो, स्त्री हो, पर अकेली हो, तो जो आकर्षण होता है, यह सर्व विदित है। 
यह इस समस्या के मूल में है । कैसा आकर्षण बनाया है नियति ने । जब आकर्षण होता है, मन लालायित होता है और 
भोग की वस्तु की तरह मन टूट पड़ता है । या तो सन्यासी जीवन हो, या फिर शिक्षा व्यवस्था प्राचीन…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 22, 2012 at 11:00am — 18 Comments

ग़ज़ल ....

"
अपनी कमजोरियों का शिकार आदमी,

बस दलीलों से है ज़ोरदार आदमी..



बारहा माफ़ करता रहे, वो खुदा,

गलतियां जो…
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Added by rajneesh sachan on December 21, 2012 at 4:40pm — 14 Comments

मेरा रस्‍ता रोक रही हैं/तेरी ही बातें अक्‍सर

कटु-मधु
कुछ भींगी यादें
लेकर आई
हर दुपहर
ढूंढा जब भी
नया ठिकाना
पहुंच गई
लेकर नश्‍तर

कमतर जिनको आंक रहे थे
कर गए आज मुझे बेघर

घुटने भर की
आशा लेकर
उड़ा विहग
जब भी खुलकर
काली स्‍याही
लेकर दौड़े
लिए पंख
धूसर-धूसर

हमने जिनको गले लगाया
कर गए वे जीना दूभर

Added by राजेश 'मृदु' on December 21, 2012 at 2:00pm — 6 Comments

उठे दर्द जब - उमड़े समंदर

लगी आग जलके, हुआ राख मंजर,

जुबां सुर्ख मेरी, निगाहें सरोवर,

लुटा चैन मेरा, गई नींद मेरी,

मुहब्बत दिखाए, दिनों रात तेवर,

सुबह दोपहर हर घड़ी शाम हरपल,

रही याद तेरी हमेशा धरोहर,…

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Added by अरुन 'अनन्त' on December 21, 2012 at 11:09am — 12 Comments

"पाषाण"

कहने को तो चाँद तारे,

आसमा की चादरों से

जड़ के सलमा और सितारे

हम को ये भरमा के हारे

"हैं तो ये पाषाण ही ना "

नदियों का तट चाँद मद्धिम

सूर्य की आभा हुयी कम ,

सतह जल की तल निहारे

चांदनी की परत डारे

"तल में बस पाषाण ही ना"

ह्रदय कोमल, मन सु-कोमल

त्वरित धडका, दौड़ता सा

पागलों की भाँती चाहा

फिर भी उसका मन न…

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Added by SUMAN MISHRA on December 21, 2012 at 2:00am — 3 Comments

शैतान हँस रहा है

लड़की चीख़ी

चिल्लायी भी

मगर हैवानों के कान बंद पड़े थे

नहीं सुन पाये

उसकी आवाज़ का दर्द

 

वह रोयी बहुत

आँखों से उसके

झर-झर आँसू…

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Added by नादिर ख़ान on December 21, 2012 at 12:24am — 2 Comments

कृषक

कृषक  

---------

कृषि प्रधान भारत अपना फसलों की बहार है 

भूख कुपोषण जन है मरते कैसा पालन हार है 

खेत से खलिहान तक फैली  जिसकी सरकार है

उसका तो बस नाम मात्र  ईश्वर पालन हार है  

काट रहा निश दिन अपने स्वेदाम्बू लिए माथ है 

हाथ न आये लाभ उसे कछु भूख मात्र साथ है 

काढ़े कर्ज उत्पादन करते सेठ भरे तिजोरी है 

बच्चे उसके भूखे  मरते शासन की कमजोरी…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on December 20, 2012 at 3:47pm — 13 Comments

अब और विलम्ब न चाहते

 
जहाँ पूजित है नारी वहां फिर क्यों शर्मसार हुई है,
स्वच्छंद विचरण का क्या उसको अधिकार नहीं है ।
जहाँ वोटों के राजनीति, गुण्डों की तूती बजती है,
पंगु है क़ानून व्यवस्था, जो हमको बेहद खलती है  ।…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 20, 2012 at 3:46pm — 8 Comments

व्यंग्य - ‘ऐरे-गैरे’ की प्रतिक्रिया

एक बात तो है, जो ‘आम’ होता है, वही ‘खास’ होता है। अब देख लीजिए ‘आम’ को, वो फलों का ‘राजा’ है। नाम तो ‘आम’ है, मगर पहचान खास में होती है। हर ‘आम’ में ‘खास’ के गुण भी छिपे होते हैं। जो नाम वाला बनता है, एक समय उन जैसों का कोई नामलेवा नहीं होता। जैसे ही कोई उपलब्धि हासिल हुई नहीं कि ‘आम’ से बन जाते हैं, ‘खास’।

देख लीजिए, हमारे क्रिकेट के महारथी, कुल कैप्टन को। जब वे क्रिकेट की दहलीज पर कदम रखे तो उन्हें कोई नहीं जानता था, उनकी बस इतनी ही पहचान थी, जैसे वे आजकल बोले जा रहे हैं, ‘एैरे-गैरे’…

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Added by rajkumar sahu on December 20, 2012 at 2:53pm — 1 Comment


सदस्य कार्यकारिणी
री तू क्यूँ जिन्दा है ??

लिखी गई फिर पल्लव पर नाखून से कहानियां   

खिलखिलाई गुलशन में नृशंसता की निशानियां  

छिपे शिकारी जाल बिछाकर ,चाल समझ में आई 

उड़ती चिड़िया ने नभ से न  आने की  कसमें खाई 

बिछी नागफनी देख बदरिया मन ही मन घबराई 

गर्भ से निकली ज्यों ही बूँदे,  झट उर से चिपकाई 

सकुचाई ,फड़फडाई तितली देख देख ये सोचे 

कहाँ छिपाऊं पंख मैं अपने कौन कहाँ कब नोचे 

देख  सामाजिक ढांचा…

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Added by rajesh kumari on December 20, 2012 at 11:30am — 22 Comments

"आहट"

हर धड़कन एक आहट जैसी,

वो जो खोया कहीं मिलेगा ,

हर चेहरे में छाया उसकी ,

नहीं नहीं ये वो तो नहीं है .



क्यों हर कविता प्रेम ग्रन्थ सी

क्यों शब्दों में इन्तजार है,

दर्द नहीं बस आकुलता सी

नहीं नहीं ये नेह नहीं है.



खोना पाना , पाना खोना ,

जीवन की ये परिपाटी सी

कुछ मिलता है खोकर देखो

कुछ मिलने से…

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Added by SUMAN MISHRA on December 19, 2012 at 6:30pm — 10 Comments

क्रोध

क्रोध

 

अशांत करता है,परेशान करता है,

पटरी पर चल रही जिंदगी को,

पटरी से उतार देता है, क्रोध ।

 

बुद्धि नष्ट करता है,ज्ञानहीन बनाता है,

संयम को नष्ट करके,

गरिमा को खत्म करता है, क्रोध ।

 

बना काम बिगाड़ता है,संबंध खराब करता है,

वर्षों की मेहनत को क्षण में बरबाद करता है,

प्रेम में जहर भर देता है, क्रोध ।

 

हृदय जलाता है,रोग पैदा…

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Added by akhilesh mishra on December 19, 2012 at 5:30pm — 2 Comments

गीत: नया वर्ष है... संजीव 'सलिल'

गीत:

नया वर्ष है...

संजीव 'सलिल'

*

खड़ा मोड़ पर आकर फिर

एक नया वर्ष है...

*

कल से कल का सेतु आज है यह मत भूलो.

पाँव जमीं पर जमा, आसमां को भी छू लो..



मंगल पर जाने के पहले

भू का मंगल -

कर पायें कुछ तभी कहें

पग तले अर्श है.

खड़ा मोड़ पर आकर फिर

एक नया वर्ष है...

*

आँसू न बहा, दिल जलता है, चुप रह, जलने दे.

नयन उनीन्दें हैं तो क्या, सपने पलने दे..



संसद में नूराकुश्ती से

क्या पाओगे?

सार्थक तब जब आम…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 19, 2012 at 2:03pm — 7 Comments

(फाँसी से कम नहीं )

(फाँसी  से कम नहीं )





इन्हें फाँसी  पर लटका दो 

या गोलियों से मरवा दो 

बलात्कारियों की रूह काँप जाए 

इन्हें ऐसी कड़ी सजा दो 

इन दरिंदों को जिंदा न छोड़ो 

पहले इनके हाथ पाँव तोड़ो 

जिंदा सूली पर लटका दो 

लाश चील कव्वों को खिला दो 

इनके घिनोने जुर्म की 

और सज़ा  न कोई 

शर्मसार है भारत माँ 

माएँ फूट फूट कर रोई

हद कर दी हैवानियत की 

जली होली  इंसानियत की

कड़े कर दो कानून नियम 

जलाओ चिता शैतानियत…

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Added by Deepak Sharma Kuluvi on December 19, 2012 at 12:34pm — 4 Comments

सब बिकाऊ हे

सब बिकाऊ हे





बाज़ार में आज सब बिक रहा है 

होता हे कुछ और कुछ दिख रहा है

दाम हो तो बोली लगाओ चाँद की

आसमान भी शर्म से अब झुक रहा है

बाज़ार में आज--------------



ईमान बिक रहा हे जमीर बिक रहा है

मजहव के नाम पर दाँव फिक रहा है

सम्मान की तो सरेआम होती नीलामी

सदभाव बहा देती सम्प्रदायिकता की सुनामी

बाजारू दलाल फलफूल रहा है

बाज़ार में आज-----------



बदन बिक रहा हे सदन बिक रहा है

लोकतंत्र की नई परिभाषा लिख रहा…

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Added by Dr.Ajay Khare on December 19, 2012 at 12:00pm — 2 Comments

मुझको "तुम्हारी" ज़रूरत है!

मुझको "तुम्हारी" ज़रूरत है!





दूर रह कर भी तुम सोच में मेरी इतनी पास रही,

छलक-छलक आई याद तुम्हारी हर पल हर घड़ी।

पर अब अनुभवों के अस्पष्ट सत्यों की पहचान

विश्लेषण करने को बाधित करती अविरत मुझको,

"पास" हो कर भी तुम व्यथा से मेरी अनजान हो कैसे

या, ख़्यालों के खतरनाक ज्वालामुखी पथ पर

कब किस चक्कर, किस चौराहे, किस मोड़ पर

पथ-भ्रष्ट-सा, दिशाहीन हो कर बिखर गया मैं

और तुम भी कहाँ, क्यूँ और कैसे झर गई…

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Added by vijay nikore on December 19, 2012 at 12:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल - शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है !

यहाँ की भागा दौड़ी में वो बेफ़िक्री ही  भाती  है ,
शहर की रोशनी में गाँव की ढिबरी बुलाती है ।



बनावट वाली राधाओं को उनके कृष्ण कब मिलते ,
वो तो मीरा के होते हैं जो उनको मन में गाती है ।


सिमटना दायरों में और बातें चाँद से करना ,
ये करता हूँ जो माँ मुझको तुम्हारी  याद आती है ।


पिता की डांट से गुमसुम जो बैठी थी उदासी में ,
लिपटकर माँ के आँचल से वो बच्ची खिलखिलाती है…
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Added by Abhinav Arun on December 19, 2012 at 9:48am — 28 Comments

नवगीत: अब तो अपना भाल उठा... संजीव 'सलिल'

नवगीत:

अब तो अपना भाल उठा...

संजीव 'सलिल'

*

बहुत झुकाया अब तक तूने 

अब तो अपना भाल उठा...

*

समय श्रमिक!

मत थकना-रुकना.

बाधा के सम्मुख

मत झुकना.

जब तक मंजिल

कदम न चूमे-

माँ की सौं

तब तक

मत चुकना.



अनदेखी करदे छालों की

गेंती और कुदाल उठा...

*

काल किसान!

आस की फसलें.

बोने खातिर

एड़ी घिस ले.

खरपतवार 

सियासत भू में-

जमी- उखाड़

न न मन-बल फिसले.

पूँछ दबा शासक-व्यालों की…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 19, 2012 at 9:36am — 9 Comments

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