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बहकाती है क्यूँ जिंदगी...? ©

 

बहकाती है क्यूँ जिंदगी...? ©



शुरू में गज़ल सी , फिर भटकती लय है क्यूँ जिंदगी......

हर रंग भरा इसमें तुमने , सवाल सी है क्यूँ जिंदगी.......

ज़वाब दिए खुद तुम्हीं ने , फिर अधूरी है क्यूँ जिंदगी.....

माना है डगर कठिन , कदम बहकाती है क्यूँ जिंदगी.....

मंजिल का पता नहीं पर , राह भटकाती है क्यूँ जिंदगी.....



Photography & Creation by :- जोगेन्द्र सिंह…

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Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on December 21, 2010 at 11:30pm — 6 Comments

तुम जो साथ हो ...

 

कहा किसी ने 'बहुत ख्वाब सजाती हो तुम.
ज़िंदगी को भी सजाना सीखो.
नुस्खे जितने बताती हो ज़िंदगी जीने के,…
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Added by Lata R.Ojha on December 21, 2010 at 11:30pm — 5 Comments


प्रधान संपादक
बलात्कार (लघुकथा)

"क्या यह बात सच है कि कल तुम्हारी बेटी से बलात्कार किया गया ?"
"हाँ साहब, कल शाम खेतों से लौटते हुए मेरी बेटी की इज्ज़त लूटी गई !"
"क्या तुम जानते हो कि दोषी कौन है !?"
"मैं ही नही साहब, सारा गाँव जानता है उस पापी को जिसने मेरी बेटी को बर्बाद किया है !"
"मगर इतनी बड़ी बात होने के बावजूद भी तुमने थाने जाकर रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवाई ?"
"क्योंकि मैं अपनी बेटी का सामूहिक बलात्कार नही चाहता था ! "

Added by योगराज प्रभाकर on December 21, 2010 at 4:30pm — 24 Comments

सच्चाई सूरत लेगी एक दिन

सच्चाई सूरत लेगी एक दिन

माटी मूरत होगी एक दिन



क्यों भागता है यों रूठकर तू मुझसे

मुझे तेरी जरूरत होगी एक दिन



कभी राज अपने भी बतलाऊंगा तुझे

जो सुनने कि फुरसत होगी तुझे एक दिन



क्यों लगाया है मन तूने में चोखट पे

खुद तेरे दर पे आऊंगा बनके जोगी एक दिन



बहुत ठोकरें खाई हैं तूने इन राहों में

कभी मंजिल भी दिखलाऊंगा तुझे एक दिन



बहता पानी है तू चलाती है ये ज़मीं तुझे

बहते बहते समुन्दर बन जायेगा तू एक दिन



गम ना…

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Added by Bhasker Agrawal on December 21, 2010 at 3:51pm — 1 Comment

गीत: निज मन से हांरे हैं... -- संजीव 'सलिल'

गीत:

निज मन से हांरे हैं...

संजीव 'सलिल'

*

कौन, किसे, कैसे समझाये

सब निज मन से हारे हैं.....

*

इच्छाओं की कठपुतली हम

बेबस नाच दिखाते हैं.

उस पर भी तुर्रा यह, खुद को

तीसमारखां पाते हैं.

रास न आये सच कबीर का

हम बुदबुद-गुब्बारे हैं.....

*

बिजली के जिन तारों से

टकरा पंछी मर जाते हैं.

हम नादां उनका प्रयोग कर,

घर में दीप जलाते हैं.

कोई न जाने कब चुप हों

नाहक बजते इकतारे हैं.....

*

पान, तमाखू,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 21, 2010 at 12:00am — 5 Comments

कैसा है यह नाते पर नाता..? Copyright ©

 

कैसा है यह नाते पर नाता..? Copyright ©



निकल कर देखा.. अपनी माँ के उदर से उसने,

अनजानी.. कुछ मिचमिचाती अपनी आँखों से,

सारा जहान था दिख रहा अजनबी सा उसको,

लग रही माँ भी उसकी.. अजनबी सी उसको,

बना फिर इक नया.. माँ से पहचान का नाता,

फिर भी अकसर.. क्यूँ लगती माँ अजनबी सी,

गोद…

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Added by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on December 20, 2010 at 9:30pm — 2 Comments

हैं तुझपे नाज आज जो तुने कर दिया ,

हैं तुझपे नाज आज जो तुने कर दिया ,
हार हुई मगर तुने दर्द किनारा कर दिया ,
जय हो तेरी जय हिंदुस्तान की हो ,
सतकबीर जय तेरी उस धार की हो ,

Added by Rash Bihari Ravi on December 20, 2010 at 5:43pm — No Comments

घनाक्षरी : जवानी --संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी :

जवानी

संजीव 'सलिल'

*

१.

बिना सोचे काम करे, बिना परिणाम करे, व्यर्थ ही हमेशा होती ऐसी कुर्बानी है.

आगा-पीछा सोचे नहीं, भूल से भी सीखे नहीं, सच कहूँ नाम इसी दशा का नादानी है..

बूझ के, समझ के जो काम न अधूरा तजे- मानें या न मानें वही बुद्धिमान-ज्ञानी है.

'सलिल' जो काल-महाकाल से भी टकराए- नित्य बदलाव की कहानी ही जवानी है..

२.

लहर-लहर लड़े, भँवर-भँवर भिड़े, झर-झर झरने की ऐसी ही रवानी है.

सुरों में निवास करे,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 20, 2010 at 5:00pm — 1 Comment

GHAZAL - 17

                  ग़ज़ल



प्रश्न   मेरे  सामने  यह   एक   अन्धा   सा   कुआँ    है |

क्या हुआ जो दोस्त था कल आज वो दुश्मन  हुआ  है ||



जिसने  दी  थी  कल  खुशी, वो  आज  आँसू दे रहा,

ये   न  जाने   किसकी   मेरे   वास्ते एक …

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Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on December 20, 2010 at 3:00am — 2 Comments

क्यों आज भी.....???

मैं भी कुछ लफ्ज़ तेरे बारे कह दूँ,

शायद तब दो घड़ी सुकून आए..…
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Added by Lata R.Ojha on December 20, 2010 at 12:30am — 2 Comments

भेड़ चाल

माहिर होते है
भेड़ और गधे
एक लीक एक चलने में //

सुना है ---
अगर एक भेड़ कुए में गिरा
सब भेड़ उसी में गिरेंगे //

आज ----
कंक्रीट के जंगल में
रहनेवाला मानव
इसी भेडचाल की नक़ल तो कर रहा //

Added by baban pandey on December 19, 2010 at 5:49pm — 2 Comments

GAZAL ग़ज़ल by अज़ीज़ बेलगामी

 

ग़ज़ल

by

अज़ीज़ बेलगामी

 

हम समझते रहे हयात गयी

क्या खबर थी बस एक रात गयी



खान्खाहूँ से मैं निकल आया

अब वो महदूद काएनात…

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Added by Azeez Belgaumi on December 19, 2010 at 4:00pm — 22 Comments

विकीलिक्स ये भी बताएं

अमेरिकी वेबसाइट विकीलिक्स के क्या कहने, वह सब कुछ जानती है। किसने, किसके बारे में क्या कहा, उसे सब कुछ पता है। दुनिया में आज हर किसी की नजर जूलियन असांज की वेबसाइट पर टिक गई हैं, क्योंकि वह एक के बाद एक खुलासे करती जा रही है। बीते कुछ दिनों से ऐसा कुछ माहौल बन गया है कि जैसे कोई कुछ बता सकता है तो वह है, विकीलिक्स। यही कारण है कि मेरा भी ध्यान विकीलिक्स पर है कि अब वे क्या खुलासा करने वाली है ? वैसे विकीलिक्स, जो भी भीतर की बात बता रही है, उससे इन दिनों बड़े चेहरे माने जाने वाले कइयों की पाचन…

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Added by rajkumar sahu on December 19, 2010 at 1:09pm — No Comments

GHAZAL - 16

                    ग़ज़ल



रात - रात  भर  सोते - जगते,  मैंने   उसे   मनाया   है |

फिर भी खुदा न मेरा अब तक, सिर  सहलाने  आया है ||



कहते हैं- मालिक ने हमको, तुमको, सबको, जन्म दिया,

पर  लगता  है - कोई  वो पागल था जिसने भरमाया है ||



एक …

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Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on December 19, 2010 at 12:00am — 2 Comments

लघुकथा: काफिला -- संजीव वर्मा 'सलिल'

लघुकथा:



काफिला



संजीव वर्मा 'सलिल'

*

कें... कें... कें...



मर्मभेदी कटर ध्वनि कणों को छेड़ते एही दिल तक पहुँच गयी तो रहा न गया.बाहर निकलकर देखा कि एक कुत्ता लंगड़ाता-घिसटता-किकयाता हुआ सड़क के किनारे पर गर्द के बादल में अपनी पीड़ा को सहने की कोशिश कर रहा था.



हा...हा...हा...



अट्टहास करता हुआ एक सिरफिरा भिखारी उस कुत्ते के समीप आया ... अपने हाथ की अधखाई रोटी कुत्ते की ओर बढ़ाकर उसे खिलाने और सांत्वना देने की कोशिश करने लगा. तभी खाकी…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 19, 2010 at 12:00am — 5 Comments

नवगीत: मुहब्बत - संजीव 'सलिल'

नवगीत:                                                                    

मुहब्बत



संजीव 'सलिल'

*

दिखाती जमीं पे

है जीते जी

खुदा की है ये

दस्तकारी मुहब्बत...

*

मुहब्बत जो करते,

किसी से न डरते.

भुला सारी दुनिया

दिलवर पे मरते..



न तजते हैं सपने,

बदलते न नपने.

आहें भरें गर-

लगे दिल भी कंपने.

जमाना को दी है

खुदा ने ये नेमत...

*

दिलों को मिलाओ,

गुलों को खिलाओ.

सपने न…

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Added by sanjiv verma 'salil' on December 18, 2010 at 11:21pm — 1 Comment

कहानी : -ये कहानी नहीं

..एक व्यथा ...कथा नहीं यह

नीलेश और रोमा आज कुछ जल्दबाजी में थे |कल रात को भी नीलेश अपनी ड्यूटी कुछ जल्दी छोड़कर घर आ गया था |और भोर से ही रोमा…

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Added by Abhinav Arun on December 18, 2010 at 10:00pm — 5 Comments

GHAZAL - 15

                   ग़ज़ल



मैं   दर्दों   का   समंदर   हूँ,  ग़मों  का  आशियाना   हूँ |

मैं  जिंदा  लाश  हूँ , बीमार  दिल , घायल  फसाना हूँ ||



बदन  पर  ये  हजारों  ज़ख्म, तोहफे  हैं  ये  अपनों के,

मैं  जिनके  प्यार  का  बीमार, आशिक हूँ , दिवाना हूँ ||…



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Added by Abhay Kant Jha Deepraaj on December 18, 2010 at 9:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल :- आदमी हो कि आदमी भी नहीं

ग़ज़ल :- आदमी हो कि आदमी भी नहीं

 

तुझसे बर्दाश्त ये खुशी भी नहीं

घाट पर पूजा बंदगी भी नहीं |

 

जिसने बम फोड़ा उसका मकसद क्या

हम करें माँ की आरती भी नहीं |

 

स्वस्तिका पूछ रही है मरकर

आदमी हो की आदमी भी नहीं |

 

फाइलों की…

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Added by Abhinav Arun on December 18, 2010 at 8:30pm — 2 Comments

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