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रफ्तार (चार मुक्तक)

उजाला चाहते हैं वज्म में खुद जलना होगा,

सफर तय करना है तो गिर कर सम्भलना होगा।

इतनी आसानी से मंजिल नहीं मिलती यारों,

जिन्दगी की रफ्तार को कुछ बदलना होगा॥



मंहगाई की रफ्तार यूँ बढ़ती जा रही है,

इसी के इर्द- गिर्द दुनिया सिमटती जा रही है।

तिस पर ये बेरोजगारी घोटाले और लूट,

ये जिन्दगी इक दलदल में बदलती जा रही है॥



सुना है उसने एक नई कार खरीद ली,

समझता है जिन्दगी में रफ्तार खरीद ली।

पर क्या पता उस नादान अहमक को,

अपने पाले में मुसीबत… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 13, 2013 at 9:03pm — 9 Comments

बेशक उसका जन्म हुआ है

बेशक उसका जन्म हुआ है

मंदिर में स्थापित देवताओं को

दूर से प्रणाम करने…

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Added by anwar suhail on April 13, 2013 at 8:40pm — 12 Comments


मुख्य प्रबंधक
अंतर्द्वंद्व // गणेश जी "बागी"

ठगती है,

बार बार,

अंतरात्मा,

आश्वासनों से,

ठीक हो जाएगा,

सब ठीक हो जाएगा,

एक अंतर्द्वंद्व,

सत्य असत्य,

दिल दिमाग़ के मध्य,

नही डिगेगा,

कभी नही डिगेगा,

चलते जाना है,

सत्य के मार्ग पर,

जो घटित होना है,

हो जाय,

कौन अमर यहाँ,

कोई नही,

कोई भी तो नही,

फिर डर कैसा,

उस अहंकार से,

जो क्षण भंगुर है,

चल हट !

चलने दे,

कार्य पथ पर बढ़ने दे,

वो सामने देख…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 13, 2013 at 8:00pm — 38 Comments

वह सड़क बंद है

हर तरफ खौफनाक सन्नाटा

कहीं कोई आवाज नहीं

हालांकि दर्द हदों को छू गया।

 

जिंदगी

दरकने लगी है

तप रही है जमीन,

पानी की बूंद

गायब हो जाती…

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Added by बृजेश नीरज on April 13, 2013 at 6:00pm — 26 Comments

नारी तू नहीं है अबला

नारी तू नहीं है अबला

--------------------

नारी तू नहीं है अबला 

है शक्ति  स्वयं पहचान 

खुद  को शोषित  मान  ले 

फिर  कौन  करे  सम्मान 

दूषित  जग  से लड़ना होगा

खुद  ही आगे बढ़ना…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 13, 2013 at 6:00pm — 25 Comments

कुण्डलियां

कुण्डलियां

सुधार के बाद पुनः प्रस्तुत

हॅसी हुदहुद खंजन से, पिकहु कूक रहि जाय।

बुलबुल मैना खग गुने, सुगा भी टेटियाय।।

सुगा भी टेटियाय, काग कांव कांव करता।

चातक बया तिलेर, टिटेहरी टेर कसता।।

बगुला रखता मौन, हंस गौरैया सरसीं।

मयूर बुलाय कौन, खिलखिल सब चिडि़यां हॅसीं।।

के0पी0सत्यम/मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 13, 2013 at 2:30pm — 15 Comments

जान हथेली पर ले चलते , भारत माँ के वीर जवान |

जागे रहते वीर जवान | 
जान हथेली पर ले चलते , भारत माँ के वीर जवान |
देश दुनिया शांती चाहते , मेरा देश कितना  महान |
छुप छुप कर बैरी वार करें , मुश्किल में दे देते जान |
सात समुंदर…
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Added by Shyam Narain Verma on April 13, 2013 at 11:43am — 9 Comments

तुमको पाया मानो मैंने नया जन्म पाया

शादी की प्रथम सालगिरह की पूर्व संध्या में अपनी जीवन संगिनी को समर्पित एक रचना



शाम सुहानी रात दीवानी दिवस एक लाया

तुमको पाया मानो मैंने नया जन्म पाया



मन में अंतर्द्वंद बहुत था कैसा होगा वो

सपने देखे जैसे मैंने वैसा होगा वो

या नाज़ुक सुंदर फूलों के जैसा होगा वो

छुईमुई सा शरमाएगा क्या ऐसा होगा वो



तभी सामने इक सुंदर सा चाँद निकल आया

तुमको पाया मानो मैंने नया जन्म पाया



हाथ में सुन्दर वरमाला औ तुम थी सकुचाई

धीरे धीरे पग रख रख… Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 12, 2013 at 6:50pm — 29 Comments

माँ , याद तुम्हारी

याद तुम्हारी , कितनी प्यारी ,

धीरे-धीरे मन के आँगन में ,

चुपके से आ जाती हे |



याद तुम्हारी , बड़ी दुलारी ,

आँखों  से  , अंतर मन को ,…

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Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 12, 2013 at 6:00pm — 15 Comments

सागर में भी तडपे मछली , जब लहरों में फँस जाये |

जाल में पडी मछली रोये -कविता |
सागर में भी तडपे मछली , जब लहरों में फँस जाये |
जाल डाले आते शिकारी , फिर उनसे कौन बचाये |
साथ  नहीं देता जब कोई , फिर आशा कौन दिलाये |
जब फँस गयी…
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Added by Shyam Narain Verma on April 12, 2013 at 3:14pm — 8 Comments

मालिक सबका एक है (दोहा छंद)

मालिक सबका एक है, खुदा गॉड भगवान।

धर्म पंथ में बांटकर, भटक गया इंसान॥



निराकार साकार ही, दोनों ईश्वर रूप।

देह और छाया सदृश, संग-संग हैं धूप॥



सूरज तारे चांद सब, सगुण ईश के रूप।

नियति नियम निर्गुण कहें, अद्भुत भव्य अनूप॥



ईश प्राप्ति निज खोज है, खोज सके तो खोज।

मोह निशा से घिर मनुज, बाहर भटके रोज॥



आत्मरूप में जाग नर, भटक नहीं अन्यत्र।

तुझ में ईश्वर ईश तू, तू ही तू सर्वत्र॥



धूम- अग्नि दिन- रात से, सुख से दुख… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on April 12, 2013 at 1:04pm — 18 Comments

घनाक्षरी प्रथम प्रयास

सीस झुके है सबके ,करते हुए वन्दना

लोग न अघाते माता, माता बोले जाते है!

जिस ओर देखो उस, ओर दिखती है भीड़,

मन में कामना लिए, ध्यान किये जाते है!!

पल भर अपने को ,सब भूल जाते यहाँ ,

पूजन में लीन सब, कष्ट भूल जाते है !

जान…

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Added by ram shiromani pathak on April 12, 2013 at 1:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रज्ञा पुंज (घनाक्षरी)

  

हिंदी भाषा के शिंगार  रस छंद अलंकार 

नव शब्द माल लेके गीत तो बनाइए 

 संधि प्रत्यय समास, हों मुहावरे भी ख़ास  

भाव रंगों  में डुबो के कविता  रचाइए 

गीत या निबन्ध हो नवल भाव  सुगंध हो 

साहित्य सरोवर में डुबकी  लगाइए 

विद्या वरदान मिले लेखनी को मान मिले 

अपनी राष्ट्र भाषा का मान तो बढाइए 

 

 

भाव गहन बढे जो ध्यान नदिया चढ़े जो 

लेखनी की नाव लेके पार कर जाइये 

ह्रदय में प्रकाश हो मुट्ठी भरा आकाश…

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Added by rajesh kumari on April 12, 2013 at 12:22pm — 16 Comments

कुण्डलियां

कुण्डलियां



ःः.1.ःः

मन्दिर-मन्दिर नेम से, पाथर  पूजा  जाय।

दीन दलित असहाय को, चोर समझ डपटाय।।

चोर समझ डपटाय, तनिक न रहम करत हैं।

लातन से लतियाय, पुलिस का काम करत हैं।।

बालक रो बतलाय, साब! कस बांधत जन्जिर।

रोटी हित दर आय, समझ दाता का मन्दिर।।



ःः.2.ःः

पोलिस थाना जान ले, आफत का घर होय।

रपट लिखाये जात हैं, मिले दुःख बहु रोय।।

मिले दुःख बहु रोय, समझ ना पावत कुछ हैं।

दारोगा  जी  सोय, दीवान  मांगत  कुछ हैं।।

उठ  दरोगा  डपटे, सबसे…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 12, 2013 at 11:06am — 8 Comments

जीवनशैली

  जीवनशैली 

उन्हीं रास्तों पर चलते चलते

ना जाने क्यूँ मन उदास हो गया

सोचने लगी दिखावों के चक्कर में

जीवन कितना एकाकी हो गया

संपन जीवनशैली के बावज़ूद

इसमें सूनापन भर गया है

 

मैंने ड्राईवर से कहा –

क्या आज कुछ नया दिखा सकते हो

जो मॉल या क्लबों जैसी मशीनी ना हो

जहाँ जिंदगी साँस ले सकती हो

जो अपने जहाँ जैसी लगती हो

 

ड्राईवर बोला –

मैडम है एक जगह ऐसी

पर वो नहीं है आपके…

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Added by vijayashree on April 12, 2013 at 9:00am — 20 Comments

दे शारदे वरदान.

चक्र घंटा शूल मूसल, धर धनुष अरु बान,

शंख साजे हाथ गौरी, शीत चन्द्र समान |

 

शुंभ दलना मात शारद, सृष्टि जननी जान,

है नमन माता चरण में, मात दें वरदान ||

 

कर कमल अरु अक्षमाला, विश्व ध्यावे मात,   …

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Added by Ashok Kumar Raktale on April 12, 2013 at 7:00am — 13 Comments

इंसान

जीतने के सौ तरीके खोजने वाले,

ग्लूकान-डी के सहारे

सूरज से लड़ने वाले हम इंसान

उजले सच को भी बर्दाशत नहीं कर पाते



प्रकृति पर विजय की लालसा लिए,

हम इंसान

पर्वत विजय का जश्न मनाते हैं,

इंगलिश चैनल को तैर कर पार करते हैं,

भू-गर्भ की गहराइयों को 'मीटर' में नापते हैं, 

'मीटर' के ऊपर के सारे पैमाने जाने कहाँ चले जाते हैं उस समय !!!



चाहते हैं,

चाँद पर खेती करें,

मंगल पर पानी मिल जाए,

नए तारों की खोज में ,

हमने…

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Added by वीनस केसरी on April 12, 2013 at 12:52am — 10 Comments

ग़ज़ल : इश्क जब इम्तेहान लेता है

मिसरों का वज़्न : २१२२ १२१२ २२ (११२२ १२१२ २२ की छूट ली जा सकती है)

---------------------------------------- 

अच्छे अच्छों की जान लेता है

इश्क जब इम्तेहान लेता है

 

बात सबकी जो मान लेता है

छोड़ सबकुछ मसान लेता है

 

वही जीता है इस नगर में जो

बेचकर घर दुकान लेता है

 

फन वो देता है जिसको भी सच्चा

पहले उसका गुमान लेता है

 

ये निशानी है खोखलेपन की

खुद को खुद ही बखान लेता है

 

जब भी…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 11, 2013 at 9:30pm — 14 Comments

वफ़ा ए इश्क़

वफ़ा ए इश्क़ इस तरह इज़हार करते हैं ,

हम ही से सीख , हम पे वार करते हैं , 

अहमक समझता हे ज़माना , मुस्तकिल तौर पे,

हम उनसे प्यार और वो इनकार करते  हैं ,

कब ज़नाज़ा मेरे अर्मा का दर से उनके निकले,

फक्र हे हर वक़्त यही इंतज़ार करते हैं…

Continue

Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 11, 2013 at 8:00pm — 8 Comments

बाबू मैं बाजारू हूं

ना मैं बेटी ना ही मां हूं

केवल रैन गुजारू हूं

रम्‍य राजपथ, नुक्‍कड़ गलियां

सबकी थकन उतारू हूं

बाबू मैं बाजारू हूं ........बाबू मैं बाजारू हूं

अंधेरे का ओढ़ दुशाला

छक पीती हूं तम की हाला

कट-कट करते हैं दिन मेरे

रिस-रिस रात गुजारूं हूं

बाबू मैं बाजारू हूं ........बाबू मैं बाजारू हूं

जात-पात का भेद ना मानूं

ना अस्ति ना अस्‍तु जानूं

घुंघरू भर अरमान लिए मैं

सबका पंथ बुहारू…

Continue

Added by राजेश 'मृदु' on April 11, 2013 at 6:05pm — 33 Comments

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