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लो अब तुम्हारी राह मे दीवार हम नहीं।

तुमने उठाई राह मे दीवार हम नहीं

फिर भी कह रहे हो गुनहगार हम नहीं।



उम्मीद कर रहा हूँ वफ़ा की उन्ही से मैं

कहते हैं जो किसी के तलबग़ार हम नहीं।



दिल मे नज़र मे तुम हो तो फिर किस तरह कहें

ऐ दोस्त अब भी करते तुम्हें प्यार हम नहीं।



दुनिया की ठोकरों ने गिरा कर ही रख दिया

लो अब तुम्हारी राह मे दीवार हम नहीं।



वो तो शगुन मे आज अंगूठी भी दे गये

हम लाख कह रहे थे की तैयार हम नहीं।



हम उसकी धुन में हैं तो ज़माने की क्या… Continue

Added by MOHD. RIZWAN (रिज़वान खैराबादी) on October 29, 2015 at 7:00pm — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ऐ सुखनवर साथ चल -- (ग़ज़ल) -- मिथिलेश वामनकर

2122---2122---2122---212

 

दौर बदला है, बदल जा,   ऐ सुखनवर साथ चल 

सोचता है जिस जबां में, उस जबां में लिख ग़ज़ल

 

जिंदगी बदलाव है...... गर थम गए…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on October 29, 2015 at 2:44pm — 36 Comments

सरकार पर व्यंग्य बाण " अज्ञात "

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती,                  

यदि वोट की खातिर वो,                             

दोनों हाथ से धन न लुटाती।                  

तो देश की सारी व्यवस्था,                       

इस तरह न चरमराती।                                

काश कि सरकार,                           

अपने चक्षुओं से देख पाती।                                            

छोड़ निंदा रस कहीं,                          

गर…

Continue

Added by Ajay Kumar Sharma on October 29, 2015 at 1:42pm — 7 Comments

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा) 22 - शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"जश्न पर जश्न" - (लघुकथा)



"आदरणीय, आज तुम मुझे बार-बार यूँ घूर-घूर कर क्यों देख रहे हो, अपनी इन उँगलियों से मुझे बार-बार यूँ क्यों छू रहे हो ?' - उसने कुछ इतराते हुए पूछा।



"प्रिये, आज तुम पहले से ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही हो, तुम्हारा प्रत्येक अंग, हर एक हिस्सा मुझे सुंदर और मुस्कराता सा लग रहा है !"



"और तुम, तुम भी तो बहुत दिनों बाद बहुत ख़ुश नज़र आ रहे हो, तभी तो तुम मेरे लिए नई श्रंगार सामग्री लाये हो, वरना कब जाते हो तुम बाज़ार। तुम्हें तुम्हारे तरीक़े से जश्न… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 29, 2015 at 11:31am — 7 Comments

उत्सव –( लघुकथा ) -

उत्सव –( लघुकथा ) -

"नाना जी, इस बार दीवाली पर पूरे मकान को बिजली की लडियों से ढक दैंगे, सारा घर जगमग करेगा"!

"नहीं छुट्टू, इस बार दीवाली पर यह सम्भव नहीं होगा"!

"किसलिये नाना जी"!

"छुट्टू, तेरी नानी,तेरे पापा और तेरी मॉ की बरसी होना बाकी है,उसके बाद ही हम कोई उत्सव मना सकते हैं"!

"यह तो और भी अच्छा है, एक साथ ही दौनों काम कर लेते हैं, दीवाली पर ही बरसी मना लेते हैं"!

"छुट्टू, बरसी एक साल पूर्ण होने पर पंडित जी द्वारा दी गयी तिथि पर  ही होती…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 29, 2015 at 11:23am — 8 Comments

आता है जीना जिंदगी हूँ मैं

तुम सोचते हो जो नहीं हूँ मैं
जो कुछ भी मैं हूँ वो यही हूँ मैं। 

दुश्वारियाँ करती नहीं व्याकुल
आता है जीना जिंदगी हूँ मैं। 

जो सोचना है सोचिए साहब
मैं जानता हूँ कि सही हूँ मैं। 

साहिल से यारी मैं करूँ कैसे
जाना है आगे इक नदी हूँ मैं। 

अच्छा किसे लगता भला जलना
पर क्या करूँ कि रोशनी हूँ मैं । 

नीरज कुमार नीर / मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neeraj Neer on October 28, 2015 at 11:08pm — 12 Comments

बेरोजगारी / लघुकथा

कमरे में घुसते हुए वह अपनी चाल को संतुलित कर रहा था ,पर बैठते हुए थोडा़ लड़खड़ा गया ।



" आज इतनी देर कैसे कर दी आपने , कहाँ रह गये थे , खाना लगा दूँ ? " बाहर आॅफिस , घर में बेरोजगार पति , दोनों को ही काँच के बर्तन के समान संभालने की जिम्मेदारी भी वह बखूबी निभा रही थी कि आज ऐसे ....!



नजदीक जाकर गौर से देखी तो उनकी आँखें लाल हो रही थी । अचानक वह सोफे पर ही लुढ़क गया । एक पल के लिए उसकी धड़कन जैसे रूक गई ।



" क्या आपने ड्रग लिया है ...? "



" हाँ " अधनींदे… Continue

Added by kanta roy on October 28, 2015 at 8:36pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल-- बढ़िया है-- (मिथिलेश वामनकर)

22—22—22—22—22—2

 

गुलशन में फिर भौंरा आया,  बढ़िया है

फूलों से काटों का नाता,  बढ़िया है

 

आज उफ़क तक सरसों देखी, दिल बोला-…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 28, 2015 at 4:03pm — 15 Comments


प्रधान संपादक
एक और पड़ाव (लघुकथा)

बहुत बरसों के बाद वह स्वयं को को बहुत ही हल्का हल्का महसूस कर रहा थाl न तो उसे सुबह जल्दी उठने की चिंता थी, न जिम जाने की हड़बड़ी और न ही अभ्यास सत्र में जाने की फ़िक्रl लगभग ढाई दशक तक अपने खेल के बेताज बादशाह रहे रॉबिन ने जब खेल से संन्यास की घोषणा की थी तो पूरे मीडिया ने उसकी प्रशंसा में क़सीदे पढ़े थेl समूचे खेल जगत से शुभकामनाओं के संदेश आए थेl कोई उस पर किताब लिखने की बात कर रहा था तो कोई वृत्तचित्र बनाने कीl उसकी उपलब्धियों पर गोष्ठियाँ की जा रही थींl किन्तु वह इन सबसे दूर एक शांत…

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Added by योगराज प्रभाकर on October 28, 2015 at 4:00pm — 12 Comments

भारतीय स्त्री और आभूषण

नवरात्र के दिनों में सामने वाले घर में रहने वाली अधेड़ आयु की स्त्री के हाथों में लाल कांच की चूड़ी देखकर बिल्डिंग में रहने वाली सभी महिलाये चौंक गई, " ओह, तो इसका मतलब इनके पति हैं"! वह महिला अपने दो युवा बच्चों के साथ इस फ्लैट में रहने नई नई आई थी! प्रायः वह महिला कोई साज श्रृंगार नहीं करती थी जिससे सभी ने मन ही मन ये विचार बना लिया था वह शायद विधवा हैं लेकिन नवरात्र की पूजा के दिनों में साज श्रृंगार से पूर्ण उस महिला को देखकर अन्य महिलाओं के मन में खलबली मच गयी! आखिर पूछ ही लिया "आपके…

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Added by Rajni Gosain on October 28, 2015 at 12:57pm — 3 Comments

अपराध बोध (लघुकथा )

भरी दोपहरी मई के महीने में वो दरवाज़े पर आया और ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगाने लगा खान साहब…….. खान साहब……..| मेरी आँख खुली मैंने बालकनी से झाँका | एक ५५-६० साल का अधबूढ़ा शख्स, पुराने कपड़ों, बिखरे बाल और खिचड़ी दाढ़ी में सायकल लिए खड़ा है। मुझे देखते ही चिल्ला पड़ा फलाँ साहब का घर यही है| मैंने धीरे से हाँ कहा और गर्दन को हल्की सी जेहमत दी | वो चहक उठा उन्हें बुला दीजिये | मैंने कहा अब्बा सो रहे हैं, आप मुझे बताएं | उसने ज़ोर देकर कहा, नहीं आप उन्हें ही बुला दीजिये , कहियेगा फलाँ शख्स आया है। मुझे बड़ा…

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Added by नादिर ख़ान on October 28, 2015 at 12:30pm — 7 Comments

अधूरी ख्वाहिशें - ( लघुकथा ) -

अधूरी ख्वाहिशें - ( लघुकथा ) -

  कीर्ति के शिखर पर बैठे एक खिलाड़ी ने जब सन्यास ले लिया तो उसके कुछ समय पश्चात. पत्रकार सुधीर  जिज्ञासा वश ढूंढता हुआ, उसका साक्षात्कार लेने, उसके पैत्रिक गॉव जा पहुंचा!गॉव के बाहर ही एक व्यक्ति मैले कुचैले वस्त्रों में सिर पर गोबर का टोकरा ले जाता दिखा!सुधीर ने उससे भूतपूर्व बालीबाल खिलाडी रघुराज सिंह का घर पूछा!

"क्या करोगे भाई उसके घर जाकर"!

“मुझे उनका साक्षात्कार लेना है"!

"एक गुमनाम आदमी का साक्षात्कार,क्यों मज़ाक करते…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 28, 2015 at 11:43am — 5 Comments

"दो लावणी छंद व दो मुक्तक " - [काव्य रचना] / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

दो छंद व दो मुक्तक --



दो लावणी छंद--



[30 मात्रा/ 16 व 14 पर यति/ अंत में 21वर्जित

/ मापनी मुक्त]





कराये जब स्तनपान शिशु को,

माँ ममता ही बरसाये,

आधुनिका तो बस तरसाती,

ख़ुद ममता को झुठलाये।

इतरा रही हैं नव- वधुयें,

आधुनिक सोच अपनाकर,

पश्चिमी फैशन की नकल पर,

शरीर अपना ढलवाकर।

[1]



यकीन नहीं तो यकीन करो,

रिश्ते बनते जाएंगे,

यकीन के दम पर सब जीते,

सभी प्रेम बरसायेंगे।

आस्था छोड़ी जिसने… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 28, 2015 at 9:47am — 3 Comments

कंगली (लघुकथा )

साक्षी ने सारी सीमाएं विवाह पूर्व ही तोड़ दी थी ।विवश हो उसके प्रेम विवाह को सहमति देनी पड़ी लेकिन विवाह के मात्र आठ माह बाद तीन माह की पुत्री को लेकर लौट आयी थी । बिटिया तीन वर्ष की हो गयी थी ।साक्षी ने पुनः विवाह कर लिया बेटी ननिहाल में ही पल रही थी।इसी बात से संतोष था की वह ससुराल में रम जाय लेकिन -

" माँ अब मैं उस घर नहीं जाउंगी।"



"क्यों ? अब क्या हो गया ?"



"उसे पत्नी नहीं माँ के लिए नौकरानी चाहिए थी और वह तो पूरा कंगला हैं ,मैंने तो उसकी चमक देख ब्याह किया… Continue

Added by Archana Tripathi on October 27, 2015 at 11:52pm — 13 Comments

हे कलाम शत शत प्रणाम "अज्ञात"

आदरणीय कलाम साहब को समर्पित

सरल, सादगी की वह मूरत,                 

ऐसा पावन दूत हुआ,                        

भारत ही क्या ,उसकी छवि से,                                

जग सारा अभिभूत हुआ,              

आकाश, नाग, पृथ्वी, त्रिशूल से,                  

दाता पैने तीरों का,                                     

भारत को समृद्ध किया और                                           

जीवन जिया फकीरों सा ।                    

जिसकी …

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Added by Ajay Kumar Sharma on October 27, 2015 at 11:30pm — 2 Comments

ग़ज़ल इस्लाह के लिए (मनोज कुमार अहसास)

2122 2122 2122 212





कल्पना का पथ टटोलें कुछ समय की आह सुन

इस तरह निभ जाये शायद अपनी चाहत अपनी धुन



उनकी यादों की कोई सीमा कोई मंज़िल भी है

मुड़ हकीकी से मजाज़ी या जगत की पीर बुन



बेगुनाही का मज़ा इस बात से दुगना हुआ

मेरे कातिल ने कहा है खुद सजा की राह चुन



एक मिसरा उनपे भी हो जिनसे होती है ग़ज़ल

फाइलातुन, फाइलातुन ,फाइलातुन, फाइलुन



प्रेम की इस व्यंजना में इक अमिट अनुराग है

वो न मेरा नाम लेती है कहती है बस मेरे…

Continue

Added by मनोज अहसास on October 27, 2015 at 2:00pm — 18 Comments

हम दर्द हो कितने बड़े

हमदर्द हो कितने बड़े..

2212-2212-2212-22



हो जो सियासत प्यार में रब भूल जाता हूँ

हमदर्द हो कितने बड़े तब भूल जाता हूँ



उम्दा है जबतक एक हैं कोई न हो मजहब

मैं प्यार में रब सारे मजहब भूल जाता हूँ



समशीर हाथो से हटा सजदा किया मैंने

हाँ मातृभूमी के लिए सब भूल जाता हूँ

रणभूमि में उतरूँ जो मैं सब भूल जाता हूँ

वादी हवा में मिल रहा अब अक्स है उनका

मैंख्वार मेरा मन सब सबब भूल जाता हूँ



हाँ तू वफ़ा है जिंदगी तेरी इनायत सब

तू… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 27, 2015 at 8:30am — 9 Comments

ग़ज़ल--( माँ) बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान-    212  212   212  212

 

दर्द सीने में अक्सर छुपाती है माँ|

तब कहीं जाकर फिर मुस्कुराती है माँ|

 

ख़ुद न सोने की चिंता वो करती  मगर,

लोरियां गा के हमको सुलाती है माँ|

 

रूठ जाते हैं हम जो कहीं माँ से तो,

नाज-नखरे हमारे उठाती है माँ|

 

लाख काँटे हों जीवन में उसके मगर,

फूल बच्चों पे अपनी लुटाती है माँ|

 

माँ क्या होती है  पूछो यतीमों से तुम,

रात-दिन उनके सपनों में आती है…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 26, 2015 at 10:30pm — 7 Comments

ज्वालामुखी – ( लघुकथा ) -

 "सुगना, क्या यह सच है कि दशहरे की रात को तुमने चौधरी जगन्नाथ के तीनों बेटों की खलिहान में सोते हुए कुल्हाडी से हत्या की थी"!

"बिलकुल सच है ज़ज़ साब,मैंने ही मारा उन तीनों राक्षसों को , रावण के साथ उनका  मरना भी ज़रूरी था, "!

"तुम्हें अपनी सफ़ाई में कुछ कहना है"!

"ज़ज़ साब, उन तीनों दरिंदों ने उसी खलिहान में  मुझे भूसा लेने बुलाया था और भरी दोपहरी में मेरी इज़्ज़त तार तार कर दी!मेरा बापू चौधरी के पास शिकायत करने गया तो चौधरी बोला कि सुगना के बापू जब पेड पर फ़ल लदे होते हैं तो…

Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 26, 2015 at 5:00pm — 9 Comments

अब आँखों से ही बरसेंगे

अंबर से मेघ नहीं बरसे

अब आँखों से ही बरसेंगे

 

शोक है

मनी नहीं खुशियाँ

गाँव में इस बार

दशहरा पर

असमय गर्भ पात हुआ है

गिरा है गर्भ

धान्य का धरा पर

कृषक के समक्ष

संकट विशाल है

पड़ा फिर से  अकाल है

खाने के एक निवाले को

रमुआ  के बच्चे तरसेंगे

 

व्यवस्था बहुत  बीमार है

अकाल सरकारी त्योहार है

कमाने का खूब है

अवसर

बटेगी राहत की रेवड़ी

खा जाएँगे  नेता,…

Continue

Added by Neeraj Neer on October 26, 2015 at 2:51pm — 11 Comments

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