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वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है

कितने दुःख दर्द से भरा दिल है

ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती

पास उनके जो सुनहरा दिल है

ताज इक सब के मन के अंदर भी

और ये शह्र आगरा दिल है

दिल लगी दिल्लगी नहीं होती

इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है

देखकर उनकी मदभरी आँखें

खो गया मेरा मदभरा दिल है

याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'

आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है

मौलिक एवं…

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Added by Jaihind Raipuri on March 4, 2026 at 10:00pm — 2 Comments

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

***

पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की

साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।

*

कहने को  आयी  देश  में  इक्कीसवीं सदी

होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।

*

कहने को पर्व  रंग  का, मस्ती मजाक का

पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।

*

रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी

साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।

*

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े

टेढ़ी करो न  रोष  में  रेखा को भाल की।५।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2026 at 7:30am — No Comments

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस



बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।

कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।



घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।

जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।



जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।

घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।



बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।

छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम ।।



बाँछें खिलतीं मेज पर, जब भी  आता काम ।

बाबू भरता घूस से, अपने घर गोदाम ।।



खुलेआम अब घूस का,…

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Added by Sushil Sarna on February 18, 2026 at 8:00pm — 5 Comments

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यार

प्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।

आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।

प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।

इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा  अनुराग ।।

प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।

प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।

निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध ।

इसके भावों में छुपे, प्रेम गीत के बंध ।।

प्यार रूह इसरार की, प्यार नहीं इंकार ।

गहरा होता प्यार में, प्यार भरा अभिसार…

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Added by Sushil Sarna on February 16, 2026 at 7:47pm — No Comments

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में

आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१।

*

अवसर समानता का कहे सम्विधान तो

पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२।

*

करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को

फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३।

*

खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।

*

सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर

जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 14, 2026 at 5:09pm — 2 Comments

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 

अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।

मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।।

 

प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार ।

काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।।

 

अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद ।

शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।।

 

अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात ।

कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

बातें बीती रात की, कहते आए लाज ।

लाख छुपाया खुल गए, सुर्ख नयन से राज ।।

 

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 8, 2026 at 9:00pm — 3 Comments

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

******

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये

उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१।

*

गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली

उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।

*

घर में बहार नल से जो आयी गरीब के

पनघट हर एक गाँव  के वीरान हो गये।३।

*

भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर

सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।

*

हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है

पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 7, 2026 at 6:23am — 1 Comment

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिल

रात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।

फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।

उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान ।

सोच रहा वह  इश्क में, क्या पाया नादान ।।

आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।

नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार ।

जिस्मानी जन्नत मिली, दिल को मिला करार ।।

कैसी ख्वाहिश कर रहा  , पागल दिल नादान ।

आसमान सम चाँद पर, खो बैठा ईमान ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 4, 2026 at 8:30pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . .नैन

दोहा सप्तक. . . . नैन

नैन द्वन्द्व में नैन ही, गए नैन से हार ।

नैनों को मीठी लगे, नैनों से तकरार ।।

नैनों की तकरार है, बड़ा अजब आनन्द ।

हृदय पृष्ठ पर प्रेम के,  अंकित होते छन्द ।।

नैनों के संवाद की, होती मोहक नाद ।

नैन सुने बस नैन के, अनबोले संवाद ।।

नैनों की होती सदा, मौन सुरों में बात ।

नैनों की मनुहार में, बीते सारी रात ।।

बड़ा मनोरम नैन का, होता है संसार ।

नैनों के इसरार को, नैन करें स्वीकार ।।

नैन उदधि में प्रेम का, जब…

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Added by Sushil Sarna on February 3, 2026 at 8:02pm — No Comments

ग़ज़ल

2122    1212    22

 

आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में

क्या से क्या हो गए महब्बत में

 

मैं ख़यालों में आ गया उस की

हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में

 

मुझ से मुझ ही को दूर करने को 

आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में

 

तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं

चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में

 

चाट कर के अफीम मज़हब की

मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में

 

ए ग़रीबी है शुक्रिया तेरा

जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत…

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Added by Jaihind Raipuri on February 3, 2026 at 10:30am — 7 Comments

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२
**
अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमी
एक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।
*
आदमीयत जहाँ खूब महफूज हो
एक ऐसा कवच मढ़ सके आदमी।२।
*
दूर नफ़रत का जंजाल करले अगर
दो कदम तब कहीं बढ़ सके आदमी।३।
*
खींचने में लगे  पाँव अपने ही अब
व्योम कैसे सहज चढ़ सके आदमी।४।
*
तब मनुज देवता हो गया जान लो
लोक मन में अगर कढ़ सके आदमी।५।
**
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 1, 2026 at 11:24pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

मिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।

निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।

लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।

वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।

पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में  संबंध ।

आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।

वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।

संबंधों को लीलती , धन की झूठी शान ।।

रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।

अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 1, 2026 at 4:00pm — 2 Comments

कर्मवीर

आधार छंद-मनहरण घनाक्षरी



सुख हो या दुख चाहें रहते सहज और, जग की कठिनता से जो न घबराते हैं।

स्थिति हो विषम भी तो घरें धीर निज हिय , राह अपने लिए जो स्वयँ ही बनाते हैं।।

रण ही है जीवन का नाम दूजा मान कर, कार्य में निरत पग पीछे न हटाते हैं।

जग में मनुज वे ही सदा ही सभी के लिए, कर्मवीरता के प्रतिमान बन जाते हैं।।1।।



रहें नहीं भाग्य के भरोसे पछताएँ नहीं, पथ की विषमताओं को जो पहचाने हैं।

हों नहीं निराश न ही कोशिशों से मुख मोड़ें, किसी हार से जो कभी हार नहीं…

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Added by रामबली गुप्ता on January 30, 2026 at 1:05pm — 1 Comment

दोहा पंचक - आचरण

चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान।

किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।।

*

हवा  विषैली  हो  गयी, रहा  नगर  या गाँव।

बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।।

*

बदनामी से  नाम  नित, जोड़़  रहे  सब मौन

धन अच्छे व्यवहार का, कमा रहा अब कौन।।

*

मन रिश्तो से बढ़ करे, अब बस धन की होड़

सुख-दुख के  साथी  गये, ऐसे  पथ  में छोड़।।

*

बन जाये यदि चाहता, जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2026 at 11:19pm — No Comments

प्रवाह, बुद्धिमत्ता और भ्रम का खेल सिद्धांत (लेख)

मनुष्य और भाषा के बीच का संबंध केवल अभिव्यक्ति का नहीं है, अगर ध्यान से सोचें तो यह एक तरह का खेल है जिसकी व्याख्या खेल सिद्धांत के आधार पर की जा सकती है। खेल सिद्धांत हमें सिखाता है कि जब दो या अधिक खिलाड़ी किसी स्थिति में निर्णय लेते हैं, तो हमेशा सत्य या सही को नहीं चुनते, बल्कि वह विकल्प चुनते हैं जिससे उन्हें सबसे अधिक लाभ दिखाई देता है। यही सिद्धांत भाषा और बुद्धिमत्ता के आकलन पर भी लागू होता है।…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 25, 2026 at 10:31pm — No Comments

कुंडलिया. . .बेटी

कुंडलिया. . . . बेटी

बेटी  से  बेटा   भला, कहने   की   है   बात ।
बेटा सुख का   सारथी, सुता   सहे  आघात ।।
सुता   सहे    आघात, पराई   हरदम   रहती ।
जीवन के वह दर्द, सदा ही चुप - चुप सहती ।।
जाने   कितने  रूप,सुता   यह   ओढ़े    लेटी ।
सृष्टि  सृजन  आधार, मगर  है   मानो   बेटी ।।

सुशील सरना / 20-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on January 20, 2026 at 2:21pm — 2 Comments

दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर पर

दोहा एकादश   . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।

बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।

आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।

डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।

जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।

उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग ।।

किसी धर्म…

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Added by Sushil Sarna on January 14, 2026 at 3:03pm — 3 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ

   

जिस-जिस की सामर्थ्य रही है

धौंस उसी की

एक सदा से

 

एक कहावत रही चलन में

भैंस उसीकी जिसकी लाठी

मनमर्जी थोपी जाती है

नहीं चली तो तोड़ें काठी

 

अहंकार मद भरे विचारों

उड़ें हवा में

वे गर्दा से ..

 

हठ में अड़ना, जबरन भिड़ना

और झूठ रच मन की करना

निर्बल अबलों या नन्हों में

नाहक वीर बने घुस लड़ना

 

मद में ऐंठे गरमी झोंकें

लफ्फाजी भी

यदा-कदा से

 

खरबूजे का मीठा बाना

चक्कू से…

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Added by Saurabh Pandey on January 13, 2026 at 11:28pm — 4 Comments

कुंडलिया. . . . .

कुंडलिया. . . .

किसने समझा आज तक, मुफलिस का संसार ।
आँखें   उसकी    वेदना, नित्य   करें    साकार ।।
नित्य  करें   साकार ,  दर्द  यह  कहा  न  जाता ।
उसे  भूख  का  दंश , सदा  ही   बड़ा   सताता ।।
पत्थर   पर  ही  पीठ , टिकाई   हरदम   इसने  ।
भूखी काली रात , भाग्य  में  लिख  दी  किसने ।।

सुशील सरना / 9-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on January 9, 2026 at 1:29pm — 2 Comments

ग़ज़ल

  

 

ग़ज़ल

2122  2122  212

 

कितने काँटे कितने कंकर हो गये

हर  गली  जैसे  सुख़नवर हो गये

 

रास्तों  पर  तीरगी  है आज भी

शह्र-से जब गाँव  के घर हो गये                                  

 

आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे

हुक्म आया घर से बेघर हो गये

 

जो गिरी तो साख गिरती ही गई

अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये

 

सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब  

यूँ  बड़े  भँवरों के लश्कर हो…

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Added by Ashok Kumar Raktale on January 8, 2026 at 5:00pm — 8 Comments

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