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गीत -४ (लक्ष्मण धामी "मुसाफिर")

खोल रक्खा है निमोही द्वार आ जाओ।

हैं अधर पर प्यास के अंगार आ जाओ।।

*

नित्य बदली छोड़ कर अम्बर।

बैठ  जाती आन  पलकों  पर।।

धुल न जाये फिर कहीं शृंगार आ जाओ।

खोल रक्खा है निमोही द्वार आ जाओ।।

*

शूल सी चंचल हवाएँ सब।

हो गयीं नीरस दिशाएँ सब।।

है बहुत सूना हृदय संसार आ जाओ।

खोल रक्खा है निमोही द्वार आ जाओ।।

*   

हो गयी बोझिल पलक जगते।

आस खंडित आस नित रखते।।

कौल को अब कर समन्दर पार आ जाओ।

खोल रक्खा है निमोही द्वार आ…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 26, 2022 at 6:16am — 14 Comments

अबके बरस जो आओगे

अबके बरस जो आओगे, तो सावन सूखा पाओगे

सूख चुके इन नैनों को तुम, और भींगा ना पाओगे

और अगर तुम ना आए, प्यास ना दिल की बुझ पाए

पत्थराई नैनों सा फिर, दिल पत्थर ना हो जाए

अबके बरस जो आओगे, बसंत शुष्क सा पाओगे

मन के उजड़े बागीचे में, एक फूल खिला ना पाओगे         

और अगर तुम ना आए, अटकी डाली ना गिर जाए

सूखे मुरझाए मन को मेरे, पतझर हीं ना भा…

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Added by AMAN SINHA on October 25, 2022 at 1:12pm — 1 Comment

कफनचोर(लघुकथा)

कफनचोर

‘छोड़ा ही क्या है इसने?’

‘घर के पिछवाड़े तक की जमीन बेच दी।’

‘भुवन के घर की यारी ऐसे ही फलती है।’

‘भगेलू की भौजाई से रिश्ता था इसका।’

‘मरने लगा तो बहन के घर इलाज कराने गया था।’

शीला मरा पड़ा था और गाँव के मर्द-औरत यही सब बतिया रहे थे। अर्थी तैयार हुई।लाश उसपर रख दी गई।अब अर्थी उठने ही वाली थी कि सब लोग चौंक गए। ‘ठहरो। अर्थी नहीं उठेगी।’ भार्गव ज़ोर से चिल्लाया। साथ…

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Added by Manan Kumar singh on October 23, 2022 at 3:55pm — 6 Comments

ग़ज़ल : ज़िन्दगी की है ये मेरी दास्ताँ

अरकान : 2122 2122 212

ज़िन्दगी की है ये मेरी दास्ताँ

तुहमतें, रुसवाइयाँ, नाकामियाँ

आए थे जब हम यहाँ तो आग थे

राख हैं अब, उठ रहा है बस धुआँ

दिल लगाने की ख़ता जिनसे हुई

उम्र भर देते रहे वो इम्तिहाँ

सोचता हूँ क्या उसे मैं नाम दूँ

जो कभी था तेरे मेरे दरमियाँ

मैं अकेला इश्क़ में रहता नहीं

साथ रहती हैं मेरे तन्हाइयाँ

कहने को तो कब से मैं आज़ाद हूँ

पाँव में अब भी हैं लेकिन…

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Added by Mahendra Kumar on October 23, 2022 at 6:30am — 13 Comments

आज मैखाने का दस्तूर अज़ब है साक़ी |

 

आज मैखाने का दस्तूर अज़ब  है साक़ी |

जाम दिखता नहीं पर बाकी तो सब है साक़ी ।

 

मयकशी के लिए अब  मैं भी चला आया हूँ    

तेरी आँखों से ही पीने की तलब है साक़ी|

 

भूल जाता हूं मैं दुनिया के सभी रंजो अलम

जाम नज़रों का तेरे हाय गज़ब है साक़ी|

 

अपनी आँखों से ही इक जाम पिला दे मुझको

तेरे मयख़ाने में ये आख़िरी शब है साक़ी|

 

तेरी चौखट की तो ये बात निराली लगती

जाति मजहब न कोई नस्ल–नसब है…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 22, 2022 at 9:30pm — 5 Comments

अपनी अपनी खुशी(लघुकथा)

अपनी अपनी खुशी  

ऊँचका घर यानि बाबा घर में लंबी प्रतीक्षा के बाद पोता हुआ है।पोतियाँ पहले से हैं। परिवार के कुछ लोग शहर से आए हैं। मिठाइयाँ बंट रही हैं। मुहल्ले के लोग मिठाई खाते,खुशी का इजहार करते। कोई कहता, ‘बस यही कमी…

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Added by Manan Kumar singh on October 20, 2022 at 6:00pm — 4 Comments

गीत-3 (लक्ष्मण धामी "मुसाफिर")

गीत

*****

उजाला  कर  दिया उसने

चलें उस ओर हम-तुम भी।।

*

तमस के गाँव में रह कर

सदी  बीती  हमारी  भी।

अभी तक ढो रहे हैं बस

वही  थोपी  उधारी  भी।।

*

नहीं  प्रयास  कर  पाये

कभी इससे निकलने का।

बढ़ाया हाथ उस ने जब

लगायें जोर हम तुम भी।।

**

न जाने कौन सी ग्लानी

मिटा उत्साह देती नित।

नहीं  साहस  जुटा पाता

सँभलने का हमारा चित।।

*

सफलता  है  नहीं आयी

भला क्यों पथ हमारे ही।

तनिक मष्तिष्क से…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 19, 2022 at 3:30am — 15 Comments

हुस्न-ए-ग़ज़ल (नज़्म)

हुस्न-ए-ग़ज़ल

2 1 2 2  /  1 2 1 2  /  2 2

है ग़ज़लगोई यार की बातें

शे'र सुनना ख़ुमार की बातें

शे'र पढ़ना हसीं तरन्नुम में

जैसे हों लालाज़ार की बातें…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on October 19, 2022 at 12:11am — 11 Comments

लाल रुमाल(लघुकथा)

लाल रुमाल

 ‘रेल लाइन पर भिनुसार वाली गाड़ी से एक औरत कटी मिली। हाथ में लाल रुमाल था  .... उसपर हरे रंग में लिखा था ... जगदीश।’ सुबह होते यह खबर सारे गाँव में फैल गई। ‘कौन ? कहाँ की?’ जैसे सवाल हवा में तैरने लगे। रेल लाइन के पास ही गाँव के बड़े ब्रह्म के चबूतरे पर कुछ औरतें इकट्ठा हैं; कुछ बाबा को पूजने आई हैं, कुछ घसियारिनें हैं। चिड़ई भौजी उनसे मुखातिब हैं। एक…

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Added by Manan Kumar singh on October 18, 2022 at 1:30pm — 8 Comments

गीतिका

गीतिका
आधार छंद - चौपई (जयकरी छंद )-15 मात्रिक -पदात-गाल

साँसें   जीवन  का  शृंगार ।
बिना साँस सजती दीवार ।

कब जीवित का होता मान ,
चित्रों   को   पूजे   संसार ।

मिलता अपनों  से  आघात ,
इनका  प्यार   लगे   बेकार  ।

पल-पल  रिश्ते  बदलें  रूप ,
मतभेदों   से  पड़ी दरार ।

बड़ा अजब जग का दस्तूर ,
भरे   प्यार   में  ये   अंगार ।

सुशील सरना / 17-10-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on October 17, 2022 at 5:40pm — 10 Comments

रोटी

भूख लगती है कभी जो, याद इसकी आती है

ना मिले तो पेट में फिर, आग सी लग जाती है

राजा हो या रंक देखो, इसके सब ग़ुलाम है

तीनो वक़्त खाने से पहले, करते इसे सलाम है

रुखी-सुखी जैसी भी हो, पेट यह भर जाती है

चाह में अपनी हर किसी, को राह से भटकाती है

जिसने इसको पा…

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Added by AMAN SINHA on October 17, 2022 at 11:21am — 3 Comments

हूँ किसके ग़म का सताया न पूछिये साहिब (ग़ज़ल)

1212 / 1122 / 1212 / 22(112)

हूँ किसके ग़म का सताया न पूछिये साहिब

जफ़ा-ए-इश्क़ का क़िस्सा न पूछिये साहिब [1]

तमाम उम्र उसे दूर से ही देख के बस

सुकून कितना है पाया न पूछिये साहिब [2]

लहू भी थम सा गया दर्द को भी राहत…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on October 16, 2022 at 1:06pm — 13 Comments

भाई(लघुकथा)

भाई

‘बुल्लु की शादी का कर्ज़ अभी सिर पर है..... और वह मर गई।’ इतना कह चेंथरु लगा फफक पड़ेगा, पर उसने अंदर के तूफान को थाम लिया।शायद पड़ोस के भाई से झिझक हो कि शिकायत हो जाएगी।पर, उसकी आँखें भींग गई थीं। अँधेरे में भी उसकी आवाज सब कुछ जाहिर कर रही थी।

‘दुख हुआ सब सुनकर, चेंथरु।’ ढाढस बांधते हुए मास्टर जी बोले।

‘भइया, कोई पूछेवाला नहीं था कि कुछ मदद चाहिए…

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Added by Manan Kumar singh on October 16, 2022 at 11:49am — 3 Comments

जिज्ञासा (लघुकथा)

जिज्ञासा

पार्क से आते ही मोनू ने सवाल किया, ‘पापा, अपनी कार रात को झुग्गीवाले मुहल्ले में क्यों जाती है?’

‘बिजनेस के सिलसिले में?’

‘तो उसमें चढ़कर लड़कियाँ कहाँ जाती हैं?’

‘काम पर, बेटे।’ सेठ ने बेटे को संतुष्ट करना चाहा।

‘रात को कौन-सा काम होता है,पापा?’

‘ढेर-सारे काम हैं,बेटे।जैसे कॉल सेंटर वगैरह,जो रात…

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Added by Manan Kumar singh on October 15, 2022 at 5:53pm — 7 Comments

एडमिशन(लघुकथा)

एडमिशन

‘मम्मी, मेरा एडमिशन………।' कॉलेज से आती बबली अपनी बात पूरी करती कि फोन की घंटी घनघनाई, ‘....ट्रीन..ट्रीन..।' मालती ने फोन उठाया। बबली अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।  

‘हेलो मालती, मैं सुविधा बोल रही हूँ। सुविधा ठक्कर।'

‘हाँ बोलो।' मालती ने बेरुखी से कहा।  

‘तुम मिली समीर से?’

‘सोचती हूँ,मिल ही लूँ।'

‘अभी सोच ही रही है तू?’ सुविधा ने जरा डपट कर…

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Added by Manan Kumar singh on October 12, 2022 at 4:51pm — 14 Comments

ग़ज़ल : यही इक बात मैं समझा नहीं था

बह्र : 1222     1222     122

यही इक बात मैं समझा नहीं था

जहाँ में कोई भी अपना नहीं था

किसी को जब तलक चाहा नहीं था

ज़लालत क्या है ये जाना नहीं था

उसे खोने से मैं क्यूँ डर रहा हूँ

जिसे मैंने कभी पाया नहीं था

न बदलेगा कभी सोचा था मैंने

बदल जाएगा वो सोचा नहीं था

उसे हरदम रही मुझसे शिकायत

मुझे जिससे कोई शिकवा नहीं था

उसी इक शख़्स का मैं हो गया हूँ

वही इक शख़्स जो मेरा नहीं…

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Added by Mahendra Kumar on October 10, 2022 at 6:27pm — 15 Comments

काली कुतिया

कुत्तों के दो गुट थे,झबड़ा गुट और कबड़ा गुट।दोनों गुट एक –दूसरे के धुर विरोधी थे।पहले गुट का प्रभाव क्षेत्र विस्तृत था, दूसरे का सीमित। दूसरा गुट अपने क्षेत्र में छीनाझपटी, काटाकुटी के लिए ज्यादा मशहूर था।तीसरी जमात कबड़ी नाम की एक काली कुतिया की थी। वह धूर्तता के लिए विख्यात थी। गोस्त वगैरह की हवा लगते ही वह दुम हिलाती वहाँ पहुँच जाती। कबड़ी की गाढ़ी दोस्ती एक सफेद, भूरी आँखों वाली लबड़ी नाम की बिल्ली से थी। वह दूध -मलाई, गोस्त वगैरह की खबर कबड़ी कुतिया को देती रहती।

कबड़ी कभी…

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Added by Manan Kumar singh on October 10, 2022 at 10:49am — 2 Comments

अपराधी

हाँ-हाँ मैं अपराधी हुँ बस, अधर्म करने का आदि हूँ

पर मुझको खुद पर लाज नहीं, जो किया मैं उसपर गर्वित हुँ

जो देखा सब यहीं देखा, जो सीखा सब यहीं सीखा

मैं माँ के पेट का दोष नहीं, ना हीं मैं सुभद्रा का बेटा

 

दूध की प्याली के खातिर, मैंने माँ को बिकते देखा है

अपने पेट की भूख मिटाने, बाप से पिटते देखा है

फटें कपड़ो से तन को ढकते, बहनों के संघर्ष…

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Added by AMAN SINHA on October 10, 2022 at 10:34am — No Comments

धरती के पुत्रों उठो

धरती के पुत्रों, उठो

उषा अवस्थी

शरद चन्द्र तुम न दिखे
घटा घिरी घनघोर
गरज - चमक कर बरसता
मेघा,ओर न छोर

जो अमृत था बरसता
हमें मिला न आज
पर्व न उस विधि मन सका
जैसा साजा साज़

वृक्ष, पहाड़ों का किया
अपने हाथ विनाश
अब रोने से है भला
क्या आएगा हाथ?

धरती के पुत्रों उठो
समय नहीं है शेष
चुन उपयोगी पौध को
रोपो , मिटे कलेश

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Usha Awasthi on October 9, 2022 at 11:05pm — No Comments

उपदेशक(लघुकथा)

आज इन्दुमति की शादी है। दलन पाठक पुरोहित हैं। इन्दु के घरवालों के सम्मुख उसे पातिव्रत्य-धर्म की शिक्षा दे रहे है, ‘औरत का सब कुछ पति के लिए होता है। अपना संचित पुण्य, सुरक्षित शील वह मिलन की पहली रात में अपने पति को समर्पित कर धन्य होती है ........।’ बाबा बोलते जाते हैं। घरवाले मुंड हिला-हिलाकर उनकी बातों का समर्थन करते हैं। बीच-बीच में इन्दु से भी पाठक जी पूछ लेते हैं, ‘समझ रही हो न कन्या?’ बेटी नहीं कहते हैं। उन्हें कुछ-कुछ…

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Added by Manan Kumar singh on October 8, 2022 at 5:34pm — 2 Comments

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