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March 2021 Blog Posts

ग़ज़ल: "सनम हमको मिला"

2211  2122  1221  1222  12

चाहत में सिवा ही चाहत के क्या क्या न सनम हमको मिला

हर जख्म मिला है दिल को यूँ मरहम न सनम हमको मिला

किस को है पता यहाँ कौन कब हो जाये यूँ ही बे-वफ़ा

हम जान लुटा आये अपनी फिर भी न सनम हमको मिला

ता उम्र लगा रहा इश्क में भी यूँ तो मिलना बिछड़ना

मिलके न जुदा हो पर कोई ऐसा न सनम हमको मिला

थोड़ा तो क़रार आये या रब इस दिल ए बेजार को

थोड़ा भी सुकूँ गो चाहत में आखिर न सनम हमको…

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Added by Aazi Tamaam on March 5, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

वोट देकर मालिकाना हक गँवाया- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' (गजल)

२१२२/२१२२/२१२२/२१२



दीप की लौ से निकलती रौशनी भी देख ली 

और उस की छाँव  बैठी  तीरगी भी देख ली।१।

*

वोट देकर मालिकाना हक गँवाया हमने यूँ

चार दिन में  सेवकाई  आपकी भी देख ली।२।

*

दुश्मनी का रंग हम ने जन्म से देखा ही था

आज संकट के समय में दोस्ती भी देख ली।३।

*

आ न पाये होश में क्यों आमजन से दोस्तो

दे के उस ने तो  हमें  संजीवनी भी देख ली।४।

*

खूब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 5, 2021 at 2:09pm — 20 Comments

शम्स हरदम छुपा नहीं रहता......( ग़ज़ल :- सालिक गणवीर)

2122 1212 22/112

शम्स हरदम छुपा नहीं रहता

बादलों से ढका नही रहता (1)

लोग मुझको न ढूँढ पाएँगे

मैं कहाँ हूँ पता नहीं रहता  (2)

इश्क़ में काम इतने होते हैं

फिर कोई काम का नहीं रहता  (3)

लोग आपस में बाँट लेते हैं

मेरा हिस्सा बचा नहीं रहता (4)

हम सभी मिल के एक होते तो

मुल्क इतना बँटा नहीं रहता (5)

लौट आया है सुख मिरे घर में

देख रहता है या नहीं रहता (6)

इक न इक…

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Added by सालिक गणवीर on March 5, 2021 at 4:42am — 5 Comments

गीत

उतरा है मधु मास धरा पर

हर शय पर मस्ती छाई है !

जन गण के तन मन सुरा घुली

गुनगुनी धूप की चोट लगी

कली खुल, वन प्रसफुटित हुई,

मुस्काय बेला चमेली है !

उतरा है मधुमास धरा पर

हर शय पर मस्ती छाई है !!

कमल खिले हैं सरोवरों मेंं

मौज करे हम नावों में

मगन चिड़िया झील के तन हैं

वर बसन्त, प्रकृति मुस्काई है !

उतरा है मधुमास धरा पर

हर शय  पर मस्ती  छाई है !!

बाण चलाया कामदेव ने

घायल चम्पा गुलमोहर…

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Added by Chetan Prakash on March 5, 2021 at 1:30am — 3 Comments

'जब मैं सोलह का था': ग़ज़ल

22/22/22/22/22/22



जब मैं सोलह का था, और तुम तेरह की थी

मैं भी  भोला  सा था, तुम  भी  मीरा  सी थी।

दिल तब बच्चा सा था, आलम अच्छा सा था..

बातें सच्ची सी थीं, आँख वो वीणा सी थी।

शामें खुशबू सी थीं, रातें जादू सी थीं..

दुनिया दिलकश सी थी, मोहब्बत पहली थी।



बारिश प्यारी सी थी, पतझड़ क्यारी सा था..

गर्मी शीतल सी थी, सर्दी आँचल सी थी ।



दुपहर साया सा था, तुमको पाया सा था..

दिल के द्वारे पे धक-धक दस्तक तेरी…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 4, 2021 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल (निगाहों-निगाहों में क्या माजरा है)

122-122-122-122

निगाहों-निगाहों में क्या माजरा है

न उनको ख़बर है न हमको पता है

न  तुमने  कहा  कुछ न  मैंने  सुना है 

निगाहों  से  ही  सब  बयाँ  हो रहा है

ख़ुमारी फ़ज़ा में ये छाई है कैसी  

ख़िरामा ख़िरामा नशा छा रहा है 

मुहब्बत की  ऐसी  हवा चल  पड़ी ये

मुअत्तर  महब्बत  में सब  हो गया है 

मिलाकर निगाहें तेरा मुस्कुराना 

मेरे दिल पे जानाँ ग़ज़ब ढा गया है 

निगाहें …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 4, 2021 at 10:28pm — 2 Comments

लो चढ़ आया फिर पूर्वी फेरी वाला

लो चढ़ आया फिर पूर्वी फेरी वाला
सीधी कमर
उठाए स्वर्ण की छाबड़ी…
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Added by amita tiwari on March 4, 2021 at 8:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल: 'इश्क मुहब्बत चाहत उल्फत'

22 22 22 22

इश्क मुहब्बत चाहत उल्फत

रश्क मुसीबत रंज कयामत।

**

किसको क्या होना है हासिल

कोई न जाने अपनी किस्मत।

**

क्यूँ मैं छोडूं यार तेरा दर

हक है मेरा करना इबादत।

**

देख ली हमने सारी दुनिया

तुझसी न भायी कोई सूरत।

**

जोर आजमा ले तू भी पूरा..

देखूँ इश्क़ मुझे या वहशत?

**

'जान' ये दिन भी कट जायेंगे

देखी है जब उनकी नफरत।

**

तेरे ही दम से सारे भरम हैं

वर्ना क्या दोज़ख़ क्या…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 4, 2021 at 5:00pm — 11 Comments

समूची धरा बिन ये अंबर अधूरा है

ये जो है लड़की

हैं उसकी जो आँखे

हैं उनमें जो सपने

जागे से सपने

भागे से सपने

सपनों में

पंख

पंखों में

परवाज

बंद खामोशी में पुरज़ोर आवाज

आवाज़ में

वादा

बहुत सच्चा, बहुत सीधा -बहुत सादा

कि

मुझे आसमान दे दो

छोटा सही इक जहान दे दो

बदले में देती हूँ वादा

कि अकेली आसमान नहीं ओढ़ूँगी

ओढ़ ही नहीं पाऊँगी

ऐसी ही बनी हूँ मैं

स्वंय को छोड़ ही नहीं…

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Added by amita tiwari on March 3, 2021 at 10:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल: "ठहर सी जाती है"

22 22 22 22 22 22 22 22

जब तन्हाई में यादों की बरसात ठहर सी जाती है

इक हूक सी उठती है दिल में ह'यात ठहर सी जाती है



चुपके चुपके आँखों ही आँखों में इश्क़ जवाँ होता है

गर जुम्बिश ना हो आँखों में शुरुआत ठहर सी जाती है



हर पल मिलने की चाहत में पल पल बेताबी रहती है

दिन ढलते ढलते ढल जाता है रात ठहर सी जाती है



होठों पर बात न आ जाये दिल बेचैनी में रहता है

होठों पर आते ही दिल की हर बात ठहर सी जाती है



रह रह कर आहें…

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Added by Aazi Tamaam on March 2, 2021 at 9:30pm — No Comments

चाँदनी

चाँदनी ,,,,,,,
चमकने लगे हैं
केशों में चाँदी के तार
शायद
उम्र के सफर का है ये
आखिरी पड़ाव
थोड़ा जलता
थोड़ा बुझता
साँसों का अलाव…
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Added by Sushil Sarna on March 2, 2021 at 7:30pm — 4 Comments

ग़ज़ल-क्या करे कोई

221 2121 1221 212

1

हमसे शगुफ़्तगी की तमन्ना करे कोई 

अब और दर्द देने न आया करे कोई

2

आकर क़रीब इश्क़ जताया करे कोई

सच्चा नहीं तो झूठा ही वादा करे कोई…

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Added by Rachna Bhatia on March 2, 2021 at 7:08pm — 14 Comments

"कोई क्यों रहे "

1212 222 212

चढ़ान   में   भी    कोई   क्यों   रहे

ढलान में भी कोई क्यों रहे

सियासती   हो   रंग  ए  आसमाँ

उड़ान में भी कोई क्यों रहे

दुकान-ए-दिल ही जब हो लुट चुकी

अमान…

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Added by Aazi Tamaam on March 1, 2021 at 10:30am — No Comments

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