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ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

ग़ज़ल

2122  1212  22

सब दुआ का असर है क्या कहिए

बेबसी दर ब दर है क्या कहिए



याद करके तुझे महकता हूँ

फूल का तू शज़र  है क्या कहिए



की जमा मैंने दौलतें ताउम्र

साथ आखिर सिफर है क्या कहिए



खत लिखे थे जिसे कभी तुमने

अब भी वो बेखबर है क्या कहिए



है सुकूं ये कि मैं भी जिन्दा हूँ

ज़िन्दगी मुख़्तसर है क्या कहिए



खार राहों के कह रहे गुमनाम

अब तेरा घर ही घर है क्या कहिए



गुमनाम पिथौरागढ़ी…

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Added by gumnaam pithoragarhi on November 14, 2014 at 6:43pm — 6 Comments

नाटिका (लघु कथा )

नाटिका

ग्राम महोत्सव गरिमा बिखेर रहा था । लक –दक सजावट, बार –बालाओं की अठखेलियाँ, हास्य कलाकारों के करतब गज़ब ढाये हुए थे । सोम –रस की सरिता जन से  लेकर प्रतिनिधि तक को सराबोर किये थी । शीत ऋतु में उष्णता का अहसास ऐसा ही होता है। तन आधे –अधूरे ढँके होने से क्या? मन की उमंगों पर कोई लगाम न होनी चाहिए । हर तरफ मादकता छितरायी –सी जाती है, जो जितना  लपक -झटक ले। एक पत्रकार ने नेताजी से मुखातिब हो सलाम ठोंका । नेताजी  मुँह बिचकाते –बिचकाते रह गये ।कैमरे…

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Added by Manan Kumar singh on November 14, 2014 at 7:54am — 3 Comments

“बंधन”

मन धीरे धीरे रो ले,

कोई नहीं है अपना,

मुख आँसुओं से धो ले !

मन धीरे धीरे रो ले.....

मात –पिता के मृदुल बंधन में,

था जीवन सुखमय जाता !

ज्ञात नहीं भावी जीवन हित ,

क्या रच रहे थे विधाता !

अन भिज्ञ जगत के उथल पुथल,

क्या परिवर्तन वो निष्ठुर करता,

लख वर्तमान फूलों सी फिरती,

सखियों संग बाहें खोले !

मन धीरे धीरे रो ले.....

शुभ घड़ी बनी मम मात पिता ने,

वर संग बंधन ब्याह रचाया !

सजी पालकी लिए…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 14, 2014 at 2:30am — 5 Comments

हथेली (लघु कथा )

हथेली

अभी –अभी बुद्धिजीवियों की नगरी में सत्ता का चुनाव हुआ । किसी दल को जरूरी बहुमत नहीं हासिल हुआ । सत्ता –दल  धूल फाँकता नजर आया ।वह  चुने हुए प्रतिनिधियों की संख्या  के आधार पर तीसरे स्थान पर रहा ।  पहले सबसे बड़े दल की उम्मीदों पर झाडू फिर गया, हसरतों का फूल मुरझाते –मुरझाते बचा ।  । एक नवोदित दल को सदन में संख्या के अनुसार दूसरा दर्जा प्राप्त  हुआ । अब सरकार बने तो कैसे ? शासन –कार्य कौन देखेगा ?सत्ता –च्युत दल ने विपक्ष में बैठने की अपनी बात कही । दूसरे दर्जे वाले…

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Added by Manan Kumar singh on November 13, 2014 at 9:02am — 11 Comments

प्रतियोगिता

प्रतियोगिता

“ सर ,प्रतियोगिता में तो 24 प्रतिभागी आने थे पर हमें लेकर केवल 11 हैं | मज़ा नहीं आएगा |” वो थोड़ा निराश था |

“ये प्रतियोगिता है मेला नहीं ,वैसे भी पहले तीन ही जाने जाते हैं बाकी गिनतियों के बारे में कोई नहीं सोचता |येन-तेन प्रकारेण भवः विजयते |”

उनका कुटिल ज्ञान उसकी नसों में सुईयाँ चुभो रहा था |

सोमेश कुमार (मौलिक एवं प्रकाशित )

Added by somesh kumar on November 13, 2014 at 8:03am — No Comments

सनन्-सनन् चली पवन

सनन्-सनन् चली पवन

ले के पिया मेरा मन

बंधने लगा प्रेम में

देखो पिया धरती गगन !!

सनन्-सनन् चली पवन

नैन का कजरा तेरा

भडकाने लगा प्रेम अगन

उसपे तेरे हाथ…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 13, 2014 at 1:30am — 2 Comments

दवाईयाँ (कहानी)

हमेशा चुस्त दुरूस्त रहने वाले त्यागी जी को अचानक पेट मेँ दर्द की शिकायत हुई। कुछ ज़रूरी परीक्षणोँ के बाद ईलाज की आवश्यकता महसूस हुई किन्तु समस्या यह थी कि वे अंग्रेज़ी दवाइयोँ पर कम ही भरोसा करते थे अतः हौम्योपैथिक विधि से इलाज शुरू हुआ। जिसमेँ चार दवाएँ एक एक घण्टे के अंतराल पर सुबह शाम 20 दिन तक लेनी थी।

उस समय उनकी श्रीमती जी शहर मेँ नही थी अतः वे फोन पर नियमित रूप से पूछताछ करतीँ-

-"आपने दवाईयाँ ले ली?"

-"हाँ। ले ली, पर तुम कभी खाने के बारे मेँ भी पूछ लिया करो। खाना खाने के बाद… Continue

Added by pooja yadav on November 12, 2014 at 1:00pm — 10 Comments

खेतों की हरियाली गुम है

खेतों की हरियाली गुम है

गाँवों की खुशहाली गुम है

 

बंद जहाँ है खुशियाँ सारी

उस ताले की ताली गुम है

 

जाने किस जंगल में गुम हूं

दुनिया देखी भाली गुम है

 

कैसी फ़सलें बोयी माधो

बूटे गायब बाली गुम है

 

शहरों में मजदूरी करते

बागों के सब माली गुम है

 

झूलों वाला सावन गुमसुम

अमुवे वाली डाली गुम है

 

क्यूं पलकें ‘खुरशीद’ हुई नम

वो अलकें घुँघराली गुम है 

मौलिक व…

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Added by khursheed khairadi on November 12, 2014 at 9:30am — 7 Comments

एक छईण्टी आलू

एक छईण्टी आलू

बात पुरानी है , गाँव से जुड़ी हुई । बटेसर के काका यानि पिताजी विद्या बोले जाते थे । सब उनको बाबा कहते तथा बटेसर को काका ।  लिखने –पढ़ने के नाम  पर  बाबा का बस अंगूठे के निशान से ही काम चल जाता था , पर अच्छे –अच्छों को बातों में धूल चटा देना उनके बायें हाथ का खेल था ।बथान में बैलों को सानी (खाना –पानी ) दे रहे बटेसर से बात करते –करते भोला को कुछ याद आया, तो वह कुएँ से पानी निकलते बाबा की ओर मुड़कर बोला , ‘ बाबा ! उ महेसर भाई के आलू…

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Added by Manan Kumar singh on November 12, 2014 at 9:00am — 7 Comments

रेस का घोड़ा (लघुकथा)

“बेटा, 20 हज़ार में क्या होगा ? कुछ और कोशिश कर, आखिर तेरी दीदी की शादी है !“

“सुना है भईया ने 5 हज़ार देकर हाथ खड़े कर लिए हैं | वो उनकी बहन नहीं है क्या ?“

वो बढ़ते बोझ और थकान से टूटने लगा था |

“बेटा ! लंगड़े और बिदकने वाले घोड़ो को रेस में नहीं रखा जाता |“

पक्षपात माँ की बेबसी थी  |

.

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by somesh kumar on November 12, 2014 at 9:00am — 6 Comments

ठूँठ

ठूँठ  

था हराभरा मेरा संसार

खुशियाँ लगती थी मेरे द्वार

हरी हरी मेरी शाखायें

फूल पत्ते भरकर इठलाये||

 

मेरा जीवन उनसे था और

उन सब से ही में जीता था

छांव पथिक सुस्ता लेता था

थकन अपनी बिसरा देता था||

 

समय ने ऐसा खेल दिखाया

दूर हो गयी मेरी ही छाया

छोड़ गये सब मुझको मेरे

एक एक कर देर सबेरे||

 

कद मेरा यूँ हुआ बढ़ा

रह गया आज अकेला खड़ा

रूप…

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Added by sarita panthi on November 12, 2014 at 7:49am — 10 Comments

सड़क भी अब मुझसे तेज दौड़ती है

तुम

मेरी प्रतीक्षा करना

उस मोड़ पर

मुड जाता है जो

मेरे घर की ओर

मैं दौड़ कर पहुचुंगा

तब भी

जबकि मैं जानता हूँ

सड़क भी अब…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 11, 2014 at 9:00pm — 18 Comments

ठूँठ (लघुकथा)

"अरे वो पेड़ कहा गया , गिर गया क्या ?"

"नहीं चाची , ठूँठ था तो काट दिया लोगों ने "|
बेऔलाद चाची को कुछ चुभा और वो तेजी से आगे बढ़ गयीं |

.

( मौलिक एवम अप्रकाशित )

Added by विनय कुमार on November 11, 2014 at 7:30pm — 14 Comments

ग़ज़ल-मुद्दतों से वो तेरी तस्वीर धुँधलाती नहीं

2122 2122 2122 212

---------------------------------

तंग सी तेरी गली की याद वो जाती नहीं 

मुद्दतों से वो तेरी तस्वीर धुँधलाती नहीं

..

बे-जबाबी हो चुके हैं ला-ज़बाबी ख़त मेरे 

क्या मेरी चिट्ठी तेरे अब दिल को धड़काती नहीं

..

खत्म होने को चला है सिलसिला तेरा मेरा 

बेव़फाई पर तेरी क्यों आके पछताती नहीं

..

झूठ से तकदीर लिखना खूब आता है तुझे

लूटकर तू दिल किसी का लौट कर आती नहीं

..

खौफ़ हावी हो चुका है आज तेरा शहर में

कत्ल करके भी तेरी…

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Added by umesh katara on November 11, 2014 at 6:45pm — 8 Comments

परिचय हुआ जब दर्पण से

परिचय  हुआ  जब  दर्पण से ….

परिचय  हुआ  जब  दर्पण  से

तो  चंचल  दृग  शरमाने  लगे

अधरों  में   कंपन  होने  लगी

अंगड़ाई के मौसम .छाने लगे

परिचय  हुआ  जब  दर्पण से ….

ऊषा   की   लाली  गालों   पर

प्रणयकाल    दर्शाने      लगी

पलकों को  अंजन  भाने लगा

भ्रमर   आसक्ति  दर्शाने  लगे

परिचय  हुआ  जब  दर्पण से …

पलकों के  पनघट  पर   अक्सर

कुछ  स्वप्न  अंजाने  आने लगे

बेमतलब    नभ   के   तारों  से…

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Added by Sushil Sarna on November 11, 2014 at 1:30pm — 8 Comments

दिल्ली के दावेदारों

दिल्ली के दावेदारों तुम , देहातों में जाकर देखो

तकलीफ़ों की लहरें देखो ,गम का गहरा सागर देखो

 

सूरज अंधा चंदा अंधा , दीप बुझे हैं आशाओं के

रातें काली हैं सदियों से , और दुपहरें धूसर देखो

 

निर्धन की झोली में है दुख ,मौज दलालों के हिस्से में

कुटिया देखो दुखिया की तुम ,वैभव मुखिया के घर देखो

 

मोती निपजाने वाले तन ,धोती को तरसे बेचारे

गोदामों में सड़ता गेंहूं , भूखे बेबस हलधर देखो

 

आँसू गाँवों के भरते हो ,…

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Added by khursheed khairadi on November 11, 2014 at 9:00am — 8 Comments

जलावन

जलावन

शहर की सरकारी डिस्पेंसरी में छांटे गए पेड़ो की टहनियों ने उसकी आँखों में चमक पैदा की |हर चौथे रोज़ वो छोटे सिलिंडर में 100 रुपया की गैस भराती थी और अगर काम मिले तो एक रोज़ की मजूरी थी-250 रुपया | यानि इतना जलावन मतलब 800 रुपया |तीनों बच्चों के सरदी के पुराने कपड़े वो नए पटरी बज़ार से खरीद लेगी यानि कि उनकी दिवाली |वैसे भी उसका बेवड़ा-निठल्ला पति रोज़ उसकी गरिमा को तार-तार करता था फिर चौकीदार को तो उन जलावन का हिसाब भी देना होता है आखिर सर्दीयां आ रही थीं |

सोमेश कुमार (मौलिक एवं…

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Added by somesh kumar on November 11, 2014 at 8:00am — 5 Comments

भविष्य (लघुकथा)

महज 12 वर्ष की कच्ची उम्र मेँ ही परिस्थितियोँ मेँ ढल गया था वो। जिस उम्र मेँ बच्चोँ को खेल खिलौनोँ सैर सपाटोँ का शौक होता है उस उम्र मेँ मोहन को बस एक ही शौक था- पढ़ने का। पढ़ाई मेँ तेज मोहन बड़ा ही महत्वाकांक्षी बालक था। लेकिन वक्त की ये टेढी-मेढी गलियाँ कब, किसे, ज़िन्दगी का कौन सा मोड़ दिखा देँ कौन जाने ? ऐसी ही किसी गली के मोड़ पर मोहन ने वो गरीबी देखी जिसमेँ दो जून का भोजन भी मुश्किल होता था और स्कूल तो दूर-दूर तक दिखाई न पड़ता था। पर मोहन भला कैसे हार मानता ? उसे तो बड़ा आदमी बनना था। इस सुखद…

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Added by pooja yadav on November 11, 2014 at 1:00am — 15 Comments

मुक्त हो गयी आत्मा

मुक्त हो गयी आत्मा !

अपने शरीर के बन्धनों से !!

स्तब्ध रह गयी निशा

मृत शरीर के क्रन्दनो से

मुक्त हो गयी आत्मा !

अपने शरीर के बन्धनों से !!

दूर हो गयी आत्मा

अतीत के स्पन्दनो से

राख हो  गया शरीर

जलते हुये चन्दनों से

मुक्त हो गयी आत्मा !

अपने शरीर के बन्धनों से !!

शरीर आसक्त हो गया

प्रिया में अंतर्नयनों से

आत्मा छल गयी उसे

अनासक्ति के प्रपंचों से

मुक्त हो गयी आत्मा…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 10, 2014 at 7:00pm — 6 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : श्रेष्ठ कौन ? (गणेश जी बागी)

                     पीतल और ऐलुमिनियम के बर्तनों में वर्चस्व की लड़ाई होने लगी, आखिर तय हुआ कि चाँदी महाराज से निर्णय करवाया जाये कि कौन श्रेष्ठ है । पीतल ने कहा कि उसके बर्तनों में देवों को भोग लगाया जाता है, कुलीनजनों के पास उसका स्थान है जबकि ऐलुमिनियम के बर्तनों में झुग्गी-झोपड़ी के लोग खाते हैं और तो और इसका कटोरा भिखमंगे लेकर घूमते रहते हैं । 

                    ऐलुमिनियम अपने पक्ष में कोई विशेष दलील नहीं दे सका…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 10, 2014 at 4:21pm — 31 Comments

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