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खेतों की हरियाली गुम है

खेतों की हरियाली गुम है

गाँवों की खुशहाली गुम है

 

बंद जहाँ है खुशियाँ सारी

उस ताले की ताली गुम है

 

जाने किस जंगल में गुम हूं

दुनिया देखी भाली गुम है

 

कैसी फ़सलें बोयी माधो

बूटे गायब बाली गुम है

 

शहरों में मजदूरी करते

बागों के सब माली गुम है

 

झूलों वाला सावन गुमसुम

अमुवे वाली डाली गुम है

 

क्यूं पलकें ‘खुरशीद’ हुई नम

वो अलकें घुँघराली गुम है 

मौलिक व अप्रकाशित 

 

Views: 499

Comment

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Comment by Hari Prakash Dubey on November 13, 2014 at 9:36pm

शहरों में मजदूरी करते

बागों के सब माली गुम है...शानदार रचना ,हार्दिक बधाई !

Comment by shree suneel on November 13, 2014 at 8:29pm
"Band jahan hain khushiyan saari/
us taale ki taali gum hai."
kya baat hai sahab!
bahut khoob!
Comment by Sushil Sarna on November 12, 2014 at 7:02pm


बंद जहाँ है खुशियाँ सारी
उस ताले की ताली गुम है.… बहुत सुंदर बात कही है आपने आदरणीय। …इस सुंदर और दिल छूती रचना की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Shyam Narain Verma on November 12, 2014 at 5:43pm

बहुत सुंदर गज़ल। बधाई।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on November 12, 2014 at 2:59pm

वह वाह ---

सुन्दर गजल

क्यूं पलकें ‘खुरशीद’ हुई नम

वो अलकें घुँघराली गुम है 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 12, 2014 at 11:47am

//कैसी फ़सलें बोयी माधो

बूटे गायब बाली गुम है//

ग़ज़ल बढ़िया हुई है आ० खुर्शीद खैराड़ी साहिब, दाद स्वीकार करें।

Comment by somesh kumar on November 12, 2014 at 11:34am

बहुत खूब भाई जान !

जो गुम है खोज लाएँगे 

मिलकर नई मौज़ लाएँगे 

बर्बाद बस्ती पे रोना कैसा 

हम बहारें खोज लाएंगे |

कृपया ध्यान दे...

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