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प्राण-समस्या .... (विजय निकोर)

प्राण-समस्या

 

सहारा युगानयुग से

फूलों को बेल का, पाँखुरी को फूल का

पत्तों को टहनी का

अब मुझको .... तुम्हारा

बहुत था

बाहों को साँसो के लिए ....

 

कुछ भी तो नहीं माँगा था

तुमने मुझसे

न मैंने तुमसे .... इस पर भी

स्नेह का अनन्त विस्तार

अभी भी बिछा है बिना तुम्हारे

बारिश की बूँदों में बारिश के बाद

आँगन की सोंधी मिट्टी में

कि जैसे .... तुम आ गए

 

हर खुला-अधखुला…

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Added by vijay nikore on December 16, 2013 at 7:00am — 20 Comments

दोहे -12 (पापा कहते थे)

धैर्य रखो मत हो विकल,सुन लो मेरी बात!

अल्प दिवस हैं कष्ट के ,होगी स्वर्ण प्रभात!!

लोभ कपट को त्यागकर,मीठी वाणी बोल!!

यह जीवन का सार है,सहज वृत्ति अनमोल!!

अपनापन गोठिल जहाँ,वहाँ परस्पर द्वंद !

पापा कहते थे वहाँ ,बढ़ते दुःख के फंद!!

भ्रष्ट आचरण त्यागकर,करना मधुरिम बात !

होगी वर्षा नेह की,प्यार भरी सौगात !!

पापा कहते थे सदा,सुन लो मेरे लाल!

जीवन में होना सफल ,बहके कदम सँभाल!!

सत्कर्मों से ही…

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Added by ram shiromani pathak on December 15, 2013 at 11:00pm — 15 Comments

मेरा श्रृंगार

मन अशांत चेहरा शान्‍त

आँखे शुन्‍य में निहारती

चारो तरफ था शोर था

मेरी गोद में सोया

मेरा सुहाग था

जीवन का उजाला

बच्‍चों का पालक

मेरा साहस मेरा श्रृंगार था

आज बीमार था

यहाँ मौत से थी जंग

वहाँ हड़तालियों की

वार्ता सरकार के संग

रोके थे गाड़ीयों के पहिये

आवाज साथीयों साथ रहीये

आती थी हिचिकियाँ बार बार

मौत का मौन निमंन्‍त्रण

मैं लाचार,कैसे चले पहीये

मेरा बच्‍चा जो चुप…

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Added by Akhand Gahmari on December 15, 2013 at 9:00pm — 7 Comments

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा



देख हताशा की मिट्टी मन में लिपटी है

स्वार्थ सिद्धि में लिप्त भावना भी सिमटी है

ले आओ तूफान के मिट्टी ये उड़ जाए

मन का दिव्य प्रकाश देख तम भी घबराए



कब तक अनुमानों के दुनिया मे खोएगा

चिर निद्रा से जाग युवा कब तक सोएगा





स्वाभिमान खो गया तुम्हारा क्यूँ ये बोलो

तनमन से नंगे होकर तुम जग भर डोलो  

संस्कार मर्यादाओं का भान नहीं है

यकीं मुझे आया के तू इंसान नहीं है

   

जन्म…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 15, 2013 at 8:45pm — 4 Comments

हम तो बहुत दूर आ गए ....

वो हँसना, वो रोना 

वो दौड़ना, वो भागना 

वो पतंगे, वो कंचे

जने कहाँ छूट गए... 

अरे...... हम तो बहुत दूर आ गए... 

वो खेला, वो मेला 

वो संगी, वो साथी 

वो गुल्ली, वो डंडा 

वो चोर, वो सिपाही 

जाने कहाँ छूट गए ....

अरे...... हम तो बहुत दूर आ गए... 

वो खुशी, वो हंसी 

वो खो-खो, वो कबड्डी 

वो आईस-पाईस, वो ऊंच-नीच 

जाने कहाँ छूट गए.... 

अरे...... हम तो बहुत दूर आ गए... 

अम्मा की रोटी, उनकी…

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Added by Amod Kumar Srivastava on December 15, 2013 at 8:30pm — 4 Comments

अभी विश्राम कहाँ

कह पथिक विश्राम कहाँ

मंजिल पूर्व आराम कहाँ

 

रवि सा जल

ना रुक, अथक चल

सीधी राह एक धर

रह  एकनिष्ठ

बढ़ निडर .

अभी सुबह है, 

बाकी है अभी

दुपहर का तपना.

अभी शाम कहाँ,

मंजिल पूर्व आराम कहाँ.

 

चलना तेरी मर्यादा

ना रुक, सीख बहना

अवरोधों को पार कर

मुश्किलों  को सहना

आगे बढ़ , बन जल

स्वच्छ, निर्मल

अभी दूर है सिन्धु

अभी मुकाम कहाँ

मंजिल पूर्व आराम…

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Added by Neeraj Neer on December 15, 2013 at 7:00pm — 10 Comments

हूँ प्यासा इक महीने से /ग़ज़ल/ संदीप पटेल "दीप"

हजज मुरब्बा सालिम

१२२२/१२२२

हूँ प्यासा इक महीने से

मुझे रोको न पीने से



पिला साकी  सदा आई

शराबी के दफीने से  



पिला बेहोश होने तक

हटे कुछ बोझ सीने से 



न लाना होश में यारो

नहीं अब रब्त जीने से 

 

उतर जाने दो रग रग में 

उड़े खुशबू पसीने से

जिसे हो डूबने का डर 

रखे दूरी सफीने से



हुनर आता है जीने का

है क्या लेना करीने से  



गिरा न अश्क उल्फत में

ये…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on December 15, 2013 at 11:30am — 14 Comments

मेरी मां ने मुझे रोते हुए हंसना सिखाया है

मेरी दादी बताती थी कि ये सब मोह माया है,

कोई परियों की रानी है ये नानी ने बताया है।।



शिवपुरीवासियों दुगनी मोहब्बत से सुनो मुझको,

कटे हैं पंख पंछी के ये अब तक उड न पाया है।।



नहीं जब मानता था बात थप्पड मार देती थी,

मेरी मां ने मुझे रोते हुए हंसना सिखाया है।।



घमंडी मत बनो दौलत का पीछा मत करो इतना

जो अपने पास होता है वो भी सब कुछ पराया…

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Added by atul kushwah on December 14, 2013 at 9:30pm — 9 Comments

तुम्हारी मुस्कुराहट को गजल हमने बनाया है

मोहब्बत में तुम्हारा ही लबों पर नाम आया है,

भ्रमर की गुनगुनाहट का कली पर रंग आया है।

यहां हर बज्म तेरे नाम से गुलजार होती है,

तुम्हारी मुस्कुराहट को गजल हमने बनाया है।।

---------------------------------

दिवाली लब से बोलो तो अली का नाम आता है

जनम भर सिर झुकाने का सलीका काम आता है,

मुल्क में धर्म को लेकर उपद्रव पालने वालों

लिखो और ​फिर पढो रमजान में भी राम आता है।।

---------------------------------------

कली जब फूल बन जाए, भ्रमर तब…

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Added by atul kushwah on December 14, 2013 at 9:30pm — 6 Comments

सौदा नहीं किया कभी अपने जमीर का

सीमित संसाधनों के साथ

महती भौतिकता वादी प्यास की तृप्ति

शायद प्रेरित करती है तुम्हे सतत

बेच देने के लिए अपना जमीर ......

शराब और शबाब में मस्त

अपने दांतों से खींचते हुए

रोस्टेड चिकेन की टाँगे

भूलते रहे हो तुम अपने शक्ति और अधिकार ...

फिर  समाज में रुतवा कायम करने की;

एक अच्छा पिता और पति कहलाने की ;

तुम्हारी ख्वाइश ने भी जी भर हवा दी है  

अधिक से अधिक धनोपार्जन की तुम्हारी प्यास को

जायज या नाजायज

किसी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 14, 2013 at 4:29pm — 7 Comments

साँसें लम्हों का क़र्ज़ मुझे बाँटती रहीं ......

साँसें लम्हों का क़र्ज़ मुझे बाँटती रहीं

ज़ख़्मों पे ख्वाहिशों के दर्द टाँकती रहीं

सोचा था कोशिशों को मिलेगी तो कहीं छाँव

क़िस्मत की मुठ्थियाँ ये जलन बाँटती रहीं

बच्चों की तरह बिल्कुल मिट्टी की स्लेट पर

हाथों की लकीरें भी वक़्त काटती…

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Added by ajay sharma on December 13, 2013 at 10:34pm — 5 Comments

थकन जो बाँट ले वो खंडहर हूँ मैं...............

ग़म ए दौरा से बेख़बर हूँ मैं 
निरंतर बह रहा हूँ समंदर हूँ मैं

सफ़र का बोझ उठाए हुए परिंदों की 
थकन  जो बाँट ले वो खंडहर हूँ मैं

ले ले इम्तहाँ मेरा कोई तूफ़ा भी अगर चाहे 
ज़ॅमी पे सब्र की ज़िद का इक घर हूँ मैं

गमों के काफिलों की राह मैं "अजय" 
उम्मीद का इक पत्थर हूँ मैं

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by ajay sharma on December 13, 2013 at 9:30pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दो कुण्डलिया // --सौरभ

1)

आपस  के  संवाद में,  कितने  ही  मंतव्य !

कुछ तो हैं संयत-सहज, अक्सर हैं वायव्य

अक्सर  हैं   वायव्य,   शब्द से  चोट करारी

वैचारिक …

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Added by Saurabh Pandey on December 13, 2013 at 2:00am — 55 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम ( गज़ल ) गिरिराज भंडारी

2122  2122   2122  212

सिलसिले उनके छिपे, कांटो से भी मिलते गये 

फिर भी ऐसा क्यों हुआ वो फूल सा खिलते गये

 

राह मे दुश्वारियां थीं जब चले थे घर से हम

बिन रुके चलते रहे तो रास्ते मिलते गये 

 …

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Added by गिरिराज भंडारी on December 12, 2013 at 9:30pm — 32 Comments

ग़ज़ल-निलेश'नूर'-न समझो लड़ाई वो हारा हुआ है

१२२/१२२/१२२/१२२ 



न समझो लड़ाई वो हारा हुआ है,

उसे हारने का इशारा हुआ है.

***

उसे चाँद तारों की संगत मिली थी,

वो आवारगी में हमारा हुआ है.

***

मरूँगा, बचूंगा, नहीं है पता ये,

मगर वार दिल पे, करारा हुआ है.

***

बचा है वो ऐसे, जिसे डूबना था,      

कि फिर कोई तिनका सहारा हुआ है.  

***

सिकुड़ने लगा है मेरा आसमां अब,

नज़र से नज़र तक, नज़ारा हुआ है. 

***

वो आतिशफिशा था, मगर अब ये…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on December 12, 2013 at 9:17am — 44 Comments

क्षणिकाएं

1-मरणोपरांत

भूख से मरा था

शायद! इसीलिए

मरणोपरांत अखबार में

फ़ोटो छपी है

२-लाभ

आपके हीरे कि अँगूठी से अच्छा तो मेरा

मिट्टी का दीपक है

कम से कम

रात में प्रकाश तो फैलाता है

३-सौदा

आज उसके बच्चे भूखे नहीं सोये

वो कह रहा था

कुछ फर्क नहीं पड़ता

थोड़ा रक्त बेचने पर

४-तृप्ति

भूख शांत हो गयी

जली रोटी थी तो क्या? हुआ…

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Added by ram shiromani pathak on December 12, 2013 at 12:21am — 27 Comments

ठिठुरता मन........

रात का दूसरा पहर 

दूर तक पसरा सन्नाटा और

गहरा कोहरा

टिमटिमाती स्ट्रीटलाइट

जो कोहरे के दम से

अपना दम खो चुकी है लगभग

कितनी सर्द लेहर लगती है

जैसे कोहरे की प्रेमिका

ठंडी हवा बन गीत गाती हो

झूम जाती हो

कभी कभी हल्के से

कोहरे को अपनी बाहों में ले

आगे बढ़ जाया करती

पर कोहरा नकचढ़ा बन वापस

अपनी जगह आ बैठता

ज़िद्दी कोहरा प्रेम से परे

बस अपने काम का मारा

सर्द रात में खुद का साम्राज्य

जमाये है हर…

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Added by Priyanka singh on December 11, 2013 at 10:00pm — 41 Comments

वही कल वही आज

है वही रास्‍ते 

पथरीले चौड़े

पतले पक्‍के

घट गये रास्‍ते

बढ़ गयी दूरियाँ

 है वही गिलास

शरबतों से भरे

शराब से खाली

नशा प्‍यार का

नशा नशा का

दरवाजों पे दरबार

मन की शांति

मन का तनाव

भूला प्‍यार

बचा टकरार

वही है  रिश्‍ते

निभाने की होड़

दिखावट की होड़

मदद चाहत

मदद डर

प्रेम है वहीं

मन का मिलन

तन का मिलन

समर्पित  हम

धन…

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Added by Akhand Gahmari on December 11, 2013 at 9:00pm — 13 Comments

अमृता प्रीतम जी और ईश्वर ... (विजय निकोर)

अमृता प्रीतम जी और ईश्वर

कई लोग जो अमृता प्रीतम जी की रचनाओं से प्रभावित हैं अथवा उनके जीवन से परिचित हैं, उनकी मान्यता है कि अमृता जी विधाता में विश्वास नहीं करती थीं। इस कथन में वह ठीक हैं भी और नहीं भी। यह इसलिए कि अमृता जी का लेखक-जीवन इतना लम्बा था कि यह मान्यता इस पर निर्भर है कि वह कब किस पड़ाव में से गुज़रीं, और उनकी उस पड़ाव के दोरान की रचनाएँ क्या इंगित करती हैं।

 

अमृता जी की रचनाओं के लिए असीम श्रद्धा के नाते और जीवन को उनके समान असीम…

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Added by vijay nikore on December 11, 2013 at 5:30pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
"सजावट" अतुकांत - (गिरिराज भंडारी)

मुश्किल काम होता है

चढ़ाये रखना ,

लगातार बहुत समय तक 

सजावट को ,

रह पाये कोई अगर तुम्हारे साथ

अधिक समय तक

लगातार, तो

फीकी पड़ने लगेंगी…

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Added by गिरिराज भंडारी on December 11, 2013 at 5:00pm — 27 Comments

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