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गरमी बाकी है |

झमाझम गिरे बारिश  ,  राहत मिला मिली तपन से |
लू का घेरा  बंद हुआ   ,  मलय शीतल पवन से |
आँखों में  पड़े ना धूल , कीचड से पाँव…
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Added by Shyam Narain Verma on May 31, 2013 at 4:00pm — 3 Comments

अचानक



उस दिन अचानक

न मैंने कुछ सोचा था ,

न वक्त ने कुछ तय किया था .

आकाश भी नीला था

उसने भी तो कुछ सोचा नहीं था -

फिर राह में आ गया बादल

हम आपस में टकरा गये

न उसने कुछ कहा

न मैंने कुछ कहा .

हवा धीरे धीरे बह रही थी ,

मुझे देख ठिठक गयी ,

पर, मैं अभिमानिनी ,

जैसे कुछ सुनने की अपेक्षा ही नहीं .

कुछ दूर चल कर बादल रूका ,

वह चाहता था मुझसे कुछ सुनना ,

पर , मैंने कुछ न कहा.

एक अंतराल बाद

जिसमें समय की…

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Added by coontee mukerji on May 31, 2013 at 4:00pm — 14 Comments

निवेदन (घनाक्षरी छंद )

कहते हो देशभक्त ,यदि अपने को आप !

लोग दे उदहारण ,ऐसा कर जाइये !!

तन मन धन सब ,लगाओ देश सेवा में !

लोग आप से ले सीख ,कुछ तो बताइये !!

देश का भी हो विकास ,खुद भी विकास करो !

जग में हो नाम ऐसे ,मान को बढ़ाइये!!

मात्र भाषणों से काम,…

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Added by ram shiromani pathak on May 31, 2013 at 1:00pm — 11 Comments

हिंदी का आम के लिए सरल उपयोग हो

प्रिय मित्रों, 

हिंदी में आम पाठकों के लिए क्लिष्ट भाषा का उपयोग नहीं होना चाहिए, ऐसा मेरा मानना है. हिंदी निश्चित ही अपार शब्दों का समंदर है जिसमे सरल से लेकर कठिन, उच्च और बौद्धिक शब्दों की भरमार है. साहित्यकारों, हिंदी प्रेमियों, हिंदी विषय के ज्ञाताओं और हिंदी का ज्ञानार्जन करने वालों के सन्मुख क्लिष्ट भाषा का उपयोग समझ आता है मगर जब आम पाठकों, श्रोताओं, दर्शकों की बात सामने आती है तब कवि को, लेखक को, नेता को, साहित्यकार को,  मीडिया को या कोई भी रचनाकार को आम जनता की मनोस्थिति,…

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Added by dinesh solanki on May 31, 2013 at 7:51am — 7 Comments

भारतीयता रही न ध्यान है

छंद विधान - रगण जगण' की ५ आवृत्तियों के बाद एक गुरु

राष्ट्र स्वाभिमान की प्रतीक है ध्वजा त्रिवर्ण किन्तु अग्नि वर्ण केतु का रहा न मान है
द्रोह की प्रवृत्ति द्रोह को बता रही महान और दिव्य भारतीयता रही न ध्यान है
अन्धकार का प्रसार हो रहा अपार बन्धु मानवीय मूल्य का न लेश मात्र ज्ञान है
राष्ट्रवाद का झुका हुआ निरीह शीश देख राष्ट्रद्रोह का यहाँ तना हुआ वितान है
रचनाकार
डॉ आशुतोष वाजपेयी
ज्योतिषाचार्य
लखनऊ

Added by Dr Ashutosh Vajpeyee on May 31, 2013 at 7:30am — 17 Comments

गज़ल - तेरे मालिक से तो तेरा तलबगार अच्छा है

मांगने वाले से छीनने वाला हकदार अच्छा है 

हाल तो पूछ ही लिया चलो बीमार अच्छा है 

आज बोलता कुछ है कल कुछ और करता है 

शहर के सभी…

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Added by Yogendra Singh on May 30, 2013 at 8:00pm — 17 Comments

त्रिशंकु मन

शंक निशंक त्रिशंकु मन,

मचि रही उथल पुथल,

जीत हार का फेर करत

उठा पटक यह त्रिशंकु मन।

 

अंतर्द्वंद  हिंडोल के बीच,…

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Added by annapurna bajpai on May 30, 2013 at 5:30pm — 4 Comments

मेरी शब्द यात्रा----नदी...

---नदी...



नदी के कई नाम हैं...'सरिता, सरी, दरिया..........' अनवरत बहता हुआ स्वच्छ पानी -नदी कहलाता है. पर आजकल के सन्दर्भ में दरिया वो भी साफ़ पानी का थोड़ा मुश्किल है. नदी बहते हुए कभी शांत तो कभी चंचल हो जाती है. अमूमन दरिया शांत बहने वाली धारा लगती है.ये अपने मूल स्थान से जब निकलती है तो प्रायः पतली धारा ही होती है ठीक किसी नवजात शिशु की तरह. जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती है उसके वेग में परिवर्तन होता जाता है जब पर्वत और पहाड़ों से अपनी यात्रा आरंभ करती है तो उसकी रवानी…

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Added by Veena Sethi on May 30, 2013 at 4:30pm — 8 Comments

खाली बोतल..

सड़क  पर पड़ी

खाली बोतल

लोग आते- जाते

ठोकर मार जाते हैं .....

और इस तरह

यहाँ से वहाँ भटकती  ....

न जाने कहाँ से कहाँ

पहुँच जाती है

ये खाली बोतल…

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Added by Sonam Saini on May 30, 2013 at 11:30am — 8 Comments

तब होके रहेगा गोल...!

तब होके रहेगा गोल...!

---------------------------

पूछा मैंने नन्ही शहरी चिड़िया से

तपती धरती पर तुम क्यों

इस तरह उतर आई .....!

आकाश की ओ स्वछन्द परी,

स्वार्थी इंसानों की दुनिया में

नाहक ही मरने को आयी?

बोली बेचारी मायूस होकर

जहाँ जहाँ था हमारा बसेरा

वहां वहां कट गये वृक्ष के आशियाने

तन गए इंसानों के गगनचुम्बी महल

ये देख हमारी बिरादरी के दिल गए दहल.

अब न मिलती छाँव है

न हवा, न मिलता कहीं जल है.

मैं सोच रही…

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Added by dinesh solanki on May 30, 2013 at 8:30am — 11 Comments

“थाम अंगुली जो चलाये वो पिता होता है”

“थाम अंगुली जो चलाये वो पिता होता है”

ये पंक्ति तो है हमारी। अब आप इसमें तीन पंक्तियाँ और जोड़ कर चार पंक्तियों का एक मुक्तक बना दीजिये। जिन कवि मित्रों की चार लाइन की रचना हमें पसंद आयेगी, हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका “प्रयास” के जून अंक (पिता विशेषांक) में प्रकाशित की जायेंगी। आप अपनी रचना www.vishvahindisansthan.com पर पोस्ट कर सकते हैं या prayaspatrika@gmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं…

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Added by Prof. Saran Ghai on May 30, 2013 at 4:21am — 1 Comment

शार्दूलविक्रीडित छंद

शार्दूलविक्रीडित छंद

इस छन्द में चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में १९ वर्ण होते हैं। १२ वर्णों के बाद तथा चरणान्त में यति होती है। गणों का क्रम इस प्रकार है - गुरु-गुरु-गुरु (मगण ), लघु-लघु-गुरु (सगण ), लघु-गुरु-लघु (जगण), लघु-लघु-गुरु (सगण ) गुरु-गुरु-लघु (तगण ), गुरु-गुरु-लघु (तगण ), गुरु |

 

माँ विद्या वर दायिनी भगवती, तू बुद्धि का दान दे |

माँ अज्ञान मिटा हरो तिमिर को, दो ज्ञान हे शारदे ||

हे माँ पुस्तक धारिणी जगत में, विज्ञान विस्तार दे…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 29, 2013 at 7:26pm — 10 Comments

दोहे

पहला प्रयास है ,निसंकोच समझा दीजिए 

धरती के चिथड़े हुए ,जल बिन सब बेजान |
खाली बर्तन ले सभी ,भटक रहे इन्सान ||

गर्मी से सूखा बढ़ा , जल की हाहाकार |
अफरा तफरी है मची ,प्यासे है नर नार ||

ताल भये सूखे सभी, पारा बढता जाय |
खाली गागर ले फिरे, पानी नजर न आय ||

मिनरल वाटर कंपनी ,धार रूप विकराल |
पानी सारा ले उडी ,जन जन है बेहाल ||

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Sarita Bhatia on May 29, 2013 at 6:32pm — 18 Comments

सार्थक मन की दौड़ है (दोहे)



मानव दौड़ें राह पर, थकते उसके पाँव

आत्मा नापे दूरियाँ, नगर डगर हर गाँव |

 

थक जाते है पाँव जब, फूले उसकी साँस,

मन तो अविरल दौड़ता,मन में हो विश्वास |

 

सार्थक मन की दौड़ है, भौतिकता को छोड़

सही राह को जान ले, उसी राह पर दौड़ |

 

पञ्च तत्व से तन बना, जिसका होता अंत

बसते मन में प्राण है, जिसकी दौड़ अनंत…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 29, 2013 at 6:17pm — 15 Comments

बेचारा मजनू

नाच नचाइ रही सबको अरु ,झूठ फरेब लिए बहु रंगे!

प्रेम क पाठ पढ़ाइ सबै फिर, भाग गयी वह दूसर संगे !!

रूप बिगाड़ फिरे मज़नू बन ,लागत हो जइसे भिखमंगे !

आपन बाल उखाड़ रहे अब ,आवत देखि दया…

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Added by ram shiromani pathak on May 29, 2013 at 3:30pm — 12 Comments

रफ्तार बढ़ा...

जो बीत गयी सो बात गयी ...ये बात किसी ने खूब कहीं

अब क्या सोचे तू ,पड़ा-पड़ा ..उठ जाग जा अब रात गयी

कर तैयारी अब आगे की ,कि रात गयी तो बात गयी 

फिर ना कहना ऐ-यार मेरे .. सारी मेहनत बेकार…

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Added by POOJA AGARWAL on May 29, 2013 at 3:30pm — 10 Comments

वो मै था .कि......

..वो मै था .कि......

जो सबके साथ चलना चाहता था ,

पर ये वो थे , अपने को मेरा सहारा समझ बेठे ,

वो मै था , जो प्यार को खुदा मानता रहा ,

पर ये वो थे की मेरे प्यार मे , लालच को तलाशते रहे,

वो मै था, सबसे छोटा बना हुआ था ,

पर ये वो थे सब अपने को बड़े बना बेठे ,

एक मै था कि घर अपना न बना पाया अभी तक

पर ये वो थे सब महल सजा बेठे ,

वो मै था कि बेठा रहा इंतजार मे मौत तक ,

पर ये वो थे कि मुड़ कर भी न देखा रहे गुजर मे…

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Added by aman kumar on May 29, 2013 at 2:00pm — 15 Comments

सब्ज़ दिल

प्रेम के विशाल बटवृक्ष 

जिसमें भावनाओं की गहरी 

जड़ें और यकीन की 

मजबूत साखें

उसमें झूमता है 

इठलाता है 

सब्ज़ दिल 



रिवाजों और रस्मों की 

तेज आँधियाँ भी 

बेअसर होती हैं इस 

विशाल वृक्ष के आगे

जब यकीन के मजबूत तने में 

तना होता है…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on May 29, 2013 at 12:00pm — 9 Comments

मन मूरख

मान मान मन मूरख मेरे,

मत फंस विषय जाल मे,

जो सुख चाहे भाग विषयन से,

मत इन फंद फंसे री ।

जनम जनम नहि इनसे उबरें,

ताते ध्यान धरे…

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Added by annapurna bajpai on May 29, 2013 at 8:30am — 7 Comments

हवा

हवा

एक वासंती सुबह

‘’ मैं कितनी खुशनसीब हूँ ,

मेरे सर पर है आसमान

पैरों तले ज़मीन .

मेरी सांसों के आरोह – अवरोह में ,

मेरे रंध्रों में ,

शुद्ध हवा का है प्रवाह .’’

‘’ मैं कितनी खुशनसीब हूँ .’’

कुंजों में एक सरसराहट सी हुई ,

मालती की कोमल पल्लवों पर ,

ठहरी हुई थी हवा ,

मेरे विचारों को भाँप कर ,

मेरे गालों को थपथपा कर

उसने हौले से कहा –

‘’ खुश और नसीब ,

दो अलग अलग है बात .

मुझसे पूछो –

मैं…

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Added by coontee mukerji on May 29, 2013 at 1:25am — 14 Comments

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