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मानव दौड़ें राह पर, थकते उसके पाँव

आत्मा नापे दूरियाँ, नगर डगर हर गाँव |

 

थक जाते है पाँव जब, फूले उसकी साँस,

मन तो अविरल दौड़ता,मन में हो विश्वास |

 

सार्थक मन की दौड़ है, भौतिकता को छोड़

सही राह को जान ले, उसी राह पर दौड़ |

 

पञ्च तत्व से तन बना, जिसका होता अंत

बसते मन में प्राण है, जिसकी दौड़ अनंत |

भौतिकता को छोड़ कर, अंतर्मन की मान,

दिल गवाह जो भी करे, उस पर देना ध्यान

(मौलिक एवं स्वरचित)

 

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला 

जयपुर दि. २९-५-२०१३ 

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 6, 2013 at 11:25am

विद्वजन द्वारा रचना सराहे जाने पर सुखद अहसास होता है और उत्साह बढ़ता है | दोहे पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार 

भाई श्री अशोक रक्ताले जी 

Comment by Ashok Kumar Raktale on June 6, 2013 at 9:01am

वाह! आदरणीय लड़ीवाला साहब सादर, बहुत ही सुन्दर स्न्देशातम्क दोहे रचे हैं बहुत बहुत बधाई स्वीकारें.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on June 1, 2013 at 3:09pm

दोहे सार्थक और सौद्देश्य बताकर मान देने के लिए अंतर्मन से हार्दिक आभार आपका आदरणीय श्री सौरभ पाण्डेय जी,

आपकी टिपण्णी से प्रसन्नता हुइ | सादर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 9:28am

इन सार्थक और सोद्येश्य दोहों के लिए हृदय की गहराइयों से धन्यवाद और बधाइयाँ, आदरणीय.

बहुत सुन्दर और सुगढ प्रयास हुआ है.

सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 31, 2013 at 10:51pm

हार्दिक आभार स्वीकारे भाई श्री अरुण कुमार निगम जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on May 31, 2013 at 10:17pm

सुंदर दोहे आदरणीय, बधाई स्वीकार कीजिए...........

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 31, 2013 at 2:23pm

दोहे पसंद कर मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार भाई श्री संदीप कुमार पटेल जी, सादर 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 31, 2013 at 11:58am


आदरणीय सर जी बहुत ही सुंदर दोहे रचे हैं आपने सादर बधाई हो आपको

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on May 31, 2013 at 11:05am

दोहे पसंद कर मान देने के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणीया सरिता भाटिया जी 

Comment by Sarita Bhatia on May 31, 2013 at 8:37am

बहुत सुंदर दोहे रचे हैं आदरणीय लक्ष्मण जी ,बधाई 

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