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कह मुकरियाँ

(आदरणीय  अम्बरीश जी रहा नहीं गया   कह मुकरियाँ  मैंने भी लिखी सादर देखे :..)

 
 
वारंट निकालों चाहे जितने 
हाथ पुलिस के वे  न आते 
गुण्डों का भी पोषण करते 
क्या सखी नेता ? नहीं…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 24, 2012 at 1:30pm — 9 Comments

तीन मुक्तक ......

मिट्टी को रंग के लाल-हरे रंग दे दिये

लिख-लिख किताबें सोंचने के ढंग दे दिए

देनी थीं वुसअतें तो खुले आसमान सी

धर्मो ने दायरे बड़े ही तंग दे दिए



चन्दन गुल या इत्र की खुशबू,जिसको होना है हो जाए 

घूमे जंगल-जंगल ,महके उपवन-उपवन धूम मचाए 

पर ,ख़ुलूस से बढ़ कर कोई गंध नहीं है इस दुनिया में 

जो बिखरे इस दर इठलाकर उस दर की देहरी महकाए



ईमान अब संदेह का पर्याय हो…

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Added by seema agrawal on August 24, 2012 at 11:00am — 11 Comments

बस करो अब भागना ---------

 क्यों कर जाते है परिस्थितियों से पलायन हम ,

ये परिस्थितियां ही तो सिखाती है हमें जीना

पलायन में कहाँ होती है ,

स्थितियों को बदलने की इच्छा,

फिर क्यों नहीं हम परिस्थितियों का सामना करते रूककर ,

आखिर कहाँ जा सकते है भागकर .

जहाँ जायेंगें वहां  की स्थितियां ,

फिर खड़ी होंगी बन कर परिस्थितियां

इनका कोई अंत नही ,

तो बस करो अब भागना

और करो दृढ़ निश्चय

परिस्थितियों से संघर्ष का…

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Added by Naval Kishor Soni on August 24, 2012 at 11:00am — 7 Comments

नहीं है पास तू अगर तो तेरी याद सही

नहीं है पास तू अगर तो तेरी याद सही

रही जो याद वो शहद सी मीठी बात सही



ग़मों में मुस्कुरा रहा हूँ गहरे जख्म छुपा

दिले-नाशाद क्यूँ फिरूँ जो रहना शाद सही



उजाले चीखने लगे जो तुझको देख अगर

अँधेरी गर्दिशों भरी ही काली रात सही



तुझे तो था…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on August 24, 2012 at 10:14am — 6 Comments

आओ सम्वाद करें

आओ सम्वाद करें

चमन में मुरझाते हुए फूलों पर

जंगल में ख़त्म होते बबूलों पर

माली से हुई  अक्षम्य भूलों पर

सावन में सूने दिखते  झूलों पर …

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Added by Albela Khatri on August 23, 2012 at 11:30pm — 4 Comments

आईने से निगाहें हटा लीजिये

आईने से निगाहें हटा लीजिये
या निगाहों में हम को पनाह दीजिये

आपको दिल ने समझा है अपना नबी
थोडा अपने भी दिल को मना लीजिये

आप ही आप हैं हर निगाह हर तरफ
आये ना गर यकीं आजमा लीजिये

चश्म बेचैन है रौशनी के लिए
ऐ निहां अब तो परदा उठा दीजिये

हम ही हम हैं दीवाने हमीं बेफहम
आप भी होश थोडा गवां दीजिये

बोलो कब रहे तिश्नगी में नज़र
इश्क का जाम अब तो लुटा दीजिये

-पुष्यमित्र उपाध्याय

Added by Pushyamitra Upadhyay on August 23, 2012 at 8:30pm — 9 Comments

नव-मीडिया : दशा, दिशा एवं दृष्टि

(0)
टीका डी एन ए सरिस, गाड-पार्टिकिल चार |
कई सदी से डालता, गहन असर संचार |
गहन असर संचार, सरस मानव का जीवन |
दिन प्रति दिन का सार,…
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Added by रविकर on August 23, 2012 at 7:30pm — No Comments

एक प्रेम कविता

जब भी गुमसुम तन्‍हा तट पर

बरबस तुम आ जाओगे

वहीं लहर के श्रृंग तोड़ते

मुझको तुम पा जाओगे

 

बिछुड़े पल के दीप तले

जब अश्रु अर्घ्‍य चढ़ाओगे

वहीं शिखा की छाया छूते

मुझको तुम पा जाओगे

 

छोड़-छोड़ सौन्‍दर्य प्रसाधन

जब कुंतल तुम बिखराओगे

वहीं किसी दर्पण में हंसते

मुझको तुम पा जाओगे

 

ना कहना ना मुझको छलिया

फिर किसको प्रीत सिखाओगे

पायल,कंगन,बिंदी,अंजन में

मुझको तुम पा…

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Added by राजेश 'मृदु' on August 23, 2012 at 4:08pm — 9 Comments

भ्रूण हत्या- समाज का एक कड़वा सच

स्वपन दुनियाँ से जागो आज

भ्रूण हत्या का करो ना पाप

आत्मा की उसकी सुनो गुहार

देखि नहीं जो, अब तक संसार

करती फरियाद वो चीख पुकार

क्यूँ करता मेरी, हत्या समाज

 

कोई तो दो मेरा दोष बता

कन्या होने की दो ना सजा

माँ बेबस लाचार, तू क्यूँ है बता

हृदय अपना शूल ना बना

मुझ पर थोडा तरस तो खा

निर्मम हत्या से मुझे बचा

 

अपने सानिध्य में मुझको ले

वंचित न कर अधिकार मेरे

दे मुझको संस्कार…

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Added by PHOOL SINGH on August 23, 2012 at 3:00pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रलय ,ओ बी ओ में मेरी पचासवीं प्रविष्टि,

छंद:'कुकुभ'  लिखने का पहला प्रयास  (मात्रायें : १६-१४ अंत में दो गुरु)

प्रदूषित करते ना थके तुम ,भड़क गई उर में ज्वाला 

क्रोधित हो कूद पड़ी गंगा ,सब कुछ जल थल कर डाला 

डूब गए घर बार सभी कुछ ,राम शिवाला भी डूबा 

कुपित हो गए मेघ देवता ,कोई नहीं है अजूबा 

राजस्थान ,असम,झाड़खंड,नहीं बची उत्तरकाशी 

प्रलय  कभी ये नहीं सोचती ,कौन धरम कौनू भाषी

पर्वत पर्वत जंगल जंगल ,तुम चलाते  रहे आरी  

खूँ के आँसूं रोते हो अब ,आन पड़ी…

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Added by rajesh kumari on August 23, 2012 at 1:00pm — 22 Comments

दो कवितायेँ

1. सब मिल जुल कर जियो



भाई देखो यह देश और दुनियां तो सबकी हैं .

किसी एक के बाप का हक नही है इस पर .

फिर क्यों झगड़ा करते हैं हम बेवजह ?

जब तक जियो सब मिल जुल कर जियो यार .

तेरा, मेरा, इसका,उसका छोडो यह तकरार .

सब मिल कर रहो आपस में करो प्यार .

क्या रखा हैं हेगडी में एक दिन मर जाओगे यार .



2. सरोकार



तुम्हारे हमारे सरोकार क्या हैं

तुम क्या समझते हो परोपकार क्या है ?

किसी को देना अठन्नी-रुपया

यह परोपकार…

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Added by Naval Kishor Soni on August 23, 2012 at 12:30pm — 5 Comments

सरोकार -----

तुम्हारे हमारे सरोकार क्या हैं

   तुम क्या समझते हो

   परोपकार क्या है ?

किसी को देना अठन्नी-रुपया

यह परोपकार नहीं  है भैया ,

  उसे इस काबिल बनाने में करो मदद

   कि वो खुद कमाले …

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Added by Naval Kishor Soni on August 23, 2012 at 12:19pm — 6 Comments

तीन कह-मुकरियां -----[नवल का नव प्रयोग ]


१.
वह जब आती मन को भाती,
सबके जीवन को हर्षाती ,
कभी कभी देती है तरसा,
क्यों सखा सजनी, ना 'बरसा'.

२.
वो जब आती मैं सो जाता ,
गहरे सपनों में खो जाता ,
उस संग हो जाता 'रिंद'
क्यों सखा सजनी, ना नींद
 ३.
सुरूर उसका जब छाता है .
रोम रोम सा खिल जाता है.
उसके आगे सब खराब .
क्यों सखा सजनी,ना शराब.

Added by Naval Kishor Soni on August 23, 2012 at 11:00am — 6 Comments

जीने का तरीका --------

गेंदा ,चंपा, ,चमेली ,
जूही के यह जो फूल हैं
ये सिर्फ महकते ही नहीं ,
ये हमें सिखाते है
जीवन जीना
और अपनी महक बिखेरना
और उस गुलाब को देखो
वो अपने ही काटों से छिदा है
फिर भी मुस्कुराता है हरदम
क्या इन फूलों से सीख़ नहीं
सकते हम जीवन जीने का तरीका ?

Added by Naval Kishor Soni on August 23, 2012 at 10:30am — 3 Comments

मन से है ------ ( दोहे )

 
राष्ट्र गान के बोल पर, हो जाते सब मुग्ध 
निरा पशु वो आदमी, सुनकर होवे क्षुब्ध // 
 
त्याग औ बलिदान की,आजादी सौगात 
याद रहे कुर्बानियां, विनती यही दातार  //
  
पांडव अब…
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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 23, 2012 at 10:30am — 7 Comments

ख्याल

ख्याल
  जीवन भर तो फ़क़ीर रहे
अब करोड़पति हुए साईं बाबा
चार दिनों में भक्तों ने चढ़ाया
पाँच करोड़ का चढ़ावा
भारत में करोड़ों लोग हैं रहते
बिन रोटी, कपड़ा,…
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Added by Deepak Sharma Kuluvi on August 23, 2012 at 10:29am — 3 Comments

कुछ कह मुकरियाँ

जब जब हैं आतंकी आये

बिल में चूहे सा घुस जाये  

खो जाए उसकी आवाज़

क्या सखि नेता? नहिं सखि राज! 

______________________

नाम जपे नित भाईचारा.

भाई को ही समझे चारा 

ऐसे झपटे जैसे बाज़

क्या सखि नेता? नहिं सखि राज! 

______________________

प्लेटफार्म पर सदा घसीटे

मारे दौड़ा दौड़ा पीटे

इम्तहान क्या दोगे आज

क्या सखि पोलिस ? नहिं सखि राज !

_______________________

चलती जिसकी अज़ब गुंडई 

कहे, निकल…

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Added by Er. Ambarish Srivastava on August 23, 2012 at 9:30am — 48 Comments

दो हाइकु- समय कहे।

1.

समय कहे।

जीवन रहा सदा,

जीवन रहे।।

2.

ये समंदर ।

मरता नहीं कभी,

मरी लहर।।

Added by सूबे सिंह सुजान on August 23, 2012 at 12:59am — 4 Comments

भूख : दोहे

(१) रंक जले राजा जले, कौन सका है भाग |

सबके अंदर खौलती, एक क्षुधा की आग ||

(२) ज्वाल क्षुधा में वो भरी, कहीं न ऐसा ताप |

जल के जिसमें आदमी, कर जाता है पाप ||

(३) भूख बड़ी बलवान है, ना लेने दे चैन |

दौड़ें सब इसके लिए, दिन हो चाहे रैन…

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Added by कुमार गौरव अजीतेन्दु on August 22, 2012 at 8:51pm — 12 Comments

किसी को याद कर रोये





किसी को याद कर रोये,  किसी को रुलाना याद आया,

जब जब तुझे जाते देखा, तेरा लौट आना याद आया..



हर सुर-साज़ देखा जब, बिकता हुआ कीमतों में

हमें तब तेरा यूँ ही, गुनगुनाना याद आया





यूं तो मेरा हाल भी न पूछा, ताउम्र किसी ने

शाम-ऐ-रुखसत पे ही क्यों सब फ़साना याद आया



उनको फुर्सत ही कहाँ, इस पल की यहाँ

और दिल तुझे वो किस्सा पुराना याद आया?



फूल को नोच कर उनके मिलने का यकीं करना

अपने मुकद्दर को यूं भी आज़माना याद…

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Added by Pushyamitra Upadhyay on August 22, 2012 at 8:00pm — 2 Comments

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