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September 2011 Blog Posts

ग़ज़ल

अब जो बिखरे तो फिजाओं में सिमट जाएंगे 

ओर ज़मीं वालों के एहसास से कट जाएंगे 

 

मुझसे आँखें न चुरा, शर्म न कर, खौफ न खा 

हम तेरे वास्ते हर राह से हट…

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Added by siyasachdev on September 19, 2011 at 9:25pm — 4 Comments

जरा इधर भी करें नजरें इनायत

1. समारू - ड्रीम गर्ल हेमामालिनी ने गुजरात पहुंचकर कहा - नरेन्द्र मोदी विकास के लिए जाने जाते हैं।

पहारू - और गोधरा कांड के लिए...



2. समारू - गृहमंत्री कहते हैं - छत्तीसगढ़ के एनजीओ नक्सलियों की मदद कर रहे हैं।

पहारू - ये तो वही हुआ, हमारी बिल्ली और हमहीं से म्याऊ ???



3.समारू - अमरकंटक स्थित सोनकुण्ड में एक साधु के समाधि लेने की खबर है।

पहारू - नित्यानंद के ‘नित्य-आनंद’ की खबर अब सुनने में नहीं आ रही है।



4. समारू - छग के आधे एनजीओ, नेताओं व अफसरों… Continue

Added by rajkumar sahu on September 19, 2011 at 9:00pm — No Comments

शोर-ए-दिल

हर किसी में, गर खुदा का नूर है |

कोई मिलता खुश, कोई रन्जूर है ||
अपने-अपने ह|ल में सब मस्त हैं |
कोई अपनों में है, कोई दूर है ||
जोर कुछ चलता नहीं, तकदीर पर |
बे-वज़ह इन्सां हुआ, मगरूर है ||
ठोकरों पे रख दिया, जिसने ज़हाँ |
उसको दुनिया ने कहा, मन्सूर है ||
ज़िन्दगी इनाम है, चाहे सजा |
इसको जीने पे, शशि मजबूर है ||

 

Added by Shashi Mehra on September 19, 2011 at 6:30pm — 1 Comment

कविता : हंसकर जियो जिंदगी ....

 
हंसकर जियो जिंदगी दिल उदास क्यों करते हो.
कल की छोडो कल पर आज एहसास क्यों करते हो.
           गुजरे हुए कल को भूल जाना है बेहतर.
           गम में अश्क बहाने से मुश्काना है बेहतर.
जब होनी को अनहोनी में हम ढाल नहीं सकते.
जब किस्मत में लिखी बात को टाल नहीं…
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Added by Noorain Ansari on September 19, 2011 at 1:30pm — No Comments

दोहा सलिला: एक हुए दोहा यमक: -- संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

एक हुए दोहा यमक:

-- संजीव 'सलिल'

*

पानी-पानी हो रहे, पानी रहा न शेष.

जिन नयनों में- हो रही, उनकी लाज अशेष..

*

खैर रामकी जानकी, मना जानकी मौन.

जगजननी की व्यथा को, अनुमानेगा कौन?

*

तुलसी तुलसी-पत्र का, लगा रहे हैं भोग.

राम सिया मुस्का रहे, लख सुन्दर संयोग..

*

सूर सूर थे या नहीं, बात सकेगा कौन?

देख अदेखा लेख हैं, नैना भौंचक-मौन..

*

तिलक तिलक हैं हिंद के, उनसे शोभित भाल.

कह रहस्य हमसे गये,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 19, 2011 at 7:08am — No Comments

मानसरोवर -- 7

 मतिमान सोचा करते हैं, चिंता भीरु करते हैं.

क्षणिक मोद में जो इठलाते, वही विपति से डरते हैं.

                जिस तरह गोधुलि का होना, निशा - आगमन का सूचक है.

               जैसे छाना जगजीवन का, पावस का सूचक है.

               वैसे ही सुख के पहले, दुःख सदैव आता है.

             जो मलिन होता दुःख से, सुख से वंचित रह जाता है.

सुख - दुःख सिक्के के दो पहलू , भेद मूर्ख ही करते हैं.

मतिमान सोचा करते हैं, चिंता भीरु करते हैं.

            दुःख…

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Added by satish mapatpuri on September 18, 2011 at 3:45am — 2 Comments

ये कैसी अंध भक्ति ?

हर बरस यह बात सामने आती है कि प्रतिमाओं के विसर्जन तथा श्रद्धा में लोग कहीं न कहीं, अंध भक्ति में दिखाई देते हैं और अन्य लोगों को होने वाली दिक्कतों तथा प्रकृति को होने वाले नुकसान से उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता। अभी कुछ दिनों पहले जब गणेश प्रतिमाएं विराजित हुईं, उसके बाद कान फोड़ू लाउडस्पीकरों ने लोगों को परेशान किया। प्रशासन की सख्त हिदायत के बावजूद फूहड़ गाने भी बजते रहे। श्रद्धा-भक्ति के नाम पर जिस तरह तेज आवाज में गानें दिन भर बजते रहे या कहें कि दिमाग के लिए सरदर्द बने ये भोंपू रात…

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Added by rajkumar sahu on September 17, 2011 at 9:35pm — No Comments

आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है।

क्यों वह ताक़त के नशे में चूर है

आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है।



गुलसितां जिस में था रंगो नूर कल 

आज क्यों बेरुंग है बेनूर है।



मेरे अपनों का करम है क्या कहूं

यह जो दिल में इक बड़ा नासूर है।



जानकर खाता है उल्फ़त में फरेब

दिल के आगे आदमी मजबूर है।



उसको "मजनूँ" की नज़र से देखिये

यूँ लगेगा जैसे "लैला" हूर है।



आप मेरी हर ख़ुशी ले लीजिये

मुझ को हर ग़म आप का मंज़ूर है।



जुर्म यह था मैं ने सच…

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Added by siyasachdev on September 15, 2011 at 9:10pm — 19 Comments

फिराक़ गोरखपुरी

फिराक़ गोरखपुरी का असल नाम था रघुपति सहाय। 28 अगस्‍त 1896 को उत्‍तर प्रदेश के शहर गोरखपुर में पैदा हुए। उनके पिता का नाम था, बाबू गोरखप्रसाद और वह आस पास के इलाके के सबसे दीवानी के बडे़ वकील थे। रघुपति सहाय का लालन पालन बहुत ही ठाठ बाट के साथ हुआ था। 1913 में गोरखपुर के जुबली स्‍कूल से हाई स्‍कूल पास किया। इसके पश्‍चात इलाहबाद के सेंट्रल कालेज में दाखिला लिया। इंटरमीडेएट करने के दौरान ही उनकी मनमर्जी के विरूद्ध उनके पिता ने रघपति सहाय की शादी करा दी गई। यह विवाह उनकी जिंदगी में अत्‍यंत…

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Added by prabhat kumar roy on September 15, 2011 at 8:30pm — 5 Comments

अपने विश्वास के साथ...

 

 

सारी बातें भूलाकर

तुम्हारे दिये हर दर्द का

तोहफ़ा बनाकर

मै उठती हूँ हर सुबह

एक नई उमँग के साथ

कि शायद...

हाँ शायद

पा ही लूँगी

जो खोया था

आज ही होगा अंत

इन दुखदायी पलों का

मगर

घेर लेती है मुझे

फ़िर वही

जानी-पहचानी सी

मुस्कुराहट

मुह टेढ़ा किये

सुनो!

तुम्हारे ये बहाने

बदलते क्यों नही?

मेरा विश्वास…

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Added by सुनीता शानू on September 15, 2011 at 5:00pm — 2 Comments

तड़पता हूँ के अब रोज़ तिरे दिल को दुखा कर

क्यों आ गया मैं हाय कभी हाथ छुड़ा कर,

तड़पता हूँ के अब रोज़ तिरे दिल को दुखा कर।

 

आज नदामत से पथरा गई हैं ये आंखें

आजा के बस इक बार तो आंचल से हवा कर।

 

दिन को सुकूँ शब को भी आराम नहीं है,

हवा भी चली आज ये नश्तर से चुभा कर।

 

अब ए दिल मुझे हयात की ख्वाहिश नहीं रही,

आया है वो मुकाम के मरने की दुआ कर।

 

दरे मौत पे आकर अटका है ये 'इमरान'

आ जा के मिरे जिस्म से ये रूह जुदा कर।

 

इमरान…

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Added by इमरान खान on September 15, 2011 at 2:23pm — 4 Comments

फिर प्रारम्भ होगा सृष्टिचक्र

 

 पुरुष !
विवाह रचाओगे ?
पति कहलाना चाहोगे?
पत्नी को प्रताड़ित करना छोड़ ,
अच्छे जीवन साथी बन पाओगे?


मेरी ममता तो जन्मों की भूखी है ,
बच्चों के लिए बिलखती है,
सृष्टि-चक्र, मेरे ही दम पर है…
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Added by mohinichordia on September 15, 2011 at 11:25am — 1 Comment

आतंकवाद की भेंट चढ़ गई एक लव स्टोरी

वो मासूम सा लड़का उसे बचपन से भला लगता था ,छोटी छोटी सी आँखें,घुंघराले बाल ,वो हमेशा से छुप छुप के उसे देखती आई थी ,जब वो अपना बल्ला  लेकर खेलने जाता, अपने दीदी की चोटी खींचकर भाग जाता, मोहल्ले के बच्चो के साथ गिल्ली डंडा खेलता हर बार वो बस उसे चुपके से निहार लिया करती थी. जैसे उसे बस एक बार देख लेने भर से इसकी आँखों को गंगाजल की पावन बूदों सा अहसास मिल जाता था . घर की छत  पर खड़ा होकर  जब वो पतंग उडाता वो उसे कनखियों से देखा करती थी जेसे जेसे उसकी पतंग आसमान में ऊपर जाती, इसका दिल भी जोरों…

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Added by kanupriya Gupta on September 15, 2011 at 10:30am — No Comments

हिंदी-दिवस

हिंदी-दिवस मनाना, है असल में बहाना |

इसके बज़ट से सत्ता, को ज़श्न है मनाना || 
सालों से आज-तक हम, ये दिन मना रहे हैं |
हर साल आंकड़ों को, ऊँचा दिखा रहे है ||
सच क्या है कौन जाने, है झूठ का ज़माना |
सब लीडरों के बच्चे, अंग्रेजी पढ़ रहे हैं…
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Added by Shashi Mehra on September 15, 2011 at 9:30am — 1 Comment

हिंदी प्रसार

हिंदी प्रसार

है लक्ष्य यह हमारा, हिंदी का हो पसारा |
हिंदी के दीप से ही, सम्भव है उजियारा ||
हमें मात्रभाषा को ही, है बनाना राष्ट्र- भाषा |
इससे ही बढ सकेगी, साक्षरता  की आशा ||
हिंदी में काम करना, हमें चाहिए अब सारा ||है लक्ष्य यह…
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Added by Shashi Mehra on September 15, 2011 at 9:00am — 3 Comments

तलाश खुद की

कितना अच्छा लगता है

कभी खुद से खोकर

खुद को ढूँढना.

 

बीती हुई गलतियों पर

एक निर्पेक्ष दृष्टिपात;

गुजरे रास्तों…

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Added by Kailash C Sharma on September 14, 2011 at 2:30pm — 7 Comments

आत्म -जागरण

मैं स्त्री हूँ रत्नगर्भा ,धारिणी,

पालक हूँ, पोषक हूँ

अन्नपूर्णा,

रम्भा ,कमला ,मोहिनी स्वरूपा

रिद्धि- सिद्धि भी मैं ही ,

शक्ति स्वरूपा ,दुर्गा काली ,महाकाली ,…

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Added by mohinichordia on September 14, 2011 at 1:00pm — 7 Comments

मुक्तिका: अब हिंदी के देश में --संजीव 'सलिल'

मुक्तिका

अब हिंदी के देश में

संजीव 'सलिल'

*

करो न चिंता, हिंदी बोलो अब हिंदी के देश में.

गाँठ बँधी अंग्रेजी, खोलो अब हिंदी के देश में..



ममी-डैड का पीछा छोड़ो, पाँव पड़ो माँ-बापू के...

शू तज पहन पन्हैया डोलो, अब हिंदी के देश में



बहुत लड़ाया राजनीति ने भाषाओँ के नाम पर.

मिलकर गले प्रेम रस घोलो अब हिंदी के देश में..



'जैक एंड जिल' को नहीं समझते, 'चंदा मामा' भाता है.

नहीं टेम्स गंगा से तोलो अब हिंदी के देश में..…



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Added by sanjiv verma 'salil' on September 14, 2011 at 8:30am — 8 Comments

अभियंता दिवस १५ सितम्बर पर विशेष आलेख: तकनीकी गतिविधियाँ राष्ट्रीय भाषा में (संजीव वर्मा 'सलिल')

अभियंता दिवस १५ सितम्बर पर विशेष आलेख:

तकनीकी गतिविधियाँ राष्ट्रीय भाषा में

संजीव वर्मा 'सलिल'


*

राष्ट्र गौरव की प्रतीक राष्ट्र भाषा:

              किसी राष्ट्र की संप्रभुता के प्रतीक संविधान, ध्वज, राष्ट्रगान, राज भाषा, तथा राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह (पशु, पक्षी आदि) होते हैं. संविधान के अनुसार भारत लोक कल्याणकारी गणराज्य है, तिरंगा झंडा राष्ट्रीय ध्वज है, 'जन गण मन' राष्ट्रीय गान है, हिंदी राज भाषा है, सिंह राष्ट्रीय पशु तथा मयूर…

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Added by sanjiv verma 'salil' on September 14, 2011 at 8:00am — No Comments

विरह की पीड़ा

कुछ कह न सके तुम, चुप सह न सके हम .

खामोशियों में टूट गया दिल ये  बेचारा 
आहें दबी रहीं, चाहें दबी रहीं..
बिन तुम्हारे हमसे जिया…
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Added by Lata R.Ojha on September 14, 2011 at 12:00am — 10 Comments

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