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कुछ कह न सके तुम, चुप सह न सके हम .

खामोशियों में टूट गया दिल ये  बेचारा 
आहें दबी रहीं, चाहें दबी रहीं..
बिन तुम्हारे हमसे जिया ही न गया..
है ओढ़नी कफ़न, सूने से ये नयन..
जाते हुए पीछे से पुकारा ही न गया..
आया था एक ख़त, तुम हुए दिवंगत 
एक आस का सहारा था वो भी अब गया..
बाकी बचा था क्या? बाकी रहा भी क्या ?
माटी का ही लाल था माटी में मिल गया |

 

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Comment by Lata R.Ojha on September 15, 2011 at 10:47am

Shukria Ashish ji :)

Comment by Lata R.Ojha on September 15, 2011 at 10:47am

dhanyvaad Ganesh ji:)

Comment by Lata R.Ojha on September 15, 2011 at 10:46am

Shukria Anwesha Anjushree ji:)

Comment by Lata R.Ojha on September 15, 2011 at 10:46am

Aabhaar Kailash C Sharma ji:)

 

Comment by Lata R.Ojha on September 15, 2011 at 10:45am

Aapka bahut bahut dhanyvaad mohinichordia ji :)

Comment by आशीष यादव on September 15, 2011 at 9:40am

एक मार्मिक कविता| ह्रदय को स्पर्श करती हुई| इस दशा में दोनों को ही अपने कर्म करते हुए तड़पना पड़ता है, एक सीमा पर तो एक घर की सीमा में|


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 14, 2011 at 9:04pm

माटी का ही लाल था माटी में मिल गया....

 

वाह, लता जी, आपने इस रचना के जरिये देश के वीरों को सलाम भेजा है, एक सीमा पर शहीद होता है और एक घर में शहीद होती है, बिरह के दर्द को कलेजे में समेटे वो कैसे जय हिंद कहती होगी, वोह !

खुबसूरत प्रस्तुति लता जी, आभार आपको |

Comment by Anwesha Anjushree on September 14, 2011 at 6:58pm

sunder abhiwyakti..pidit man ka sunder avlokan...

Comment by Kailash C Sharma on September 14, 2011 at 3:19pm

है ओढ़नी कफ़न ..सूने से ये नयन..
जाते हुए पीछे से पुकारा ही न गया..
......बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति...रचना के भाव अंतस को गहराई तक छू जाते हैं.

Comment by mohinichordia on September 14, 2011 at 9:21am

मार्मिक कविता है |

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