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रंगों का उपहार :- मोहित मुक्त

प्रकाश के तंतुओं से निर्मित,
हमें मिला है प्रकृति द्वारा,
रंगीनियों का उपहार। 
और हम, उसी का धन्यवाद देते हैं,
होली के त्यौहार में।

रंगों का महापर्व, होली !
सिर्फ उत्सव नहीं,
अपितु यह तो है,
दुनिया की प्राचीनतम -
और महानतम सभ्यता का विचार तत्व।

जीवन और प्रकाश से परे,
जब शून्य था ब्रह्मांड,
काले अँधेरे की शक्ल में-
रंग तब भी विद्यमान थे।

और फिर विधाता ने-
प्रथम बार होली खेली। 
बिखेर दिए आसमान में-
रंग-बिरंगे नक्षत्र,
तथा सूरज को दे दिया-
धरती पर रंग बाँटने का ठेका।

नीले आसमान की छाया सा,
उमड़ा नीला अथाह सागर,
जीवन ने सुरमयी अंगड़ाई ली,
और अरुण के रथी ने,
दिल खोल कर पृथ्वी पर लुटाए-
इंद्रधनुष के चटख रंग।

कुछ इस तरह खेली गयी,
धरती पर पहली होली!

यहाँ तक की मनुष्य के भाव,
अदृश्य होते हुए भी-
ढले होते हैं अनेक रंगों में।
हरे रंग का प्यार,
श्वेत रंग की शांति,
उत्साह का केसरिया,
लाल वर्ण का क्रोध,
और काली काली सी मायूसी,
चोट खाने पर शायद भावों में भी-
कुछ नीलापन आ ही जाता है।

रंगों का महापर्व, होली!
किसी एक धर्म की जागीर नहीं।
यह तो शाश्वत पर्व है,
जीवन, मृत्यु और परम पिता परमेश्वर की तरह।
रंगों के बिना प्रकाश नहीं,
और प्रकाश बिना दुनिया का अस्तित्व कहाँ?

होली को सौहार्द का त्यौहार न मान,
हिंदुओं का आडंबर मनाने वाले,
झक सफ़ेदी के नशे में चूर,
समाज के कुछ तत्व,
ये क्यों भूल जाते हैं-
की सफ़ेद भी एक रंग ही है।

तो आइए,
धर्म की दीवार तोड़,
सौहार्द के इस पर्व में,
हरे और लाल को मिलाकर,
गले मिल लेते हैं। 
भारत ऐसी मिसालों का-
सदा निर्माता रहा है।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on March 21, 2019 at 12:18pm

जनाब मोहित जी आदाब,होली के पर्व पर अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

आपको रंगोत्सव की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 21, 2019 at 8:10am

आ. भाई मोहित जी, सुंदर रचना हुयी है । हार्दिक बधाई ।

तो आइए,
धर्म की दीवार तोड़,
सौहार्द के इस पर्व में,
हरे और लाल को मिलाकर,
गले मिल लेते हैं। 
भारत ऐसी मिसालों का-
सदा निर्माता रहा है।

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