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मानव पंछी संवाद (अतुकांत )

चानक से,
कर मुझसे,
ठलाता सा पंछी बोला।
श्वर से मानव ने तो,
त्तम ज्ञान-दान था मोला।
पर हो तुम सब जीवों में,
क अकेली जात अनोखी,
सी क्या मजबूरी तुमको-
ट रहे होंठों की शोख़ी?
र सताकर कमज़ोरों को-
अंग तुम्हारा खिल जाता है,
अ: तुम्हें क्या मिल जाता है?

मैंने कहा:-

हो-

र्व से, कि
र तुम्हारा-
ल रहा है,
छोटी सी-
गह में, पर-
गड़े का,
कराव का,
ठौर नहीं है उसमें।
डाली से दूर,
लता सूरज,
रावट देता है-
कावट नहीं! क्योंकि-
म्भ नहीं है तुममें
न-धर्म-सामर्थ्य का।
हीं तो देखो,
प्रगतिशील मानव,
फ़रेब का पुतला-
ना बैठा समर्थ,
ला याद कहाँ उसे-
नुष्यता का अर्थ?
ह प्रभु की-
चना अनुपम,
लालच-लोभ
शिभूत होकर,
र्म त्याग कर,
ड्यंत्रों से,
दा पाप अंकुर बो-बोकर,
हो कर स्वयं से दूर,
क्षणभंगुर सुख में अटक चुका है,
त्रास को आमंत्रित करता,
ज्ञान-पथ से भटक चुका है।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 22, 2018 at 3:28pm

वाह। ग़ज़ब। बेहतरीन व उम्दा सार्थक उद्देश्यपूर्ण सृजन के लिए हार्दिक बधाइयां आदरणीय मोहित मिश्रा 'मुक्त' साहिब।

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