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इतने मैले वस्त्र

 

इतने मैले वस्त्र!

गंगा  माँ! ठिकाने कर दे

रह गया धब्बा जो

डाट डपट हमें चक्कर दे। 

 

कीचड़ इसका कहे, किसी ने

गज़ब अन्याय सहे

लीपन लगा बहुत नफरत पर ,

प्यार का रंग रहे

सृष्टि बनी  तब से पाखंडी,  

धारा छल की बहे

मनमर्जी को रोक न पाये  

कोई कुछ भी कहे

 

तारे पाप ऋषि-मुनि,

परिणाम कोई हितकर दे।

 

सम्मान बचा कब नारी का  

गज़ब ऐसी तैसी

पासा नाच नचा ना पाये,   

मर्यादा न ऐसी

सौ दुर्योधन, कृष्ण बचालें,  

इस  भरम में कैसी 

चीर भूल कर चली,

द्रौपदी,  की हालत न वैसी

 

बहुत हो लिये शकुनि

वैसा अब कोई न नर दे।   

 

आँखे बंद हुई समाज की,

कान बंद सजग के

बटन  टूटते, कच्चे धागे,

चले तेवर ठग के

निकले दाग काम-क्रिड़ा के,

खून,  भोली मृग के  

पछाड़ती,  मालिन्य किसी के,  

बढ़ते हुये पग के

  

हर प्रहार बन जाय तांडव ,    

प्रभु! दया का वर दे।

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

 

Views: 42

Comment

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Comment by Harihar Jha on August 21, 2018 at 5:39am

धन्यवाद समीर जी!

Comment by Samar kabeer on August 20, 2018 at 2:02pm

जनाब हरिहर झा साहिब आदाब,अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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