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"अपने ख़्वाबों को खिलाऊँ क्या, पिलाऊँ क्या बताओ " - गज़ल - ( गिरिराज भंडारी )

2122    2122    2122     2122

 

गुम्बदों से क्यों कबूतर आज कल डरने लगे हैं

दूरियाँ रख कर चलेंगे फैसले करते लगे हैं

 

पतझड़ों की साजिशों से, अब बहारों में भी देखो

हर शज़र मुरझा गया, पत्ते सभी झड़ने लगे हैं

 

अपने ख़्वाबों को खिलाऊँ क्या, पिलाऊँ क्या बताओ

कोई भूखा कोई प्यासा है, सभी मरने लगे हैं

 

जैसे गोली की किसी आवाज़ से भागे परिन्दे

मुफ़लिसी क्या आ गई रिश्ते सभी कटने लगे हैं

 

कुछ सियासी फैसलों से और बाक़ी मज़हबों से

देश वासी ख़ेमों- तबकों में सभी बटने लगे हैं

 

उन खतों का भी सहारा अब कहाँ बाक़ी है मुझको

याद भी ताज़ा नहीं, अब हर्फ़ भी मिटने लगे हैं

 

एक दिन तो धूप चटकीली कभी हम देख पाते

धूप क्या निकली, उधर से अब्र फिर घिरने लगे हैं

 

वाकिये सारे पुराने में बहुत तल्ख़ी भरी थी

क्या करूँ मै सारे नग़्मों में वही ढलने लगे हैं

**************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

************************************** 

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Comment by ajay sharma on December 20, 2013 at 9:52pm

गुम्बदों से क्यों कबूतर आज कल डरने लगे हैं

दूरियाँ रख कर चलेंगे फैसले करते लगे हैं

shayad ..... फैसले करते लगे हैं .........karne lage hain ....hoga typing mistake huya hai ......shesh kya kahoo.....aap to   jo kahenge gazal hogi......


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 9:04pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी , आपको गज़ल पसन्द आयी , गज़ल कहना सार्थक हुआ ॥ सराहना और उत्साह वर्धन के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 20, 2013 at 8:54pm

कुछ सियासी फैसलों से और बाक़ी मज़हबों से

देश वासी ख़ेमों- तबकों में सभी बटने लगे हैं

 

उन खतों का भी सहारा अब कहाँ बाक़ी है मुझको

याद भी ताज़ा नहीं, अब हर्फ़ भी मिटने लगे हैं

 

एक दिन तो धूप चटकीली कभी हम देख पाते

धूप क्या निकली, उधर से अब्र फिर घिरने लगे हैं

 बहुत शानदार ग़जल ये तीन शेर तो बहुत ज्यादा पसंद आये ,दिल से बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 8:21pm

आदरणीय नादिर खान भाई , गज़ल की सराहना के लिये और दो शेरों को विशेष पसंद करने के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया । ऐसे ही स्नेह बनाये रखें ॥ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 8:18pm

आदरणीय तपन भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 8:17pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपकी स्नेह सिक्त प्रतिक्रिया और सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 20, 2013 at 8:16pm

आदरणीय अविनाश भाई , उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया और गज़ल की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥

Comment by नादिर ख़ान on December 20, 2013 at 8:02pm

जैसे गोली की किसी आवाज़ से भागे परिन्दे

मुफ़लिसी क्या आ गई रिश्ते सभी कटने लगे हैं

 

कुछ सियासी फैसलों से और बाक़ी मज़हबों से

देश वासी ख़ेमों- तबकों में सभी बटने लगे हैं

आदरणीय गिरिराज जी,  बहुत खूब लिखा, शानदार गज़ल ।

Comment by Tapan Dubey on December 20, 2013 at 7:52pm
आदरणीय गिरिराज जी खूबसूरत गजल के लिए बधाई
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 20, 2013 at 7:05pm

सखे गिरिराज  i

क्या बात है ? आप हमेशा दिल में उतर जाते है  i

मुफलिसी क्या आ गयी रिश्ते सभी कटने लगे हैं  i शुभानाल्लाह  i

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