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आग़ाज मुहब्बत का तो मुश्किल भी नहीं है
आजन्म बँधा भारती हूँ, कल भी नहीं है।

क्या हिन्दू मुसलमाँ बना फिरता है ज़माने
जिस देश मिला जन्म वो हलचल भी नही है

आसान नहीं होता जहाँ रोटी का जुटाना
तू मौज मनाता दुखी बिल्कुल भी नहीं है

क़मज़र्फ बने मत कि कमाना नहीँ पड़ता
मुँहजोर  वो औलाद अक़ल बल भी नहीं है

है एक मुसीबत कि निभाने हैं मरासिम
अब वक्त बचा क़म है, वो दल-बल भी नहीं है

आवाज़ लगाऊँ तो कोई भी नहीं आता
मदमस्त हुई दुनिया सनम ल भी नहीं है

सुन वक्त बदलने का हिसाब अपना है, चेतन
क्या रोक सकोगे उसे कल-बल भी नहीं है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on October 13, 2020 at 9:28pm

जनाब चेतन प्रकाश जी आदाब, आपकी ग़ज़ल क़वाफ़ी,मिसरों के रब्त,और बह्र पर अभी समय चाहती है,बहरहाल इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'आग़ाज मुहब्बत का तो मुश्किल भी नहीं है 
आजन्म बँधा भारती हूँ, कल भी नहीं है'

इस मतले के ऊला में क़ाफ़िया 'मुश्किल' यानी 'इल' का है और सानी में 'अल' का, ग़ौर करें, इसके इलावा आप क्या कहना चाहते हैं वो भी स्पष्ट नहीं हुआ ।

'क्या हिन्दू मुसलमाँ बना फिरता है ज़माने
जिस देश मिला जन्म वोहलचल भी नही है'

ये शैर बह्र में है लेकिन दोनों मिसरों में रब्त पैदा नहीं हुआ,और आप क्या कहना चाहते हैं वो भी स्पष्ट नहीं हुआ ।

'आसान नहीं होता जहाँ रोटी का जुटाना 
तू मौज मनाता दुखी बिल्कुल भी नहीं है'

इस शैर का ऊला बह्र में नहीं है, भाव समझ में आता है मगर क़ाफ़िया इसमें 'उल' का हो गया जो ग़लत है ।

'क़मज़र्फ बने मत कि कमाना नहीँ पड़ता
मुँहजोर  वो औलाद अक़ल बल भी नहीं है'

इस शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं, भाव भी स्पष्ट नहीं हुआ,और सानी में सहीह शब्द "अक़्ल" 21 है ।

'है एक मुसीबत कि निभाने हैं मरासिम 
अब वक्त बचा क़म है, वो दल-बल भी नहीं है'

ये शैर कुछ ठीक है ।

'आवाज़ लगाऊँ तो कोई भी नहीं आता
मदमस्त हुई दुनिया सनम हल भी नहीं है'

ये शैर भी ठीक है ।

'सुन वक्त बदलने का हिसाब अपना है, चेतन
क्या रोक सकोगे उसे कल-बल भी नहीं है'

इस शैर में शुतर गुरबा दोष है, ऊला में 'सुन' एक वचन और सानी में 'रोक सकोगे' बहुवचन ।

आप ग़ज़ल कहना चाहते हैं तो पहले कुछ शाइरों का कलाम पढ़ें,कुछ किताबों का अध्यन करें,ओबीओ पर "ग़ज़ल की कक्षा" और "ग़ज़ल की बातें" समूह का लाभ उठाएँ ।

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