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गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ

अमर तो नहीं होती

एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को

फिर भी

जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है…
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Added by amita tiwari on April 14, 2026 at 7:30pm — No Comments

प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजते

भावनात्मक अवरोधों के दबाव में

कभी ऐसा भी तो होता है ...



समय समय से रूठ जाता है

प्यार रूठता नहीं

प्यार सूख जाता है

वह पहचाना नहीं जाता तब

पतझड़ में पत्तों की तरह

पीला, सूखा ... कुम्लाहया



एक असहनीय दर्द

शब्द गले में अटके

अधरों तक आए, भारी

और भारी

कुछ भी कहने में असमर्थ

रिश्ते के मुड़े पन्नों पर कुछ आँसू

बह-बह जाती है शब्दों की स्याही

व्यथा का मूल स्रोत खोजती



कितनी तीव्र… Continue

Added by vijay nikore on April 14, 2026 at 8:19am — No Comments

दोहा दशम. . . . . उम्र

दोहा दशम् . . . . उम्र



ठहरी- ठहरी उम्र अब, करती एक सवाल ।

कहाँ गई जब जिंदगी, रहती थी खुशहाल ।।



यादों में ही रह गए , हसीं उम्र के साल ।

करें अधूरी हसरतें , मन में बड़ा मलाल ।।



मुड़ - मुड़ देखे उम्र जो, पीछे छूटे मोड़ ।

क्या है अपने पास अब, क्या आए हम छोड़ ।।



रही शिकायत वक्त से, गया उम्र जो छीन ।

कहाँ वक्त की धुंध में, लम्हे गए हसीन ।।



उम्र ढली रहने लगे, दूर - दूर सब लोग ।

तनहा बैठे भोगते , तनहाई का रोग ।।



घटता… Continue

Added by Sushil Sarna on April 6, 2026 at 12:48pm — 1 Comment

कुंडलिया

दरियादिल हो बाप जब, करता कन्यादान।

दयावान भगवान हो, रखता उसका मान।

रखता उसका मान, भात नरसी-सा भरता।

आठ पहर धन-धान्य, वस्त्र की वर्षा करता।

कहते कवि 'कल्याण', मिले तब जीवन साहिल।

करके कन्यादान, दिखाए जब दरियादिल।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on March 31, 2026 at 8:30pm — No Comments

प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर

प्यादे : एक संख्या भर

प्यादे— बेकसूर, बेख़बर, नियति और नीति से अनजान—

अक्सर मान लिये जाते हैं

मात्र एक संख्या भर।

तैनात कर दिये जाते हैं महाराज-महारानी के गिर्द रक्षा-कवच बनकर,

और उसी क्षण

उनकी पहचान सिमट जाती है—

एक संख्या भर।

वे मात खाते हैं, कभी मात दिलाते भी हैं, गिरते हैं, उठते हैं,

और फिर गिरा दिये जाते हैं—

इतनी सहजता से

कि किसी को

कोई फ़र्क नहीं…

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Added by amita tiwari on March 30, 2026 at 10:31pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . .विविध

दोहा सप्तक. . . . . . विविध



कभी- कभी तो कीजिए, खुद से खुद की बात ।

सुलझेंगे उलझे हुए,  अंतस के हालात ।।



खामोशी से पूछिए, क्या है उसका दर्द ।

किन राहों की है भरी, उसमें इतनी गर्द ।।



लफ्ज अकेले हो गए, ठहर गए जज्बात ।

कोई अपना दे गया, दिल को वह आघात ।।



हुई उम्र तो सामने, उभरी हर तस्वीर ।

रुखसारों पर दर्द की, शेष रही तहरीर ।।



रेजा - रेजा हो गए, जीवन के सब ख्वाब ।

चश्मे साहिल पर रहे, यादों के सैलाब ।।



लहरों सी… Continue

Added by Sushil Sarna on March 23, 2026 at 1:53pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . .अधर

दोहा पंचक. . . . . अधर

अधरों को अभिसार का, मत देना  इल्जाम ।

मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।

उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।

अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।

अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम ।

जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।

अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।

स्पर्शों के दौर में , बिखर गये सब जाम ।।

अधर दलों पर डोलता, जब दिल का ईमान ।

बेशर्मी के पार सब, दिल करता सोपान ।।

सुशील सरना /…

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Added by Sushil Sarna on March 17, 2026 at 2:29pm — No Comments

आत्म मुग्ध मदारी

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Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:07am — No Comments

भ्रम सिर्फ बारी का है

भ्रम सिर्फ बारी का है

************************************



बरसों बरस लगे

बीज को बहलाने में

भरपूर दरखत बनाने में





बरसात नहलाती रही

धूप सहलाती रही

हवा आती रही

हवा जाती रही

बरसों बरस लगे धरा को

जड़ो की जगह बनाने में

बीज को दरख्जत बनाने में







और…
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Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:05am — No Comments

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

******************************



बेगुनाही और

इन्साफ की

बात क्यों सोचती हैं ये औरतें

चुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जाती ?






अस्मिता और

सवाल उठाने की

बात…
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Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:02am — No Comments

निर्वाण नहीं हीं चाहिए

निर्वाण नहीं हीं चाहिए
---------------------------
कैसा लगता होगा
ऊपर से देखते होंगे जब
माँ -बाबा
कि जिस
मुकाम मकान दुकान
खानदान के नाम को
कमाने में
सारी उम्र लगाई
पाई पाई बचाई
खुली खुशी
संतति को थमाई…
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Added by amita tiwari on March 17, 2026 at 4:00am — No Comments

दोहा सप्तक. . . .युद्ध

दोहा सप्तक. . . . . युद्ध

हरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।

बेबस जनता भोगती ,  इसका हर  अंजाम ।।

दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।

जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।

कौन करेगा आकलन , कितना हुआ विनाश ।

मौन भयंकर छा गया, काला हुआ प्रकाश ।।

जंग चलेगी जब तलक, होगा बस संहार ।

खण्डहरों के ढेर पर, सब होंगे लाचार ।।

जन-धन का हर युद्ध में, होता है नुकसान ।

हार- जीत के द्वन्द्व में, हारे बस  इंसान ।।

देख विदारक दृश्य को,…

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Added by Sushil Sarna on March 13, 2026 at 2:49pm — No Comments

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल हैं

ग़ज़ल 2122  1212  22

वो समझते हैं मस्ख़रा दिल है

कितने दुःख दर्द से भरा दिल है

ये मेरा क्यूँ हुआ है ज़ज़्बाती

पास उनके जो सुनहरा दिल है

ताज इक सब के मन के अंदर भी

और ये शह्र आगरा दिल है

दिल लगी दिल्लगी नहीं होती

इक ग़ज़ब का मुहावरा दिल है

देखकर उनकी मदभरी आँखें

खो गया मेरा मदभरा दिल है

याद मुद्दत से वो नहीं है 'जय'

आज फिर क्यूँ भरा भरा दिल है

मौलिक एवं…

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Added by Jaihind Raipuri on March 4, 2026 at 10:00pm — 2 Comments

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

***

पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की

साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।

*

कहने को  आयी  देश  में  इक्कीसवीं सदी

होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।

*

कहने को पर्व  रंग  का, मस्ती मजाक का

पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।

*

रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी

साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।

*

माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े

टेढ़ी करो न  रोष  में  रेखा को भाल की।५।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2026 at 7:30am — No Comments

दोहा सप्तक. . . . घूस

दोहा सप्तक. . . . . घूस



बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम ।

कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।।



घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज ।

जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।।



जिसको देखो घूस का, अजब लगा है रोग ।

घूसखोर समझे नहीं, पाप पंक के भोग ।।



बिना घूस होता नहीं, कोई भी हो काम ।

छोटे आते जाल में, बड़े रहें गुमनाम ।।



बाँछें खिलतीं मेज पर, जब भी  आता काम ।

बाबू भरता घूस से, अपने घर गोदाम ।।



खुलेआम अब घूस का,…

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Added by Sushil Sarna on February 18, 2026 at 8:00pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . . प्यार

दोहा सप्तक. . . . प्यार

प्यार, प्यार से माँगता, केवल निश्छल प्यार ।

आपस का विश्वास ही, इसका है आधार ।।

प्यार नाम समर्पण का, इसके अन्तर त्याग ।

इसकी सच्ची लाग का, है सच्चा  अनुराग ।।

प्यार ईश की वन्दना, प्यार जगत् का सार ।

प्यार दिखावे से परे, प्यार मौन शृंगार ।।

निहित नहीं है प्यार में, नफरत की दुर्गंध ।

इसके भावों में छुपे, प्रेम गीत के बंध ।।

प्यार रूह इसरार की, प्यार नहीं इंकार ।

गहरा होता प्यार में, प्यार भरा अभिसार…

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Added by Sushil Sarna on February 16, 2026 at 7:47pm — No Comments

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में -लक्ष्मण धामी 'मुसफिर'

बदला ही राजनीति के अब है स्वभाव में

आये कमी कहाँ  से  कहो  फिर दुराव में।१।

*

अवसर समानता का कहे सम्विधान तो

पर  लोकतंत्र  व्यस्त  हुआ  भेदभाव में।२।

*

करना था दफ़्न देश ने जिस जातिवाद को

फिर से जिला  दिया  है  उसे  ताव-ताव में।३।

*

खतरा नहीं है घाव से मरहम से है मगर

हरकत हमें तो वैद की रखती तनाव में।४।

*

सम्पन्न देश हो न हो इतना तो हो मगर

जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 14, 2026 at 5:09pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . संयोग शृंगार

 

अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।

मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।।

 

प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार ।

काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।।

 

अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद ।

शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।।

 

अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात ।

कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

बातें बीती रात की, कहते आए लाज ।

लाख छुपाया खुल गए, सुर्ख नयन से राज ।।

 

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 8, 2026 at 9:00pm — 2 Comments

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

******

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये

उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१।

*

गुर्बत हटेगी बोल के कुर्सी जिन्हें मिली

उनको गरीब लोग ही जल-पान हो गये।२।

*

घर में बहार नल से जो आयी गरीब के

पनघट हर एक गाँव  के वीरान हो गये।३।

*

भारी हुए जो उनके ये व्यवहार कर्म पर

सारे ही फर्ज, कौम को अहसान हो गये।४।

*

हाथों अपढ़ के देखते शासन की डोर है

पढ़ लिख गये जो देश में दरवान हो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 7, 2026 at 6:23am — No Comments

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिल

रात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।

फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।

उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान ।

सोच रहा वह  इश्क में, क्या पाया नादान ।।

आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।

नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार ।

जिस्मानी जन्नत मिली, दिल को मिला करार ।।

कैसी ख्वाहिश कर रहा  , पागल दिल नादान ।

आसमान सम चाँद पर, खो बैठा ईमान ।।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on February 4, 2026 at 8:30pm — No Comments

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