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रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको

2122/1212/22 (112)

रोज़ देता हूँ बद-दुआ तुमको
ग़म-ज़दा ही रखे ख़ुदा तुमको[1]

जान-ए-जाँ मौसम-ए-ख़िज़ाँ में भी
हमने रक्खा हरा भरा तुमको[2]

बे-तरह चीख़ कर लिखा हमने
अपनी ग़ज़लों में बे-वफ़ा तुमको[3]

सुर्ख़ आँखें गवाही देती है
कल की शब भी थी रत-जगा तुमको[4]

हिज्र ने हमको बे-क़रार किया
मिल गया फ़ासलों से क्या तुमको[5]

बीच दरिया में हाथ छोड़ दिया
डूब जाऊँगा इल्म था तुमको[6]

अपनी मंज़िल की जब ख़बर है मुझे
क्यूँ भरोसा नहीं मेरा तुमको[7]

बाद मुद्दत सुकून पाया था
फिर से क्यूँ याद कर लिया तुमको[8]

हमको मसरूफ़ ही मिले हो तुम
कॉल जब भी सनम किया तुमको[9]

चाँद है मैं हूँ और तन्हाई
ख़ूँ रुलाता है सोचना तुमको[10]

मय-कशी से है फ़ासला फिर भी
'मीत' कहते हैं सब बुरा तुमको[11]

रूपम कुमार 'मीत'

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 28, 2020 at 5:13pm

आदरणीय Rupam kumar -'मीत' साहिब, उस्ताद-ए-मुहतरम के सुझाए हुए मिस्रे को ध्यान से पढ़िए, उसके कई पहलू निकल रहे हैं, और ये शे'र में बहुत बड़ी ख़ूबी होती है।

/मुझे तो सभी बोलते हैं कि लड़का

भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है/

इस शेर के सानी में दो बार 'भी' खटक रहा है। अगर मुनासिब समझें तो सानी यूँ कर सकते हैं:

भला गर नहीं तो बुरा भी नहीं है
या
भला जो नहीं तो बुरा भी नहीं है

Comment by Samar kabeer on June 28, 2020 at 4:39pm

"मुझे तो सभी बोलते हैं कि लड़का

भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है"

इस शैर और उस शैर के भाव अलग हैं, विचार करें .

Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on June 28, 2020 at 3:19pm

आद0 रूपम कुमार मीत जी सादर अभिवादन। आपकी ग़ज़ल के हवाले इतनी अच्छी चर्चा हुई। आदर0 समर साहब, आद0 रवि भसीन साहब का बहुत बहुत शुक्रिया। आपको बधाई

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 28, 2020 at 2:29pm

उस्ताद समर कबीर साहब, आदाब पेश करता हूँ, आपने जो कहा इस से यह साबित होता है मैं बुरा हूँ, लेकिन एक मेरा शेर है,

"मुझे तो सभी बोलते हैं कि लड़का

भला भी नहीं तो बुरा भी नहीं है"

अब फिर से यह शेर नहीं कह सकता, मैं तो अपने महबूब को तंज करना चाहता हूँ,, आपका स्नेह बना रहे इस बालक पर।। प्रणाम साहब!!☺️☺️

Comment by Rupam kumar -'मीत' on June 28, 2020 at 2:25pm

आदणीय, रवि साहब' आपने जो भी बताया उन पर गहराई से अमल करूँगा और, कुछ शेर अभी और दुरस्त कर रहा हूँ, आपकी इस्लाह के बाद ज़ेहन में और ख़याल आ रहे है जो शेर दुरुस्त कर सके, अगर उनको लिख पाया तो लिखूँगा, बाक़ी आपने जो किया है वो दिल में उतर आया है, शेर दुरुस्त हो गए। जल्द ही सहीह करता हूँ। 

Comment by Samar kabeer on June 28, 2020 at 2:19pm

जनाब रूपम कुमार 'मीत' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

जनाब रवि भसीन जी ने विस्तार से बता ही दिया है,मैं अपनी तरफ़ से सिर्फ़ इतना कहूँगा कि मक़्ते का सानी:-

'मीत' कहते हैं बस बुरा तुमको'

में 'बस बुरा' ठीक नहीं,यूँ कर सकते हैं:-

' 'मीत' कहते हैं सब बुरा तुमको'

इसमें तनाफ़ुर है,तो यूँ भी कह सकते हैं:-

' 'मीत' सब कहते हैं बुरा तुमको'

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on June 28, 2020 at 11:33am

आदरणीय Rupam kumar -'मीत' साहिब, बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही आपने, मैं इस पर आपको दाद और मुबारकबाद पेश करता हूँ। आपसे ये निवेदन है कि मंच पर जब भी ग़ज़ल पेश करें, बह्र, अशआर के नंबर, और मुश्किल अलफ़ाज़ (अगर हों तो) के अर्थ ज़रूर लिखें, जिससे सीखने वालों को और सुझाव देने वालों को आसानी हो सके। आपको अपनी समझ से कुछ सुझाव देना चाहता हूँ, जो मुनासिब लगें वो रख लीजियेगा, लेकिन अन्य गुणीजन और उस्ताद-ए-मुहतरम की टिप्पणियाँ आने के बाद।

/सुर्ख़ आँखें बयान देती है/
'बयान' की जगह 'गवाही' लेने पर विचार कर सकते हैं

/आज की शब थी रत-जगा तुमको/
2122 / 1212 / 22 (112)
रास आया न रतजगा तुमको
वैसे 'आज की शब' की बजाए 'कल की शब' ज़ियादा मुनासिब रहेगा।

/हम अकेले हैं चाँदनी में और
रात का दुख सता रहा तुमको/
इस शेर का भाव स्पष्ट नहीं है, सानी का ऊला से रब्त कमज़ोर है, और सानी में 'है' की कमी भी महसूस हो रही है।

/हिज़्र ने हमको बे-क़रार किया
फ़ासलों से क्या मिल गया तुमको/
इस शे'र में 'हिज्र' में से नुक़्ता हटा लीजिये। और सानी में 'क्या' को 1 के वज़्न पर लेना मुनासिब नहीं है। सानी यूँ कहा जा सकता है:
2122 / 1212 / 22 (112)
मिल गया फ़ासलों से क्या तुमको

/बीच दरिया में हाथ छोड़ दिया
डूब जाऊँगा था पता तुमको/
इस शे'र का मिस्रा-ए-सानी इस तरह थोड़ा और बहतर हो सकता है:

2122 / 1212 / 22 (112)
डूब जाऊँगा इल्म था तुमको

/अपनी मंज़िल की जब ख़बर है हमें
साथ चलने में क्या हुआ तुमको/
इस शे'र का मिस्रा-ए-सानी बदलने का प्रयास करें, 'चलने में क्या हुआ' शिल्प के लिहाज़ से कमज़ोर है और कम शाइराना है। एक प्रयास:

2122 / 1212 / 22 (112)

अपनी मंज़िल की जब ख़बर है मुझे
क्यूँ भरोसा नहीं मेरा तुमको

/आज का दिन तो ऐश का दिन था
आज क्यूँ याद कर लिया तुमको/
इस शे'र के ऊला में अगर 'ऐश' की जगह 'सुकून', 'सुकूँ' या 'चैन' इस्तेमाल कर सकें तो शे'र बहतर हो सकता है। वैसे दोनों मिसरों का 'आज' से शुरूअ होना भी थोड़ा खटक रहा है। एक प्रयास देखियेगा:

2122 / 1212 / 22 (112)

बाद मुद्दत सुकून पाया था
फिर से क्यूँ याद कर लिया तुमको

/तुम तो मसरूफ़ ही मिले हमको
कॉल जब भी किया गया तुमको/

इस शेर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है (ऊला के अंत में 'हमको' रदीफ़ से मेल खाता है)। इसे यूँ दूर किया जा सकता है:

2122 / 1212 / 22 (112)

हमको मसरूफ़ ही मिले हो तुम

/कॉल जब भी किया गया तुमको/

इस मिसरे में भी 'किया गया' थोड़ा खटक रहा है, क्यूँकि ऊला के हिसाब से 'जब मैंने किया' का भाव होना चाहिए। कुछ ऐसा सोच सकते हैं:

2122 / 1212 / 22 (112)
कॉल जब भी सनम किया तुमको

/दर्जनों शाइरों के बज़्म में क्यूँ
'मीत' कहते हैं बस बुरा तुमको/
तख़ल्लुस के साथ मक़्ता कहने पे आपको बधाई। इस शे'र के मिस्रा-ए-ऊला में सुधार की कुछ गुंजाइश लग रही है, जैसे कि:

2122 / 1212 / 22 (112)

वज्ह कुछ तो है जो सर-ए-महफ़िल
'मीत' कहते हैं बस बुरा तुमको

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