जिन्दगी एक कठपुतली सी है
जिसकी डोर .....
वो जो ऊपर बैठा है
उसके हाथो में है
वो जो दीखता नही
मगर है तो सही .....
कोई कहता है कि
भगवान नही हैं
और कोई…
Added by Sonam Saini on March 19, 2013 at 9:30am — 7 Comments
घोंसलों से पलायन करते परिंदे
आकाश की ऊँचाई नापने निकलते हैं
पंख फैलाने की सीख घर से लेके
मदमस्त गगन में उड़ते हैं
जहाँ दाना देखा उतर जाते
फिर नये झुंड के साथ , नयी दिशा में मुड़ जाते
नीले गगन की सैर, इंद्रधनुष की अंगड़ाई में लीन
कभी आसमान में स्वतंतरा, कभी हवा के बहाव के आधीन
घोंसले की गर्मी और मा के दुलार को भूल
नये चेहरों को आँखटे, उनके संग हो…
Added by अनुपम ध्यानी on March 19, 2013 at 12:10am — 1 Comment
अपने अपने भीतर हैं सब
चिेकने-चुपड़े बाहर हैं सब
किस की प्यास बुझा पाएँगे
इ्क टूटी-सी गागर हैं सब
कौन समझ पाएगा इनको
बस…
Added by shyamskha on March 18, 2013 at 10:00pm — 5 Comments
जब पाप कियो तुम भोर भये, दिन रात भला तुम का करिहो!
सब नाचत - गावत ताल दियो, तुम ताल तलैयन डूब रहो!!
फिर गंग तरंग बहे न बहे, रखि आपन मान बढ़ाय रहो!
इत डारि रहे खर-मैल बढे, उत गंग कषाय बढ़ाय रहो!!1
नित डारत हैं मल नालन कै, नहि दूसर देखि उपाय रहो!
तुम बालक गंग तरंगिनि कै, कलि कालहि मातु लजाय रहो!!
अब तो सिर सौं तुम लाज करो, यह देश तुझे ललकार रहो!
तुम शान कमान धरे उर मा, गण मान कहाय लुकाय रहो!!2
अपनी छतरी अपने लड़के, नहि होत सहाय तलाड़…
ContinueAdded by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 18, 2013 at 9:52pm — 6 Comments
इक और व्यंग्य कविता पसंद आई के नही बताना जी
इस बस्ती में भेडियें रहते उनको बाहर निकाले कौन,
सब के घर अब शीशे के है पत्थर क्यों उछाले कौन।
इकलौते बेटे नें माँ बाप को ही घर से निकाल दिया,
वृद्धआश्रम में भी गद्दारी है बुजुर्गों को सम्भाले कौन।
नामी गुंडे इश्तयारी मुजरिम देखो जेल मंत्री बन बैठे,
चोरों का जब राज हो गया देखे गा अब तालें कौन।
महंगाई पे निरन्तर चढ़े जवानी ऊंचा उंचा कूद रही,
सारथी जब अनजान हुआ…
ContinueAdded by rajinder sharma "raina" on March 18, 2013 at 4:00pm — 1 Comment
हो गई होली
जलाई चन्द लकड़ियाँ, तो हो गई होली
खाई गुजिया पपड़ियाँ, तो हो गई होली
हुए हुड्दंगों मै शुमार, तो हो गई होली
निकाले दिल के गुबार, तो हो गई होली
पी दो घूँट शुरा, तो हो गई होली
निकाले चाकू छुरा, तो हो गई होली
छानी ठंडाई भांग, तो हो गई होली
खींची अपनों की टांग, तो हो गई होली
छेड़ी वेसुरी तान ,तो हो गई होली
किया नाली मै स्नान, तो हो गई होली
देखे रंगीन माल, तो हो गई…
ContinueAdded by Dr.Ajay Khare on March 18, 2013 at 10:46am — 2 Comments
‘साठ हजार मरे पुरखे कहॅ, नाम नहीं कछु जात पुकारत!
देवनदी यदि पैर पड़े तब, मान समान बढ़े निज भारत!!
सोच विचारि करें उर नारद, बात भगीरथ को समझावत!
सारद शंकर शेष महेशहि, को अब जाय मनावहु राजत!!
जाप जपे हरि नाम रटे तप, बीत गये कइ साल युगो दिन!
शंकर होत सहाय नरायन, छोड़ रहे…
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 17, 2013 at 11:30pm — 4 Comments
होली गीत
अर र र र देखो सखी तो पूरी लाल हुई
रंग ना गुलाल मै तो शर्म से लाल हुई।
पीर ना दहन मोरे तन मन में आग लगी -2
चाम ना वसन जले मै तो जल लाल हुई।
रंग ना-------------
ले के रस रंग चली देवरों की टोली - 2
घेर घेर घेर मई तो जय कन्हैया लाल हुई।
रंग ना -------------
आज तो बाबा भी करे हैं ठिठोली - 2
लाज की चुनर ओढ़ मै हँस हँस निहाल हुई।
रंग ना…
ContinueAdded by mrs manjari pandey on March 17, 2013 at 11:07pm — 9 Comments
गंगा कहती रहीं-
‘और तुम्हारे ज्ञानी गण
केवल पारब्रह्म का रास्ता ही नहीं बताते
जिस पारब्रह्म का मन्दिर सिर्फ आत्मा होती है
धरती पर वे बताते हैं मन्दिर कहाँ बनेगा!
और यहां से उठ कर
किन दिलों को तोड़ना है
सब का हिसाब बना रखा है
सब व्यवस्था कर रखी है
मानव मल का बोझ मैं ढो लूंगी
पर मानवीय क्रूरता के इस अथाह मल को
वे मेरे पानियों…
Added by Dr. Swaran J. Omcawr on March 17, 2013 at 8:06pm — 8 Comments
खुशियाँ जब जब आई हैं
मैने मुट्ठी भर भर बिखरा दिया है चारो तरफ
इस आशा से और दुवाओं से
कि लहलहाए खुशियां की हरियाली चारो दिशा|...
कल…
Added by डॉ नूतन डिमरी गैरोला on March 17, 2013 at 7:24pm — 4 Comments
व्यंग्य कविता मेरी प्यारी
सच बिकना मुश्किल यारों झूठ के खरीददार बहुत,
इसलिए तो फलफूल रहा है झूठ का व्यापार बहुत।
सच बोलने वालों को तो झट सूली पे लटका देती,
झूठ बोलने वालों का साथ देती अब सरकार बहुत।
सब में चटपटी ख़बरें है मतलब की कोई बात नही,
वैसे तो इस शहर में यारों छपते हैं अख़बार बहुत।
भारत देश के नेता तो गिरगट को भी मात दे देते,
माहिर बड़े परिपक्क हो गए बदलते किरदार बहुत।
मालिक की मर्जी से ही बचता है किसी का…
ContinueAdded by rajinder sharma "raina" on March 17, 2013 at 5:30pm — 1 Comment
दोस्तों मेरी किताब की मेरी प्यारी ग़ज़ल, आप को कैसी लगी sunday spacial.................
क्यों खफा हो कुछ बताओ तो सही,
हाल दिल का तुम सुनाओ तो सही।
हम फ़िदा तेरी अदा पे बावफा,
तेरा जलवा अब दिखाओ तो सही।
गर न समझे तो दुखी हो जिन्दगी,
नीर जीवन है बचाओ तो सही।
वो सितारा टूट कर क्यों है गिरा,
राज गहरा ये बताओ तो सही।
सांस लेना चाहते हो गर भली,
पेड़ धरती पे लगाओ…
Added by rajinder sharma "raina" on March 17, 2013 at 4:30pm — 4 Comments
बेरोजगार !!!
सुबह के सात बजे थे!
एक ही स्थान पर अट्ठारह चूल्हे जले थे!
कुल मिला कर बीस-पच्चीस मजदूरों का
भोजन तैयार हो रहा था!
पास ही एक सूखे पेड़ से टेक लगाये
बैठा इन्सान
घुटनों पर कुहनी
कुहनी पर तने हाथ की मुट्ठी पर
ठुड्ढी रखे
नजरों को अट्ठारहों चूल्हों की ओर घुमाता
आंसू बहाता
खाली पेट को रोटी और
रोटी से भूखी आत्मा को संतुष्ट करने की
सोच रहा था!
सहसा एक अश्रु बिंदु
मुह के कोर तक पहुंची
झट से इन्सान ने ढुलकते बिंदु…
Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 17, 2013 at 4:24pm — 4 Comments
पीर उठे नहि कष्ट घटे अरु, लागत रात बड़ी अधियारी !
आँखिन आँसु सुखाइ गया अरु, सेज जले जइसे अगियारी !!
आपन रूप बिगाड़ फिरे वह, ताकत राह खड़ी दुखियारी !
लोग कहे पगलाय गयी यह, लागत हो जइसे विधवारी!!
राम शिरोमणि पाठक"दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित
Added by ram shiromani pathak on March 17, 2013 at 12:00pm — 6 Comments
हिम शिखर से तू आती हो
गंगा सागर तक जाती हो
सारी नदियाँ तुमसे मिलकर
गंगा बन आगे बढ़ती है
गंगा तू सुखदायिनी
स्वर्गलोक से पाप हरने
धरती पर तू सतत बहने
सगर पुत्रों को मोक्ष देने
शिव जटा से आयी हो
गंगा तू मोक्ष दायिनी
जड़ी बूटी तू साथ लिए
कल -कल छल -छल बहती हो
जाति -धर्म का भेद न जाने
तत्पर पल -पल रहती हो
गंगा तू आनंद दायिनी
दूर करो माँ कटुता पशुता
भर आयी जो जन -जन में…
Added by shubhra sharma on March 17, 2013 at 9:48am — 2 Comments
तुम्हारे उपवन के उपेक्षित कोने में
एक नन्हा सा घरौंदा है,
जहाँ मैं और मेरी तन्हाई
साथ-साथ रहते हैं –
क्या तुमने कभी देखा है ?
यहाँ तुम्हारे आंचल की सरसराहट
सुनाई नहीं देती,
तुम्हारी खुशी की खिलखिलाहट भी
मंद पड़ जाती है –
पर,
तुम्हारे गजरे का सुबास
स्वयम यहाँ आता है,
हर सुबह एक कोयल
कोई नया राग गाती है ;
हमने ओस की बूंदों को
पलकों का सेज दिया है –
क्या तुमने कभी जाना है…
ContinueAdded by sharadindu mukerji on March 17, 2013 at 2:43am — 3 Comments
थका तन
थका मन
कैसे चले जांगर
क्या जा पाएंगे घर ?
हुक्म देने वाले
ठाने बैठे हैं जिद
एक काम होता नही खत्म
कि दूजे का हुक्म मिल जाता..
पंछी भी लौट आते
घर अपने
नियत समय पर
लेकिन हम पंछी नहीं
सूरज भी छिप जाता
क्षितिज पार
नियत समय पर
लेकिन हम सूरज नही
तो क्या हम समंदर की लहरें हैं
जो दिन-रात अनथक
आ-आकर टकराती रहतीं किनारों पर
और…
ContinueAdded by anwar suhail on March 16, 2013 at 9:00pm — No Comments
नापाक, पाक
हे निर्लज्ज निकर्ष्ठ पडोसी
तुझे कोटि कोटि धिक्कार है
पीठ पर बार करते हो
यही तुम्हारी हार है
हम सदभावी शांतिदूत
तुम हमें कमजोर आंकते हो
कायर बन चोर की मानद…
ContinueAdded by Dr.Ajay Khare on March 16, 2013 at 1:30pm — No Comments
"फूल हो क्या तुम" ????
तुमसे खूबसूरत कौन होगा
क्या नाज़ुकी है
क्या तराश है
इस दुनिया मैं कोई नही
दूजा तुमसा
भँवरे तुम्हे यूँ भरमाते हैं
और तुम
इठलाने लगती हो
फूल हो क्या तुम ??
पता है
एक कोना होता है
जिस्म में
छोटा सा
जो हम सब को
सच ही बताता है
सच ही दिखाता है
रूको रूको
यूँ मत मुस्कुराओ
तुम जो सोच रही हो न !
दिल नहीं है
वो है दिमाग
जो काम नहीं करता
हाई टेक झूठ…
Added by SANDEEP KUMAR PATEL on March 16, 2013 at 12:29pm — 4 Comments
माँ -
बहुत कोशिश की मैंने ,
इन आँसुओं को पीने की,
कुछ और,दिन जीने की।
इस अँधेरे , घर में,
जहाँ मेरा कुछ भी नहीं,
जहाँ मैं अभिशाप हूँ।
तुम्हारा कोई, पाप हूँ।
मगर मैं, अस्तित्वहीन ,
वेदना और दुख से क्षीण ,
आज भी, चुप-चाप हूँ।
यह मांग का सिंदूर,
जो सौभाग्य की निशानी है।
कैद मेरी आत्मा की,
अनकही, कहानी है।
जो कभी दुष्चक्र से,
निकल नहीं सकती।
मजबूर,अपने भाग्य को,
वह बदल नहीं सकती।
हर सुबह,जिसके…
Added by Kundan Kumar Singh on March 16, 2013 at 12:00pm — 7 Comments
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